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Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२८)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।३४।।

इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्र से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के अन्तर (विभाग) को तथा कार्यकारणसहित प्रकृति से स्वयं को अलग जानते हैं, वे परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं।

व्याख्या—

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभागका ज्ञान ‘विवेक’ कहलाता है । जो साधक इस विवेकको महत्त्व देकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागको ठीक-ठीक जान लेते हैं तथा प्रकृति और उसके कार्य (शरीर)-को स्वयंसे सर्वथा अलग अनुभव कर लेते हैं, वे चिन्मय परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते हैं । उनकी दृष्टिमें एक चिन्मय तत्त्वके सिवाय कुछ नहीं रहता । सम्पूर्ण क्रियाएँ क्षेत्र अर्थात्‌ जड़-विभागेमें ही होती हैं । क्षेत्रज्ञ अर्थात्‌ चेतन-विभाग में कभी किञ्चिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं होती । स्थूलशरीर तथा उससे होनेवाली क्रियाएँ, सूक्ष्मशरीर तथा उससे होनेवाला चिन्तन और कारणशरीर तथ उससे होनेवाली स्थिरता व समाधि-ये सभी जड़-विभागमें ही हैं । कामन, ममता, अहंता आदि सम्पूर्ण विकार जड़-विभागमें ही हैं । सम्पूर्ण पाप, ताप भी जड़-विभागमें ही हैं । पराश्रय तथा परिश्रम-ये दोनों जड़-विभागमें हैं । भगवदाश्रय और विश्राम-ये दोनों चेतन-विभागमें हैं । जड़ और चेतनके विभागको अलग-अलग जानना ही ‘ज्ञान’ है । इस ज्ञानरूपी अग्निसे सम्पूर्ण पाप सर्वथा नष्ट हो जाते हैं (गीता ४ । ३६ - ३७) ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्याय:॥ १३॥

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।३३।।

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! जैसे एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता है, ऐसे ही क्षेत्रज्ञ (आत्मा) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।

व्याख्या—

जैसे,सूर्य के प्रकाश में सम्पूर्ण शुभ-अशुभ क्रियाएँ होती हैं । सूर्य के प्रकाश में कोई वेद का पाठ करता है, कोई शिकार करता है । परन्तु सूर्य को उन क्रियाओं का न तो पुण्य लगता है, न पाप । कारण कि सूर्य उन क्रियाओं का न तो कर्ता बनता है, न भोक्ता ही बनता है । इसी प्रकार आत्मा (सर्वव्यापी सत्ता) सम्पूर्ण शरीरों को सत्ता-स्फूर्ति तो देता है, पर वास्तव में वह न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है (गीता १८ । १७), तात्पर्य है कि स्वयं में प्रकाशकतत्त्व का अभिमान नहीं है ।

करने की जिम्मेवारी उसी पर होती है, जो कुछ कर सकता है । जैसे, कितना ही चतुर चित्रकार हो, बिना सामग्रि (रंग, ब्रश आदि)-के वह चित्र नहीं बना सकता, ऐसे ही पुरुष (चेतन) प्रकृति (जड़ शरीरादि) की सहायता के बिना कुछ नहीं कर सकता । इसलिये कुछ-न-कुछ करनेमें ही शरीरका उपयोग है । यदि हम कुछ भी न करना चाहें तो शरीर का क्या उपयोग है ? कुछ भी उपयोग नहीं है । यदि हम कुछ भी देखना न चाहें तो आँख हमारे क्या काम आयी ? कुछ भी सुनना न चाहें तो कान हमारे क्या काम आया ? स्थूल क्रिया करनेमें स्थूलशरीर काम आता है । चिन्तन, मनन, ध्यान आदि करनेमें सूक्ष्मशरीर काम आता है । स्थिरता, समाधिमें कारणशरीर काम आता है । शरीर और उसके द्वारा होने वाली क्रियाएँ संसार के काम आती हैं । हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है; अतः उसके लिये तीनों शरीर और उसकी क्रियाएँ कुछ काम नहीं आतीं । चिन्मय सत्तामात्र में कोई कमी नहीं आती; क्योंकि सत्ता एक ही हो सकती है, दो हो सकती ही नहीं । अतः हमें किसी साथी की जरूरत नहीं है । इस प्रकार न तो क्रिया के साथ सम्बन्ध (कर्तृत्व) हो, न अप्राप्त वस्तु के साथ सम्बन्ध (कामना) हो और न प्राप्त वस्तु के साथ सम्बन्ध (ममता) हो तो प्रकृति के साथ तादात्म्य नहीं रहेगा । प्रकृति से तादात्म्य न रहने पर प्रकृति में क्रिया तो रहती है, पर कोई कर्ता और भोक्ता नहीं रहता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।३२।।

जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होने से कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देह में लिप्त नहीं होता ।

व्याख्या—

चिन्मय सत्ता एक ही है, पर अहंता के कारण वह अलग-अलग दीखती है । अपरा प्रकृति के अंश ‘अहम्‌’ को पकड़ने के कारण यह जीव ‘अंश’ कहलाता है (गीता १५ । ७) । अगर यह अहम्‌ को न पकड़े तो एक सत्ता-ही-सत्ता है । सत्ता के सिवाय सब कल्पना है । वह चिन्मय सत्ता सब कल्पनाओं का आधार, अधिष्ठान, प्रकाशक और आश्रय है । उस सत्तामें एकदेशीयपना नहीं है । वह चिन्मय सत्ता सर्वव्यापक है । सम्पूर्ण सृष्टि (क्रियाएँ और पदार्थ) उन सत्ताके अन्तर्गत है । सृष्टि तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती है, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है । तात्पर्य है कि चिन्मय सत्ता न शरीरस्थ है और न प्रकृतिस्थ है, प्रत्युत आकाशकी तरह सर्वत्र स्थित (सर्वगत) है-‘नित्यः सर्वगतः’ (गीता २ । २४) । वह सम्पूर्ण शरीरोंके बाहर-भीतर सर्वत्र परिपूर्ण है । वह सर्वव्यापी सत्ता ही हमारा स्वरूप है और वही परमात्मतत्त्व है ।

सत्ता में एकदेशीयता अहम्‌ के कारण दीखती है । वह अहम्‌ सुखलोलुपता पर टिका हुआ है । साधन करते हुए भी साधक जहाँ है, वहीं सुख भोगने लग जाता है-‘सुखसङ्गेन बध्नाति’ (गीता १४ । ६) । यह सुखलोलुपता गुणातीत होने तक रहती है । अतः इसमें साधक को बहुत सावधान रहना चाहिये और सावधानीपूर्वक सुखलोलुपता से बचना चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।।

हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणों से रहित होने से अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है । यह शरीर में रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है ।

व्याख्या—

जैसे मकान में रहते हुए भी हम मकान से अलग हैं इसे ही शरीर में रहते हुए मानने पर भी हम स्वयं शरीर से अलग हैं । स्वयं अनादि है, पर शरीर आदिवाला है । स्वयं निर्गुण है, पर शरीर गुणमय है । स्वयं परमात्मा है, पर शरीर अनात्मा है । स्वयं अव्यय है, पर शरीर नाशवान्‌ है । इसलिये अज्ञानी मनुष्य के द्वारा स्वयं को शरीर में स्थित माननेपर भी वास्तवमें वह शरीरमें स्थित नहीं है अर्थात्‌ शरीरसे सर्वथा असम्बद्ध है--‘न करोति न लिप्यते’ । कारण कि शरीर का सम्बन्ध तो संसार के साथ है, पर स्वयं का सम्बन्ध परमात्मा के साथ है । अतः वास्तव में स्वयं कभी शरीरस्थ हो सकता ही नहीं; परन्तु इस वास्तविकता की तरफ ध्यान न देने के कारण मनुष्य को शरीरस्थ मान लेता है ।

‘न करोति न लिप्यते’--यह साधनजन्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः स्वाभाविक है । तात्पर्य है कि स्वयं में लेशमात्र भी कर्तृत्व-भोक्‍तृत्व नहीं है-यह स्वतःसिद्ध बात है । इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं है अर्थात्‌ इसके लिये कुछ करना नहीं है । अतः कर्तृत्व-भोक्‍तृत्व को मिटाना नहीं है, प्रत्युत् इनको अपने में स्वीकार नहीं करना है, इनके अभाव का अनुभव करना है; क्योंकि वास्तव में ये अपने में हैं ही नहीं ! इसलिये साधक को अपने में निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व का अनुभव करना चाहिये । अपने में निरन्तर अकर्तृत्व और अभोक्‍तृत्व का अनुभव होना ही जीवन्मुक्ति है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।३०।।

जिस कालमें साधक प्राणियों के अलगअलग भावों को एक प्रकृति में ही स्थित देखता है और उस प्रकृति से ही उन सब का विस्तार देखता है, उस काल में वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।

व्याख्या—

सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणियों के स्थूल-सूक्ष्म तथा कारणशरीर एक प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृतिमें ही स्थित रहते हैं और प्रकृतिमें ही लीन होते हैं-इस प्रकार देखनेवाला ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है अर्थात्‌ प्रकृतिसे अतीत स्वतःसिद्ध अपने स्वरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति।।२९।।

जो सम्पूर्ण क्रियाओं को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपनेआप को अकर्ता देखता (अनुभव करता) है, वही यथार्थ देखता है।

व्याख्या—

जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, वे सब-की-सब प्रकृतिविभाग में ही होती हैं । प्रकृतिके द्वारा होनेवाली क्रियाओं को ही गीता में कहीं गुणों से होनेवाली और कहीं इन्द्रियों से होनेवाली क्रियाएँ कहा गयी है; जैसे-सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं--‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः’ (३ । २७); गुण ही गुणों में परत रहे हैं--‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (३ । २८); गुणों के सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं--‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति’ (१४ । २९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियों के विषयमें बरत रही हैं--‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते (५ । ९) आदि ।

तात्पर्य है कि क्रियामात्र प्रकृतिजन्य ही है । अतः प्रकृति कभी किंचिन्मात्र भी अक्रिय नहीं होती और पुरुषमें कभी किंचिन्मात्र भी क्रिया नहीं होती । इसलिये गीतामें आया है कि तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी ‘मैं’ (स्वयं) लेशमात्र भी कुछ नहीं करता ‘हूँ’ ऐसा अनुभव करता है--‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित्‌’ (५ । ८) स्वयं न करता है, न करवाता है-‘नैव कुर्वन्न कारयन्‌’ (५ । १३); यह पुरुष शरीरमें रहता हुअ भी न करता है, न लिप्त होता है-‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (१३ । ३१); जो आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है--‘तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं......’ (१८ । १६) आदि ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्।।२८।।

क्योंकि सब जगह समरूप से स्थित ईश्वर को समरूप से देखनेवाला मनुष्य अपनेआप से अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगति को प्राप्त हो जाता है ।

व्याख्या—

जो मनुष्य स्थावर-जंगम, चर-अचर आदि सम्पूर्ण प्राणियोंमें समानरूपसे परिपूर्ण परमात्मतत्त्व के साथ अपनी अभिन्नता का अनुभव करता है, वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता । शरीरके जन्म, मृत्यु, रोग आदि विकारोंको अपने विकार मानना ही अपने द्वारा अपनी हत्या करना अर्थात्‍ अपनेको जन्म-मृत्युके चक्करमें डालना है ।

वास्तवमें सत्ताईसवें-अट्ठाईसवें श्लोकों में आत्माका ही वर्णन है, परन्तु ‘परमेश्‍वर’ तथा ‘ईश्‍वर’ नाम आने से इन श्लोकों की व्याख्या में परमात्मा का वर्णन किया गया है; क्योंकि आत्मा का परमात्मा से साधर्म्य है (गीता १३ । २२) ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।२७।।

जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियों में परमात्मा को नाशरहित और समरूप से स्थित देखता है, वही वास्तव में सही देखता है ।

व्याख्या—

जैसे-आकाशमें कभी सूर्य का प्रकाश फैल जाता है, कभी रातका अँधेरा छा जाता है, कभी धुआँ छा जाता है, कभी बादल छा जाते हैं, कभी बिजली चमकती है, कभी वर्षा होती है, कभी ओले गिरते हैं, कभी गर्जना होती है; परन्तु आकाशमें कोई फर्क नहीम पड़ता । वह ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहता है । इसी प्रकार सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मसत्तामें कभी महासर्ग और महाप्रलय होता है, कभी सर्ग और प्रलय होता है, कभी जन्म और मृत्यु होती है, कभी अकाल पड़ता है, कभी बाढ़ आती है, कभी भूकम्प आता है, कभी घमासान युद्ध होता है; परन्तु सत्ता ज्यों-की-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहती है । बद्ध हो या मुक्त, पापी हो या धर्मात्मा, यह निर्विकार सत्ता दोनोंमें समानरूपमें स्थित रहती है ।

प्रतिक्षण विनाशकी तरफ जानेवाले प्राणियोंमें विनाशरहित, सदा एकरूप रहनेवाले परमात्माको जो निर्लिप्त-निर्विकार देखता है, वह वास्तवमें सही देखता है । तात्पर्य है कि जो परिवर्तनशील, नाशवान्‌ शरीरके साथ स्वयंको देखता है, उसका देखना सही नहीं है । परन्तु जो सदा ज्यों-के-त्यों निर्लिप्त-निर्विकार रहनेवाले परमात्मतत्त्वके साथ स्वयंको अभिन्नरूपसे देखता है, उसका देखना ही सही है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।२६।।

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुए समझो।

व्याख्या—

चर-अचर, स्थावर-जंगम आदि जितने भी प्राणी हैं, वे सब-के-सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सम्बन्धसे ही पैदा होते हैं । क्षेत्रज्ञ (प्रकृतिस्थ पुरुष) शरीरको मैं, मेरा तथा मेरे लिये मान लेता है-- यही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग है ।

पूर्वपक्ष—

संयोग सजातीयता में ही होता है, फिर विजातीय क्षेत्र (जड़)-के साथ क्षेत्रज्ञ (चेतन)-का संयोग कैसे सम्भव है ?

उत्तरपक्ष—

ठीक है, जैसे अंधकार और सूर्य का संयोग नहीं हो सकता, ऐसे ही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भी संयोग नहीं हो सकता, तथापि परमात्मा का अंश होने के कारण क्षेत्रज्ञ (जीव)-में यह शक्ति है कि वह विजातीय वस्तु को भी पकड़ सकता है, उसके साथ अपना सम्बन्ध मान सकता है । उसे यह स्वतन्त्रता परमात्मा के द्वारा प्रदत्त है । इस स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करके ही क्षेत्रज्ञ ने संसार के साथ अपना सम्बन्ध मान लिया और जन्म-मरणके चक्रमें पड़ गया (गीता १३ । २१) ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।२५।।

दूसरे मनुष्य इस प्रकार (ध्यानयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, आदि साधनोंको) नहीं जानते, केवल (जीवन्मुक्त महापुरुषों से) सुनकर उपासना करते हैं, ऐसे वे सुनने के परायण मनुष्य भी मृत्यु को तर जाते हैं।

व्याख्या—

जिन मनुष्योंमें शास्त्रों को तथा उनमें वर्णित साधनोंको समझनेकी योग्यता नहीं है, जिनका विवेक कमजोर है, पर जिनके भीतर मृत्यु से तरने (मुक्ति)-की उत्कट अभिलाषा है, ऐसे मनुष्य भी जीवनमुक्त सन्त-महात्माओं की आज्ञा का पालन करके मृत्यु को तर जाते हैं अर्थात्‌ तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१८)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।२४।।

कई मनुष्य ध्यानयोग के द्वारा, कई सांख्ययोग के द्वारा और कई कर्मयोग के द्वारा अपनेआप से अपनेआप में परमात्मतत्त्व का अनुभव करते हैं ।

व्याख्या—

जैसे पूर्वश्लोक में विवेक के महत्त्व को मुक्ति का उपाय बताया, ऐसे ही यहाँ ध्यानयोग आदि अन्य मुक्ति के उपाय बताते हैं । गीता में ध्यानयोग से (६ । २८), सांख्ययोग से (२ । १५) और कर्मयोग से (२ । ७१)-तीनों परमात्मप्राप्ति की बात कही गयी है । ये तीनों परमात्मप्राप्ति के स्वतन्त्र साधन हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।२३।।

इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य अलग अलग जानता है, वह सब तरह का बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।

व्याख्या—

जो साधक पूर्वश्लोक में आये ‘देहेऽस्मिन्‌ पुरुषः परः’ के अनुसार अपनेको देहसे सर्वथा अनुभव कर लेता है, वह अपने वर्ण-आश्रम आदिके अनुसार समस्त कर्तव्य-कर्म करते हुए भी पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता; क्योंकि पुनर्जन्म होनेमें गुणोंका संग ही कारण है (गीता १३ । २१) । जैसे छाछ्से निकला हुआ मक्खन पुनः छाछ्में मिलकर दही नहीं बनता, ऐसे ही प्रकृतिजन्य गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर मनुष्य पुनः गुणोंसे नहीं बँधता (गीता ४ । ३५) ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट. १६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।२२।।

यह पुरुष प्रकृति (शरीर) के साथ सम्बन्ध रखने से उपद्रष्टा, उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे अनुमन्ता, अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे भर्ता, उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे भोक्ता, और अपनेको उसका स्वामी माननेसे महेश्वर बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष परमात्मा कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्धरहित) ही है।

व्याख्या—

वास्तवमें पुरुष (चेतन) ‘पर’ ही है; पर अन्यके सम्बन्धसे वह उपद्र्ष्टा, अनुमन्ता आदि बन जाता है । जैसे, मनुष्य पुत्रके सम्बन्धसे ‘पिता’, ‘पिताके सम्बन्धसे ‘पुत्र’, पत्नीके सम्बन्धसे ‘पति’, बहनके सम्बन्धसे ‘भाई’ आदि बन जाता है । ये सम्बन्ध अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही हैं, ममता करनेके लिये नहीं । वास्तविक स्वरूप तो ‘पर’ अर्थात्‌ सम्बन्ध-रहित ही है ।

यहाँ उपद्र्ष्टा, अनुमन्ता आदि अनेक उपाधियोंका तात्पर्य एकतामें है कि चेतन-तत्त्व वास्तवमें एक ही है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।२१।।

प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणों का भोक्ता बनता है और गुणों का सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है।

व्याख्या—

‘मैं’ जड़ (प्रकृति) है और ‘हूँ’ चेतन (पुरुष) है । ‘मैं हूँ’-यह जड़-चेतनका तादात्म्य है । इस ‘मैं हूँ’ में ही कर्तापन तथा भोक्तापन रहता है । यदि साधक ‘मैं’ को मिटा दे तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ रहेगा । जैसे लोहे और अग्नि में तादात्म्य न रहने से लोहा पृथ्वी पर ही रह जाता है और अग्नि निराकार अग्नि-तत्त्व में लीन हो जाती है, ऐसे ‘मैं’ (अहम्‌) तो प्रकृतिमें ही रह जाता है और ‘हूँ’ (‘है’ का स्वरूप होनेसे) ‘है’ में ही विलीन हो जाता है । मेरा कुछ नहीं है और मुझे कुछ नहीं चाहिये-इन दो बातोंकी सिद्धि होते ही ‘हूँ’ सत्तामात्रमें अर्थात्‌ ‘है’ में विलीन हो जाती है । तात्पर्य है कि ‘मैं’ (जड़-अंश) जड़में और ‘हूँ’ (चेतन-अंश) चेतन तत्त्वमेम विलीन हो जाता है । इस प्रकार जड़-चेतनकी ग्रन्ति छूट जाती है और फिर एक ‘है’ (सत्तामात्र)- के सिवाय कुछ नहीं रहता । ‘है’ में कर्तापन और भोक्तापन नहीं है । तात्पर्य है कि भोगोंमें ‘हूँ’ खिंचता है, ‘है’ नहीं खिंचता । ‘हूँ’ ही कर्ता-भोक्ता बनता है, ‘है’ कर्ता-भोक्ता नहीं बनता । अतः साधक ‘हूँ’ को न मानकर ‘है’ को ही माने अर्थात्‌ अनुभव करे ।

सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण कोई बाधा नहीं देते; परन्तु इनका संग करनेसे जीव ऊर्ध्वगति, मध्यगति अथवा अधोगतिमें जाता है । गुणोंका संग जीव स्वयं करता है । असंगता जीवका स्वरूप है-‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदा० ४ । ३ । १५) । यदि जीव गुणोंका संग न करे तो जन्म-मरण हो ही नहीं सकता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । 

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥१९॥ 
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरूच्यते । 
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरूच्यते ॥२०॥ 

प्रकृति और पुरुष-दोनों को ही तुम अनादि समझो और विकारों को तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न समझो। कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियाओं को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःख के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा जाता है। 

व्याख्या- भगवान क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभाग का ही प्रकृति और पुरुष के नाम से पुनः वर्णन करते हैं। शरीर तथा संसार प्रकृति-विभाग में और आत्मा और परमात्मा पुरुष-विभाग में हैं। जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं, ऐसे ही इनके भेद का ज्ञान अर्थात विवेक भी अनादि है। अतः विवेक-दृष्टि से देखें तो ये दोनों विभाग एक-दूसरे से बिलकुल असम्बद्ध हैं। 
विकृतिमात्र जड़ में ही होती है, चेतन में नहीं। अतः वास्तव में सुखी-दुःखी होना चेतन का धर्म नहीं है, प्रत्युत जड़ के संग से अपने को सुखी-दुःखी मानना चेतन का स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखी-दुःखी नहीं होता, प्रत्युत (सुखाकार-दुःखाकार वृत्ति से मिल कर) अपने को सुखी-दुःखी मान लेता है। चेतन में एक-दूसरे से विरुद्ध सुख-दुःख रूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं? दो भाव परिवर्तनशील प्रकृति में हो हो सकते हैं। जो अपरिवर्तनशील है, उसके दो भाव अथवा रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण विकार परिवर्तनशील में ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं जों-का-त्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृति के संग से उन विकारों को अपने में आरोपित करता रहता है। 
भगवान शक्तिमान हैं और प्रकृति उनकी शक्ति है। ज्ञान की दृष्टि से शक्ति और शक्तिमान-दोनों अलग-अलग हैं; क्योंकि शक्ति में तो परिवर्तन (घटना-बढ़ना) होता है, पर शक्तिमान ज्यों-का-त्यों रहता है। परन्तु भक्ति की दृष्टि से देखें तो शक्ति और शक्तिमान दोनों अभिन्न हैं; क्योंकि शक्ति को शक्तिमान से अलग नहीं कर सकते अर्थात शक्तिमान के बिना शक्ति की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ज्ञान और भक्ति-दोनों की बात रखने के लिये ही भगवान ने प्रकृति को न अनन्त कहा है, न सान्त, प्रत्युत ‘अनादि’ कहा है। कारण कि यदि प्रकृति को अनन्त (नित्य) कहें तो ज्ञान का खण्डन हो जायगा; क्योंकि ज्ञान की दृष्टि से प्रकृति की सत्ता ही नहीं है- ‘नासतो विद्यते भावः’[1]। यदि प्रकृति को सान्त (अनित्य) कहें तो भक्ति का खण्डन हो जायगा; क्योंकि भक्ति की दृष्टि से प्रकृति भगवान की शक्ति होने से भगवान से अभिन्न है- ‘सदसच्चाहम्’[2]। 
वास्तव में परमात्मा का स्वरूप ‘समग्र’ है। परमात्मा में कोई शक्ति न हो-ऐसा सम्भव ही नहीं है। यदि परमात्मा को सर्वथा शक्तिरहित मानें तो परमात्मा एकदेशीय (सीमित) ही सिद्ध होंगे। उनमें शक्ति का परिवर्तन अथवा अदर्शन तो हो सकता है, पर शक्ति का अभाव नहीं हो सकता। शक्ति कारण रूप से उन में रहती ही है, अन्यथा परमात्मा के सिवाय शक्ति (प्रकृति)-के रहने का स्थान कहाँ होगा? इसलिये यहाँ प्रकृति और पुरुष-दोनों को अनादि कहा गया है। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।१८।।

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेप से कहा गया। मेरा भक्त इस को तत्त्व से जानकर मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—

समग्र परमात्माका ज्ञान वास्तवमें भक्तिसे ही हो सकता है । इसलिये साधकको भक्त होना चाहिये । क्षेत्रको तत्त्वसे जाननेपर क्षेत्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है । ज्ञान (साधन-समुदाय)-को तत्त्वसे जाननेपर देहाभिमान मिट जाता है । ज्ञेयको तत्त्वसे जाननेपर उसकी प्राप्ति हो जाती है ।

यहाँ आये ‘मद्भावायोपपद्यते’ पदको गीतामें कई प्रकारसे कहा गया है; जैसे-‘मद्भावमागताः’ (४ । १०), ‘मम साधर्म्यमागताः’ (१४ । २), ‘मद्भावं सो$धिगच्छति’ (१४ । १९) ‘मद्भाव’ का अर्थ है- मुझ परमात्माकी सत्ता । यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक हीहोती है, दो नहीं । भगवान्‌ने ज्ञान और भक्ति-दोनोंमें ही अपने भावकी प्राप्ति बतायी है । ‘ज्ञान’ में इसका तात्पर्य है-ब्रह्मसे साधर्म्य होना अर्थात्‌ जैसे ब्रह्म सत्‌-चित्‌-आनन्दस्वरूप है, ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषका भी सत्‌-चित्‌-आनन्दरूप होना । ‘भक्ति’ में इसका तात्पर्य है-भक्तकी भगवान्‌के साथ आत्मीयता अर्थात्‌ अभिन्नता होना ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१७।।

वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियों का भी ज्योति और अज्ञान से अत्यन्त परे कहा गया है । वह ज्ञानस्वरूप, जाननेयोग्य, ज्ञान (साधनसमुदाय) से प्राप्त करने योग्य और सबके हृदय में विराजमान है ।

व्याख्या—

बारहवें से सत्रहवें श्लोक तक जिस ज्ञेय-तत्त्व का वर्णन हुआ है, वह भगवान्‌ का समग्ररूप ही है । कारण कि इसमें निर्गुण-निराकार (बारहवाँ श्लोक), सगुण-निराकार (तेरहवाँ श्लोक) और सगुण-साकार (सोलहवाँ श्लोक)-तीनों ही रूपोंका वर्णन हुआ है ।

‘ज्योति’ नाम प्रकाश (ज्ञान)-का है । शब्दका प्रकाशक कान है । स्पर्शका प्रकाशक त्वचा है । रूपका प्रकाशक नेत्र है । रसका प्रकाशक जिह्वा है । गन्धका प्रकाशक नासिका है । इन पाँचों इन्द्रियोंका प्रकाशक मन है । मनका प्रकाशक बुद्धि है । बुद्धिका प्रकाशक स्वयं है । स्वयंका प्रकाशक परमात्मा है । स्वयंप्रकाश परमात्माका कोई भी प्रकाशक नहीं है । जैसे सूर्यमें अन्धकार कभी आता नहीं, ऐसे ही परम-प्रकाशक परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं, आ सकता ही नहीं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.११)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।१६।।

वे परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियों में विभक्त की तरह स्थित हैं । वे जाननेयोग्य परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करनेवाले, उनका भरणपोषण करने वाले और संहार करनेवाले हैं ।

व्याख्या—

जैसे संसार भौतिक दृष्टिसे एक है, ऐसे ही परमात्मा भी एक (अविभक्त) हैं । जैसे संसार भौतिक दृष्टिसे एक होते हुए भी अनेक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिके रूपमें दीखता है, ऐसे ही परमात्मा एक होते हुए भी अनेक रूपोंमें दीखते हैं । तात्पर्य है कि परमात्मा एक होते हुए भी अनेक हैं और अनेक होते हुए भी एक हैं । वास्तविक सत्ता कभी दो हो सकती ही नहीं, क्योंकि दो होनेसे असत्‌ आ जायगा ।

उत्पन्न करनेवाले भी परमात्मा हैं और उत्पन्न होनेवाले भी परमात्मा हैं । भरण-पोषण करनेवाले भी परमात्मा हैं और जिनका भरण-पोषण होता है, वे भी परमात्मा हैं । संहार करनेवाले भी परमात्मा हैं और जिनका संहार होता है, वे भी परमात्मा हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।१५।।

वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहरभीतर परिपूर्ण हैं और चरअचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूरसेदूर तथा नजदीकसेनजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं।

व्याख्या—

परमात्माको बारहवें श्लोकमें ‘ज्ञेय’ कहा गया है, पर प्रस्तुत श्लोकमें उन्हें ‘अविज्ञेय’ कहा गया है । इसका तात्पर्य यह है कि परमात्मा ज्ञेय होनेपर भी संसार की तरह ज्ञेय नहीं हैं । जैसे संसार इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि से जाना जाता है, ऐसे परमात्मा इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि से नहीं जाने जाते । इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि प्रकृतिके कार्य हैं । प्रकृति का कार्य प्रकृति को भी पूरा नहीं जान सकता, फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्मा को जान ही कैसे सकता है ? परमात्माको तो मानकर स्वीकार करना पड़ता है; क्योंकि स्वीकृति स्वयं में होती है । स्वयं की परमात्मा के साथ एकता है, इसलिये परमात्मा की प्राप्ति भी स्वीकृति से होती है, चिन्तन-मनन-श्रवण-वर्णन करनेसे नहीं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरणपोषण करनेवाले हैं तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं।

व्याख्या—

एक परमात्माके सिवाय और किसीकी भी सत्ता नहीं है ? हम जो कुछ भी कहते, सुनते, पढ़ते, सोचते हैं, वह परमात्मा से भिन्न नहीं है । सब से रहित भी वही है और सब के सहित भी वही है ।

इस प्रकरणमें ब्रह्मकी मुख्यता होने पर भी प्रस्तुत श्लोक में समग्र परमात्मा का ज्ञेय-तत्त्व के रूप में वर्णन हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि समग्र की मुख्यता ज्ञान और भक्ति दोनों में है ।

ॐ तत्सत् !