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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
 
   यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । 
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: ॥११॥  
 
यत्न करने वाले योगी लोग अपने-आप में स्थित इस परमात्मतत्त्व का अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करने पर भी इस तत्त्व का अनुभव नहीं करते।  
 
व्याख्या- 
सदा न भोग साथ रहता है, न संग्रह साथ रहता है- यह विवेक मनुष्य में स्वतः है। परन्तु जो मनुष्य शास्त्र पढ़ते हुए, सत्संग करते हुए, साधन करते हुए भी अपने विवेक की तरफ ध्यान नहीं देते, भोग और संग्रह से अलगाव का अनुभव नहीं करते, वे मनुष्य ‘अकृतात्मा’ हैं। ऐसे मनुष्यों को अठारहवें अध्याय के सालहवें श्लोक में भगवान ने ‘अकृतबुद्धि’ और ‘दुर्मति’ कहा है। यद्यपि परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, तथापि भीतर में राग, आसक्ति, सुखबुद्धि पड़ी रहने से साधन करते हुए भ्ज्ञी परमात्मा को नहीं जानते। कारण कि भोग तथा संग्रह में रुचि रखने वाले मनुष्य का विवेक स्थिर नहीं रहता।  
पूर्वश्लोक में जिन्हें ‘विमूढाः’ कहा गया है, उन्हीं को यहाँ ‘अचेतसः कहा गया है। गुणों से मोहित होने के कारण वे न तो विषयेां के विभाग को जानते हैं और न स्वयं के विभाग को ही जानते हैं अर्थात भेागों का संयोग-वियोग अलग है और स्वयं अलग है-यह नहीं जानते।  
सातवें से ग्यारहवें श्लोक तक के इस प्रकरण में भगवान यह बताना चाहते हैं कि मेरा अंश जीवात्मा सर्वथा अलग है और जिस सामग्री (शरीरादि पदार्थ और क्रिया)- को वह भूल से अपनी मानता है, वह सर्वथा अलग है। सूर्य और अमावस्या की रात्रि की तरह दोनों का विभाग ही अलग-अलग है। उनका परस्पर संयोग होना सम्भव ही नहीं है। जो उपर्युक्त जड़ और चेतन-दोनों के विभाग को सर्वथा अलग-अलग देखता है, वही ज्ञानी और योगी है। परन्तु जो दोनों को मिला हुआ देखता है, वह अज्ञानी और भोगी है।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।१०।।

हे भरतवंशोद्भव ! अर्जुन रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है ।

व्याख्या—

दो गुणों को दबाकर एक गुण बढ़ता है, बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है और विजय करके मनुष्य को बाँध देता है । जो गुण बढ़ता है, उसकी मुख्यता हो जाती है और दूसरे गुणों की गौणता हो जाती है । यह गुणों का स्वभाव है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।१५।।

वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहरभीतर परिपूर्ण हैं और चरअचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूरसेदूर तथा नजदीकसेनजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं।

व्याख्या—

परमात्माको बारहवें श्लोकमें ‘ज्ञेय’ कहा गया है, पर प्रस्तुत श्लोकमें उन्हें ‘अविज्ञेय’ कहा गया है । इसका तात्पर्य यह है कि परमात्मा ज्ञेय होनेपर भी संसार की तरह ज्ञेय नहीं हैं । जैसे संसार इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि से जाना जाता है, ऐसे परमात्मा इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि से नहीं जाने जाते । इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि प्रकृतिके कार्य हैं । प्रकृति का कार्य प्रकृति को भी पूरा नहीं जान सकता, फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्मा को जान ही कैसे सकता है ? परमात्माको तो मानकर स्वीकार करना पड़ता है; क्योंकि स्वीकृति स्वयं में होती है । स्वयं की परमात्मा के साथ एकता है, इसलिये परमात्मा की प्राप्ति भी स्वीकृति से होती है, चिन्तन-मनन-श्रवण-वर्णन करनेसे नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।१५।।

जिससे किसी प्राणी को उद्वेग नहीं होता और जिसको खुद भी किसी प्राणी से उद्वेग नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेगसे रहित है, वह मुझे प्रिय है।

व्याख्या—

भगवान्‌ के सिवाय अन्य की सत्ता मानने से ही उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि होता हैं । भक्त की दृष्टिमें एक भगवान्‌ के सिवाय अन्य कोई सत्ता है ही नहीं, फिर वह किससे उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि करे और क्यों करे ?

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।।१६।।

हे विश्वरूप ! हे विश्वेश्वर ! आपको मैं अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब ओर से अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ । मैं आपके न आदि को, न मध्य को और न अन्त को ही देख रहा हूँ।

व्याख्या—

भगवान्‌ के एक अंश में भी अनन्तता है । भगवान्‌ साकार हों या निराकार, सगुण हों या निर्गुण, बड़े-से-बड़े या छोटे-से-छोटे, उनका अनन्तपना ज्यों-का-त्यों रहता है ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अर्जुन उवाच

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।।१२।। आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।।१३।।

अर्जुन बोले –

परम ब्रह्म, परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सब के सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।

व्याख्या—

निर्गुण-निराकार के लिये ‘परं ब्रह्म’, सगुण-निराकारके लिये ‘परं धाम’ और सगुण-साकार के लिये ‘पवित्रं परमं भवान्‌’ पदों का प्रयोग करके अर्जुन भगवान्‌ से मानो यह कहते हैं कि समग्र परमात्मा आप ही हैं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतस:।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता:॥ १२॥
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता:।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥ १३॥

जो आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका ही आश्रय लेते हैं, ऐसे अविवेकी मनुष्योंकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभकर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् उनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान (समझ) सत्-फल देनेवाले नहीं होते।
परन्तु हे पृथानन्दन! दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महात्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं।

व्याख्या—

जो मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करनेमें लगे रहते हैं, दूसरोंके दुःखकी परवाह नहीं करते, वे ‘आसुरी’ स्वभाववाले होते हैं । जो स्वर्थसिद्धिमें बाधा लगनेपर क्रोधवश दूसरोंक नाश कर देते हैं, वे ‘राक्षसी’ स्वभाववाले होते हैं । जो बिना किसी कारणके दूसरोंको कष्ट पहुँचाते हैं, वे ‘मोहिनी’ स्वभाववाले होते हैं । आसुरी, राक्षसी और मोहिनी- तीनों ही स्वभाववाले मनुष्य आसुरी सम्पत्तिके अन्तर्गत आ जाते हैं, जो चौरासी लाख योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति करानेवाली है ।

व्याख्या—

जो जिसके महत्त्वको जितना अधिक जानता है, वह उतना ही उसमें लग जाता है । जिन्होंने भगवान्‌को ही सर्वोपरि मान लिया है, वे दैवी स्वभाववाले महात्मा पुरुष भगवान्‌में ही लग जाते हैं । भोग तथा संग्रहकी तरफ उनकी वृत्ति कभी जाती ही नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधिनी आठवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


आब्रह्राभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥१६॥

हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती वाले हैं अर्थात वहाँ जाने पर पुनः लौटकर संसार में आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।

व्याख्या- भोग और संग्रह की आसक्ति से ही पुनर्जन्म होता है। इसलिये जिस मनुष्य में भोग और संग्रह की आसक्ति है, वह यदि पुण्यकर्मों के प्रभाव से ब्रह्मलोक तक चला जाय तो भी उसे लौटकर जन्म-मरण में अर्थात दुःखालय संसार में आना ही पड़ता है। ब्रह्मलोक तक सभी लोकों की प्राप्ति का फल है। जब तक प्रत्येक कर्म का आरम्भ और अन्त होता है तो फिर उसका फल अविनाशी कैसे होगा? परन्तु परमात्म की प्राप्ति कर्मों का फल नहीं है। अतः परमात्मा की प्राप्ति होने पर फिर वहाँ से लौटकर दुःखालय संसार में नहीं आना पड़ता।
ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)


ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ १२॥

(और तो क्या हूँ—) जितने भी सात्त्विक भाव हैं और जितने भी राजस तथा तामस भाव हैं, वे सब मुझसे ही होते हैं—ऐसा उनको समझो। परन्तु मैं उनमें और वे मुझमें नहीं हैं।

व्याख्या—

शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो सात्त्विक, राजस तथा तामस भाव, क्रिया, पदार्थ आदि ग्रहण किये जाते हैं, वे सब भगवान्‌ ही हैं । ‘मैं उनमें और वे मुझमें नहीं हैं’-ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि साधककी दृष्टि सात्त्विक, राजस तथा तामस भावों की ओर न जाकर भगवान्‌की ओर ही जानी चाहिये । तदि उसकी दृष्टि भावों (गुणों)-की ओर जायेगी तो वह उनमें उलझकर जन्म-मरण्में चला जायगा (गीता १३ । २१) ।

सम्पूर्ण सात्त्विक, राज और तामस भाव भगवत्स्वरूप हैं- यह सिद्ध पुरुषोंकी दृष्टि है, और भगवान्‌ उनमें और वे भगवान्‌में नहीं हैं-यह साधकोंकी दृष्टि है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.१०)

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित: ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह: ॥१० ॥

भोगबुद्धि से संग्रह न करने वाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीर को वश में रखने वाला योगी अकेला एकान्त में स्थित होकर मन को निरन्तर (परमात्मा में) लगाये।

व्याख्या- ध्यान योग का अधिकारी वह है, जो अपने सुखभोग के लिये विभिन्न वस्तुओं का संग्रह नहीं करता, जिसके मन में भोगों की कामना नहीं है और जिसका अन्तःकरण तथा शरीर उसके वश में है। तात्पर्य है कि ध्यानयोग के साधक का उद्देश्य केवल परमात्मा को प्राप्त करने का हो, लौकिक सिद्धियों को प्राप्त करने का नहीं।

पूर्वपक्ष- युद्ध के समय में अर्जुन को ध्यानयोग का उपदेश देने का क्या औचित्य है?

उत्तरपक्ष- अर्जुन पाप से डरते थे, युद्ध से नहीं। उन्हें युद्ध से अधिक अपने कल्याण (श्रेय) की चिन्ता थी[1]। इसलिये कल्याण के जितने मुख्य साधन हैं, उन सबका भगवान गीता में वर्णन करते हैं। इसी कारण गीता मानव मात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

Saturday, 4 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥ ११॥

कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ, शरीर, मन और बुद्धिके द्वारा अन्त:करणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।

व्याख्या—

ममतका सर्वथा नाश होना ही अन्तःकरणकी शुद्धि है । कर्मयोगी साधक शरीर-इद्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना तथा अपने लिये न मानते हुए, प्रत्युत संसारका तथा संसारके लिये मानते हुए ही कर्म करते हैं । इस प्रकार कर्म करते-करते जब ममताका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अन्तःकरण पवित्र हो जाता है । पवित्र होनेपर अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वरूपमें स्थिति हो जाती है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 27 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१०)


किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ १६॥
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति:॥ १७॥

कर्म क्या है और अकर्म क्या है—इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अत: वह कर्म-तत्त्व मैं तुझे भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ (संसार-बन्धन)-से मुक्त हो जायगा।
कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मोंकी गति गहन है अर्थात् समझनेमें बड़ी कठिन है।

व्याख्या—

कामनाके कारण क्रिया ही फलजनक ‘कर्म’ बन जाती है । कामना बढ़नेपर ‘विकर्म’ (पाप) होते हैं । कामना का सर्वथा नाश होनेपर सभी कर्म ‘अकर्म’ हो जाते हैं अर्थात्‌ फल देने वाले नहीं होते ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 23 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१०)

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव:॥ १४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ १५॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्नकी उत्पत्ति वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे सम्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षर ब्रह्मसे प्रकट हुआ जान । इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म)-में नित्य स्थित है।

ॐ तत्सत् !

Monday, 24 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.१०)

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमहर्ति॥ १७॥

अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता।

व्याख्या—

जिस सत्‌-तत्त्वका अभाव विद्यमान नहीं है, वही अविनाशी तत्त्व है, जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है । अविनाशी होने के कारण तथा सम्पूर्ण जगत्‌में व्याप्त होनेके कारण उसका कभी कोई नाश कर सकता ही नहीं । नाश उसीका होता है, जो नाशवान्‌ तथा एक देशमें स्थित हो ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 12 October 2016

गीता प्रबोधनी - पहला अध्याय (पोस्ट.१०)

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिन:॥ ३६॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव॥ ३७॥

हे जनार्दन ! इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारकर हमलोगों को क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा। इसलिये अपने बान्धव इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि हे माधव! अपने कुटुम्बियों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?

ॐ तत्सत् !