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Thursday, 16 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.२५)


भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ २९॥

(भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि) मुझे सब यज्ञों और तपों का भोक्ता, सम्पूर्ण लोकों का महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियों का सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर भक्त शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—

भगवान्‌ केवल यज्ञों और तपोंके भोक्ता ही नहीं, प्रत्युत भक्तोंके द्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओं के भोक्ता भी हैं (गीता ९ । २७) । प्रेमके भोक्ता भी भगवान्‌ ही हैं । कोई किसी को नमस्कार करता है तो उसके भोक्ता भी वही हैं । कोई किसी देवता का पूजन करता है तो उसके भोक्ता भी वही हैं (गीता ९ । २३) ।

भगवान्‌ सम्पूर्ण शुभ कर्मों के भोक्ता हैं, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों के भी इश्वर हैं और हमारे परम सुहृद हैं- ऐसा दृढ़तापूर्वक स्वीकार करनेसे साधककी संसारसे ममता हटकर भगवान्‌ में आत्मीयता हो जाती है, जिसके होते ही परमशान्ति की प्राप्ति हो जाती है ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसन्न्यासयोगो नाम
पञ्चमोऽध्याय:॥ ५॥

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

स्पर्शान्कृत्वा वहिर्वाह्रांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥२७॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: ।
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: ॥२८॥

बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के बीच में (स्थित करके) तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वश में हैं, जो केवल मोक्ष- परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

व्याख्या-
बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़ने का तात्पर्य है कि साधक की वृत्ति में एक परमात्मतत्त्व के सिवाय अन्य कोई भी सत्ता न रहे। मुक्ति स्वतःसिद्ध है, पर मिलने और बिछुड़ने वाले प्राणी- पदार्थों की सत्ता, महत्ता और अपनापन होने के कारण उसका अनुभव नहीं होता।

ॐ तत्सत् !  

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.२३)

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्रानिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥२६॥

काम- क्रोध से सर्वथा रहित, जीते हुए मन वाले और स्वरूप का साक्षात्कार किये हुए सांख्य योगियों के लिये सब ओर से (शरीर के रहते हुए अथवा शरीर छूटने के बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है।

ॐ तत्सत् !  

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.२२)

योऽन्त: सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव य: ।
स योगी ब्रह्रानिर्वाणां ब्रह्राभूतोऽधिगच्छति ॥२४॥
लभन्ते ब्रह्रानिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा: ।
छित्रद्वेधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता: ॥२५॥

जो मनुष्य केवल परमात्मा में सुख वाला और केवल परमात्मा में रमण करने वाला है तथा जो केवल परमात्मा में ज्ञान वाला है, वह ब्रह्म में अपनी स्थिति का अनुभव करने वाला (ब्रह्मरूप बना हुआ) सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होता है।
जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियों सहित वश में है, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं, निके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। 
 
ॐ तत्सत् !  

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.२१)

शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर: ॥२३॥

इस मनुष्य शरीर में जो कोई मनुष्य शरीर छूटने से पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होनेवाले वेग को सहन करने में समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है। 

व्याख्या -

विवेकी साधक को चाहिये कि वह काम-क्रोधादि विकारों को आरम्भ में ही सहन कर ले, उनके अनुसार क्रिया करे।। काम-क्रोधादि की वृत्ति उत्पन्न होते ही उसका त्याग कर दे, अन्यथा एक बार काम-क्रोधादि का वेग उत्पन्न होने पर साधक तदनुसार क्रिया करने में बाध्य हो जाता है। काम-क्रोधादि के वश में न होने वाला साधक ही वास्तव में योगी है। जो योगी होता है, वही वास्तव में सुखी होता है।

ॐ तत्सत् ! 

Thursday, 9 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.२०)


ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥ २२॥

क्योंकि हे कुन्तीनन्दन! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्तवाले और दु:खके ही कारण हैं। अत: विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।

व्याख्या—

संसारके सभी सुख दुःखकी अपेक्षासे हैं । कोई भी सुख निरन्तर नहीं रहता । यदि सांसारिक सुख निरन्तर रहता तो वह दुःखरूप ही हो जाता । कारण कि सांसारिक भोगोंमें निरन्तर सुख देनेकी शक्ति ही नहीं है । निरन्तर सुख देनेकी शक्ति केवल मोक्षके अखण्डरसमें ही है । संसारके प्रत्येक सुखभोगका परिणाम दुःख होता है-यह नियम है ।

सांसारिक सुख मिलने-बिछुड़नेवाला है, जबकि स्वयं निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है । सांसारिक सुख स्वयंका साथी नहीं है । इसलिये विवेकी साधक सांसारिक भोगोंकी प्राप्तिमें सुखी और अप्राप्तिमें दुःखी नहीं होता ।

सांसारिक सुखभोगसे थकावट आती है और पारमार्थिक सुखसे विश्राम मिलता है । सांसारिक सुख सापेक्ष और पारमार्थिक सुख निरपेक्ष है । जब मनुष्यको नींद आती है, तब बड़े-से-बड़े सांसारिक सुखका भी त्याग करके सो जाता है । सोनेसे उसकी थकावट मिटती है, विश्राम मिलता है और ताजगी आती है । यदि वह सोये नहीं तो पागल हो जाय ! तात्पर्य है कि सांसारिक सुखका त्याग किये बिना मनुष्य रह सकता ही नहीं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥ २१॥

बाह्यस्पर्श (प्राकृत वस्तुमात्रके सम्बन्ध)-में आसक्तिरहित अन्त:करणवाला साधक अन्त:करणमें जो (सात्त्विक) सुख है, उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है।

व्याख्या—

जब सांसारिक प्राणी-पदार्थों की आसक्ति मिट जाती है, तब साधक को सात्त्विक सुख प्राप्त होता है । जब साधक सात्त्विक सुखका भी उपभोग नहीं करता और उसमें संतोष नहीं करता, तब उसे अखण्ड सुखका अनुभव होता है । सात्त्विक सुख तो प्राकृत होनेसे खण्डित होता रहता है, पर अखण्ड सुख कभी खण्डित नहीं होता, प्रत्युत निरन्तर एकरस रहता है । यह अखण्ड सुख मोक्षका सुख है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१७)


इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:॥ १९॥

जिनका अन्त:करण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है अर्थात् वे जीवन्मुक्त हो गये हैं; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं।

व्याख्या—

परमात्मतत्त्वमें स्थित हुए महापुरुषकी पहचान है- बुद्धिमें समता आना अर्थात्‌ बुधिमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार न होना । जिसकी बुद्धि समतामें स्थित हो गयी है, उसे जीवन्मुक्त समझना चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदृशन:॥ १८॥

ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।

व्याख्या—

बेसमझ लोगोंके द्वारा यह श्लोक प्रायः सम-व्यवहारके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया जाता है । परन्तु इस श्लोकमें ‘समवर्तिनः’ न कहकर ‘समदर्शिनः’ कहा गया है, जिसका अर्थ है-समदृष्टि, न कि सम-व्यवहार । यदि स्थूलरूपसे भी देखें तो ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी,और कुत्तेके प्रति सम-व्यवहार असम्भव है । इनमें विषमता अनिवार्य है । जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणका ही हो सकता है, न कि चाण्डालका; दूध गायका ही पिया जाता है, न कि कुतिया का; सवारी हाथीपर ही की जा सकती है, न कि कुत्तेपर । जैसे शरीरके प्रत्येक अंगके व्यवहारमें विषमता अनिवार्य है, पर सुख-दुःखमें समता होती है अर्थात्‌ शरीरके किसी भी अंगका सुख हमारा सुख होता है और दुःख हमारा दुःख । हमें किसी भी अंगकी पीड़ा सह्य नहीं होती । ऐसे ही प्राणियोंसे विषम (यथायोग्य) व्यवहार करते हुए भी उनके सुख-दुःखमें समभाव होना चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)


नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु:।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:॥ १५॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन:।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥ १६॥

सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पाप-कर्म को और न शुभ-कर्म को ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।
परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञानके द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है,उनका वह ज्ञान सूर्य की तरह परमतत्त्व परमात्मा को प्रकाशित कर देता है।

व्याख्या—

सर्वव्यापी चेतन-तत्त्व किसी के भी पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्म का कर्ता और भोक्ता नहीं बनता, प्रत्युत अज्ञानवश जीव ही कर्ता-भोक्ता बन जाता है ।

ज्ञानका कभी अभाव नहीं होता । अतः ‘अज्ञान’ शब्द ज्ञानके अभावका वाचक नहीं है, प्रत्युत अधूरे ज्ञानका वाचक है । बौद्धिक ज्ञान अधूरा ज्ञान है । अधूरे ज्ञानसे ही ज्ञानका अभिमान उत्पन्न होता है । पूर्ण ज्ञान होनेसे अभिमान मिट जाता है । अतः बौद्धिक ज्ञानको महत्त्व देना बहुत बड़ा अज्ञान है । बौद्धिक ज्ञानको महत्त्व देनेसे वास्तविक ज्ञानकी ओर दृष्टि नहीं जाती- यही अज्ञानके द्वारा ज्ञानको ढकना है ।

अपने विवेक को महत्त्व देने से अज्ञान का नाश हो जाता है । अज्ञान का नाश होनेपर वह विवेक ही तत्त्वज्ञान में परिणत हो जाता है ।

अज्ञानका नाश विवेकको महत्त्व देनेसे होता है, अभ्याससे नहीं । अभ्यास करनेसे जड़ता के साथ सम्बन्ध बना रहता है; क्योंकि जड़ता (शरीरादि)-की सहायता लिये बिना अभ्यास होता ही नहीं । तत्त्वज्ञानका अनुभव जड़ताके द्वारा नहीं होता, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होता है ।
ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥ १४॥

परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।

व्याख्या—

स्वरूपकी तरह परमात्मा भी किसीको कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं करते । मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है । कर्तापन, कर्म और कर्मफलके साथ संयोग जीवका काम है, परमात्माका नहीं । अतः इनका त्याग करनेका दायित्व भी जीवपर ही है । जीव ही अज्ञानवश प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़कर कर्मोंका कर्ता बनता है और कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता है ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 4 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥ १३॥

जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले (शरीररूपी) पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका (विवेकपूर्वक) मनसे त्याग करके नि:सन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है।

प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़नेसे जीव प्रकृतिजन्य गुणोंके अधीन हो जाता है-‘अवशः’ (गीता ३ । ५) और प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता बन जाता है । परन्तु जब जीव प्रकृतिके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटा देता है, तब वह स्वाधीन हो जाता है-‘वशी’ । स्वाधीन होनेपर वह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता । प्रकृतिमें क्रियता और स्वरूपमें अक्रियता स्वतःसिद्ध है । चेतन तत्त्व (स्वरूप) न तो कर्म करता है और न कर्म करनेकी प्रेरणा ही करता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.११)


युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥ १२॥

कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है।

व्याख्या—

कर्म बाँधनेवाले नहीं होते, प्रत्युत कर्मफलकी इच्छा बाँधनेवाली होती है । कर्म न तो बाँधते हैं, न मुक्त ही करते हैं । कर्मोंमें सकामभाव ही बाँधनेवाला और निष्कामभाव मुक्त करने वाला होता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥ ११॥

कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ, शरीर, मन और बुद्धिके द्वारा अन्त:करणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।

व्याख्या—

ममतका सर्वथा नाश होना ही अन्तःकरणकी शुद्धि है । कर्मयोगी साधक शरीर-इद्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना तथा अपने लिये न मानते हुए, प्रत्युत संसारका तथा संसारके लिये मानते हुए ही कर्म करते हैं । इस प्रकार कर्म करते-करते जब ममताका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अन्तःकरण पवित्र हो जाता है । पवित्र होनेपर अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वरूपमें स्थिति हो जाती है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य:।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ १०॥

जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको परमात्मामें अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।

व्याख्या—

कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंको संसारके अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृतिके अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान्‌के अर्पण करता है । तीनोंका परिणाम एक ही होता है । तीनों योगोंमें ‘अपने लिये कुछ न करना’ आवश्यक है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०८)

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ ८॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥ ९॥

तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ, (मल-मूत्रका) त्याग करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ तथा आँख खोलता हुआ और मूँदता हुआ भी 'सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं’—ऐसा समझकर 'मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’—ऐसा माने।

व्याख्या—

अपरा प्रकृतिके अहम्‌के साथ अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण अविवेकी मनुष्य अपनेको कर्ता मान लेता है-‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३ । २७) । परन्तु जब वह विवेकपूर्वक अहम्‌ से सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, तब उसे ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’- इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूपका अनुभव हो जाता है ।

हमारा वास्तविक स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है । उस स्वरूपमें कर्तृत्त्व-भोक्तृत्व न कभी थ, न है, न होगा और न हो ही सकता है । अतः शरीरके द्वारा शास्त्र्विहित क्रियाएँ होते हुए भी साधककी दृष्टि अपने स्वरूपकी ओर रहनी चाहिये, जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित है-‘शरीरस्थो$पि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३ । ३९) ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 25 February 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)


योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय:।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ७॥

जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हैं, जिसका अन्त:करण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वश में है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।

व्याख्या—

शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर कर्मयोगीको प्राणीमात्रके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है । एकदेशीयता मिटने पर जब कर्मयोगीमें कर्तापन नहीं रहता, तब उसके द्वारा होनेवाले सब कर्म अकर्म हो जाते हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)


सन्न्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत:।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥ ६॥

परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोग के बिना सांख्ययोग सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—

कर्मयोगमें साधक सभी कर्म निष्कामभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है, इसलिये उसका राग सुगमतापूर्वक मिट जाता है । कर्मयोगके द्वारा अपना राग मिटाकर सांख्ययोगका साधन करनेसे शीघ्र सिद्धि होती है । भगवान्‌ने भी इसी कारण कर्मयोगीके ‘सर्वभूतहिते रताः’ भावको ज्ञानयोगके अन्तर्गत लिया है अर्थात्‌ इस भावको ज्ञानयोगीके लिये भी आवश्यक बताया है (गीता ५ । २५, १२ । ४) । यदि ज्ञानयोगीमें यह भाव नहीं होगा तो उसमें ज्ञानका अभिमान अधिक होगा ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 February 2017

गीता प्रबोधनी- पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०५)

यत्साङ्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति॥ ५॥

सांख्ययोगियों के द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों के द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है।
अत: जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है।


व्याख्या—
फल एक होने से ज्ञानयोग और कर्मयोग-दोनों साधन समकक्ष हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी- पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०४)

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।
एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥ ४॥

बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग (फलवाले) कहते हैं, न कि पण्डितजन;
क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फल (परमात्माको) प्राप्त कर लेता है।

व्याख्या—
भगवान्‌के मतमें ज्ञानयोग और कर्मयोग-दोनों ही लौकिक साधन हैं (गीता ३ । ३) और दोनोंका परिणाम भी एक ही है । दोनों ही साधनोंकी पूर्णता होनेपर साधक संसार-बन्धनसे मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार कर लेता है । अतः दोनों ही मोक्षप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं ।

ॐ तत्सत् !