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Friday, 9 June 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

इति गुह्रातमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृकृत्यश्च भारत ॥२०॥

हे निष्पाप अर्जुन! इदस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन! इसकेा जानकर मनुष्य ज्ञानवान (ज्ञात-ज्ञातव्य) तथा कृतकृत्य हो जाता है। व्

याख्या-

भगवान ने इस अध्याय में अपने-आप को पुरुषोत्तमरूप से अर्थात अलौकिक समग्ररूप से प्रकट किया है, इसलिये इसे ‘गुह्यतम शास्त्र’ कहा गया है।
पूर्वश्लोक में सर्वभाव से भगवान का भजन करने अर्थात अव्यभिचारिणी भक्ति की बात विशेषरूप से आयी है। भक्ति में मनुष्य प्राप्त प्राप्तव्य हो जाता है। अतः पूर्वश्लोक में प्राप्त प्राप्तव्य होने की बात माननी चाहिये। इस श्लोक में (‘बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च’ पद में) ज्ञातज्ञातव्य तथा कृतकृत्य होने की बात आयी है।
लौकिक क्षर और अक्षर तो प्राप्त हैं; अतः अलौकिक परमात्मा ही प्राप्तव्य हैं। इस श्लोक में यह भाव निकलता है कि भक्त को ज्ञानयोग तथा कर्मयोग- दोनों का फल प्राप्त हो जाता है अर्थात वह ज्ञातज्ञातव्य और कृतकृत्य भी हो जाता है।
ऊँ तत्सदिति

श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पंचदशोऽध्यायः।।१५।। 

ॐ तत्सत् !

Thursday, 11 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
  
अर्जुन उवाच 
कैर्लिग्ङैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । 
किमाचार: कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥२१॥  
 
श्रीभगवानुवाच- 
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । 
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२॥  
 
अर्जुन बोले- 
हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से युक्त होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है। 
 
श्रीभगवान बोले 
हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृत्ति तथा मोह- ये सभी अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनकी इच्छा नहीं करता।  
 
व्याख्या- 
वृत्तियाँ एक समान किसी की भी नहीं रहतीं। तीनों गुणों की वृत्तियाँ तो गुणातीत महापुरुष के अन्तःकरण में भी होती हैं, पर उसका उन वृत्तियों से राग-द्वेष नहीं होता। वृत्तियाँ अपने-आप आती और चली जाती हैं। गुणातीत महापुरुष की दृष्टि उधर जाती ही नहीं; क्योंकि उसकी दृष्टि में एक परमात्मतत्त्व के सिवाय और कुछ रहता ही नहीं। गुणातीत महापुरुष में ‘अनुकूलता बनी रहे, प्रतिकूलता मिट जाय’- ऐसी इच्छा नहीं होती। निर्विकारता का अनुभव होने पर उसे अनुकूलता- प्रतिकूलता का ज्ञान तो होता है, पर स्वयं पर उनका असर नहीं पड़ता। अन्तःकरण में वृत्तियाँ बदलती हैं, पर स्वयं उनसे निर्लिप्त रहता है। साधक पर भी वृत्तियों का असर नहीं पड़ना चाहिये; क्योंकि गुणातीत मनुष्य साधक का आदर्श होता है, साधक उसका अनुयायी होता है।  साधकमात्र के लिये यह आवश्यक है कि वह शरीर का धर्म अपने में न माने। वृत्तियाँ अन्तःकरण में हैं, अपने में नहीं। अतः साधक वृत्तियों को न तो अच्छा माने, न बुरा माने और न अपने में ही माने। कारण कि वृत्तियाँ तो आने-जाने वाली हैं, पर स्वयं निरन्तर रहने वाला है। वृत्तियाँ हम में नहीं होतीं, प्रत्युत अन्तःकरण में ही होती हैं। यदि वृत्तियाँ हम में होतीं तो जब तक हम रहते, तब तक वृत्तियाँ भी रहतीं। परन्तु यह सबका अनुभव है कि हम तो निरन्तर रहते हैं, पर वृत्तियाँ आती-जाती रहती हैं। वृत्तियों का सम्बन्ध प्रकृति के साथ है और हमारा (स्वयं का) सम्बन्ध परमात्मा के साथ है। इसलिये वृत्तियों के परिवर्तन का अनुभव करने वाला स्वयं एक ही रहता है। 

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।२५।।

दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषों से) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुनने के परायण मनुष्य भी मृत्यु को तर जाते हैं।

व्याख्या—

जिन मनुष्योंमें शास्त्रों को तथा उनमें वर्णित साधनोंको समझनेकी योग्यता नहीं है, जिनका विवेक कमजोर है, पर जिनके भीतर मृत्यु से तरने (मुक्ति)-की उत्कट अभिलाषा है, ऐसे मनुष्य भी जीवनमुक्त सन्त-महात्माओं की आज्ञा का पालन करके मृत्यु को तर जाते हैं अर्थात्‌ तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।।२६।।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः।।२७।।

हमारे मुख्य योद्धाओं के सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओं के समुदायों के सहित धृतराष्ट्र के वे ही सब के सब पुत्र आपके विकराल दाढ़ों के कारण भयंकर मुखों में बड़ी तेजी से प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमें से कई एक तो चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में फँसे हुए दीख रहे हैं।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्।।२७।।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।।२७।।

घोड़ों में अमृत के साथ समुद्र से प्रकट होनेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेको, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी को और मनुष्यों में राजा को मेरी विभूति मानो।
आयुधों में वज्र और धेनुओं में कामधेनु मैं हूँ। सन्तानउत्पत्ति का हेतु कामदेव मैं हूँ और सर्पों में वासुकि मैं हूँ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रता:।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥ २५॥

(सकामभावसे) देवताओंका पूजन करनेवाले (शरीर छोडऩेपर) देवताओंको प्राप्त होते हैं। पितरोंका पूजन करनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं। परन्तु मेरा पूजन करनेवाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।

व्याख्या—

वास्तवमें सब कुछ भगवान्‌का ही रूप है । परन्तु जो भगवान्‌के सिवाय दूसरी कोई भी स्वतन्त्र सत्ता मानता है, उसका उद्धार नहीं होता । वह ऊँचे-से-ऊँचे लोकोंमें भी चला जाय तो भी उसे लौटकर संसारमें आना ही पड़ता है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ २२॥

उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धासे युक्त होकर वह मनुष्य उस देवताकी (सकामभावपूर्वक) उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है; परन्तु वह कामनापूर्ति मेरे द्वारा ही विहित की हुई होती है।

व्याख्या—

भगवान्‌ ही मनुष्यकी श्रद्धाको उसकी इच्छाके अनुसार अन्य देवताओंमें दृढ़ करते हैं और वे ही अन्य देवताओंके द्वारा मनुष्यकी कामनाओंकी पूर्ति करवाते हैं-यह भगवान्‌की उदारता है, परन्तु मनुष्य यही समझता है कि अन्य देवताओंकी उपासनासे मेरी कमनापूर्ति हुई है । वास्तवमें सभी देवता भगवान्‌के अधीन हैं । उन्हें कामनापूर्तिका अधिकार और सामर्थ्य भगवान्‌का ही दिया हुआ है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 5 April 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.१९)


यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥ २६॥

यह अस्थिर और चंचल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मा में ही भली भाँति लगाये।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 9 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥ २१॥

बाह्यस्पर्श (प्राकृत वस्तुमात्रके सम्बन्ध)-में आसक्तिरहित अन्त:करणवाला साधक अन्त:करणमें जो (सात्त्विक) सुख है, उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है।

व्याख्या—

जब सांसारिक प्राणी-पदार्थों की आसक्ति मिट जाती है, तब साधक को सात्त्विक सुख प्राप्त होता है । जब साधक सात्त्विक सुखका भी उपभोग नहीं करता और उसमें संतोष नहीं करता, तब उसे अखण्ड सुखका अनुभव होता है । सात्त्विक सुख तो प्राकृत होनेसे खण्डित होता रहता है, पर अखण्ड सुख कभी खण्डित नहीं होता, प्रत्युत निरन्तर एकरस रहता है । यह अखण्ड सुख मोक्षका सुख है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 8 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१९)

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥ २६॥

अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं।

व्याख्या—

एकान्तकाल में अपनी इन्द्रियों को भोग में न लगने देना ‘संयमरूप यज्ञ’ है । व्यवहारकाल में इन्द्रियों के अपने विषयों में प्रवृत्त होने पर उनमें राग-द्वेष न करना ‘विषयहवनरूप यज्ञ’ है ।
हवन तभी होगा, जब विषय नहीं रहेंगे । कारण कि हवन तभी होता है, जब हव्य पदार्थ नहीं रहता । जब तक हव्य पदार्थ की सत्ता रहती है, तब तक हवन नहीं होता ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 7 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१९)


तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो:।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ २८॥

परन्तु हे महाबाहो ! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।

व्याख्या—

यह सिद्धान्त है कि संसार (पदार्थ और क्रिया)- से अलग होनेपर ही संसारक ज्ञान होता है और परमात्मासे एक होने पर ही परमात्माका ज्ञान होता है । कारण यह है कि वास्तवमें हम संसारसे अलग और परमात्मासे एक हैं । तत्त्वज्ञ महापुरुष गुण-विभाग (पदार्थ) और कर्म-विभाग (क्रिया)- से सर्वथा अलग होनेपर यह जान लेता है कि संपूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं । स्वरूपमें कभी कोई क्रिया नहीं होती ।
ॐ तत्सत् !

Friday, 4 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.१९)

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमहर्सि॥ २६॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमहर्सि॥ २७॥

हे महाबाहो ! अगर तुम इस देही को नित्य पैदा होने वाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिये । कारण कि पैदा हुए की जरूर मृत्यु होगी और मरे हुए का जरूर जन्म होगा। अत: (इस जन्म-मरणरूप परिवर्तन के प्रवाह का) निवारण नहीं हो सकता। अत: इस विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।

व्याख्या—

जो मिला है और बिछुड़ने वाला है, उस पर किसी का स्वतन्त्र अधिकार नहीं चलता । कारण कि मिली हुई और बिछुड़ने वाली वस्तु अपनी और अपने लिये नहीं होती, प्रत्युत संसार की और संसार के लिये ही होती है । उसका उपयोग केवल संसार की सेवा के लिये ही हो सकता है, अपने लिये नहीं ।

ॐ तत्सत् !