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Friday, 12 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.२३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
  
  ब्रह्राणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । 
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥२७॥ 
 
क्योंकि ब्रह्म का और अविनाशी तथा शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं ही हूँ। 
 
व्याख्या- 
‘बह्म तथा अविनाशी अमृत का आश्रय मैं हूँ’- यह निर्गुण-निराकार की तथा ‘ज्ञानयोग’ की बात है। ‘शाश्वत धर्म का आश्रय मैं हू’- यह सगुण-साकार की तथा ‘कर्मयोग’ की बात है। ‘ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं हूँ’- यह सगुण-निराकार की तथा ‘ध्यानयोग’ की बात है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरी (सगुण-साकार की) उपासना करने से, मेरा आश्रय लेने से भक्त को ज्ञानयोग, कर्मयोग और ध्यानयोग-तीनों की सिद्धि हो जाती है। कारण कि समग्र भगवान के एक अंश में सब कुछ विद्यमान है। भगवान ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग आदि सबकी प्रतिष्ठा (आश्रय) हैं। 
 
ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु 
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः।।१४।। 
 
ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.२२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
  
  मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्राभूयाय कल्पते ॥२६॥  
 
और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है।  
 
व्याख्या- 
भक्ति से साधक जो भी चाहता है, उसी की प्राप्ति हो जाती है। जो साधक मुख्यरूप से ब्रह्म की प्राप्ति अर्थात् मुक्ति, तत्त्वज्ञान चाहता है, उसे भक्ति से ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है; क्योंकि ब्रह्म की प्रतिष्ठा भगवान ही हैं। ब्रह्म समग्र भगवान का ही एक अंग (स्वरूप) है। तेरहवें अध्याय के दसवें श्लोक में भी भक्ति को ज्ञानप्राप्ति का साधन बताया गया है।  श्रीमद्भागवत महापुराण में सगुण की उपासना को निर्गुण (सत्वादि गुणों से अतीत) बताया गया है; जैसे-‘मन्निकेतं तु निर्गुणम्’‘मत्सेवायां तु निर्गुणाआदि। इसलिये सगुणोपासक भक्त तीनों गुणों से अतीत हो जाता है।  सगुण भगवान भी गुणों के आश्रित नहीं हैं, प्रत्युत गुण उनके आश्रित हैं। जो सत्व-रज-तम गुणों के वश में है, उसका नाम ‘सगुण’ नहीं है, प्रत्युत जिसमें असीम ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि अनन्त दिव्य गुण नित्य विद्यमान रहते हैं, उसका नाम ‘सगुण’ है। भगवान के द्वारा सात्विक, राजस अथवा मासम क्रियाएँ तो हो सकती है, पर वे उन गुणों के वश में नहीं होते। भगवान की तरफ चलने से भक्त स्वतः और सुगमता से गुणातीत हो जाता है। इतना ही नहीं, उसे भगवान के समग्र रूप का भी ज्ञान हो जाता है और प्रेम भी प्राप्त हो जाता है।
 
ॐ तत्सत् !

Thursday, 11 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.२१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
  
समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन: । 
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति: ॥२४॥ 
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: । 
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते ॥२५॥  
 
जो धीर मनुष्य दुःख-सुख में सम तथा अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में सम रहता है; जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है; जो अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र- शत्रु के पक्ष्ज्ञ में सम रहता है और जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।  
 
व्याख्या- 
यहाँ भगवान ने सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय, निन्दा-स्तुति और मान-अपमान-ये आठ परस्पर विरुद्ध नाम लिये हैं, जिनमें साधारण मनुष्यों की तो विषमता हो ही जाती है। इन आठ कठिन स्थलों में जिसकी समता हो रखना सुगम हो जाता है। गुणातीत महापुरुष की इन आठों स्थलों में स्वतः स्वाभाविक समता रहती है।
 
ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.२०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
  
  उदासीनवदासीनो गुणैर्या न विचाल्यते । 
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेग्ङते ॥२३॥  
 
जो उदासीन की तरह स्थित है और जो गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही गुणों में बरत रहे हैं- इस भाव से जो (अपने स्वरूप में ही) स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।  
 
व्याख्या- 
तीन विभाग हैं-‘करना’, ‘होना’ और ‘है’। ‘करना’ होने में और ‘होना’ ‘है’ में बदल जाय तो अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है। जिसके अन्तःकरण में क्रिया और पदार्थ का महत्व है, ऐसा संसारी मनुष्य मानता है कि मैं क्रिया कर रहा हूँ-‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’[1]। जो कर्ता बनता है, उसे भोक्ता बनना ही पड़ता है। जिसमें विवेक की प्रधानता है, ऐसा साधक तो अनुभव करता है कि क्रिया हो रही है-गुणा गुणेषु वर्तन्ते’[2]अर्थात मैं कुछ भी नहीं करता हूँ- ‘नैव किन्चित्करोमीति’[3]। परन्तु जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है, ऐसा गुणातीत महापुरुष केवल सत्ता तथा ज्ञप्तिमात्र (‘है’) का ही अनुभव करता है- ‘योऽवतिष्ठति नेगते’। वह चिन्मय सत्ता सम्पूर्ण क्रियाओं में ज्यों-की-त्यों परिपूर्ण है। क्रियाओं का तो अन्त हो जाता है, पर चिन्मय सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। महापुरुष की दृष्टि क्रियाओं पर न रहकर स्वतः एकमात्र चिन्मय सत्ता (‘है’)- पर ही रहती है। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
  
अर्जुन उवाच 
कैर्लिग्ङैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । 
किमाचार: कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥२१॥  
 
श्रीभगवानुवाच- 
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । 
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२॥  
 
अर्जुन बोले- 
हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से युक्त होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है। 
 
श्रीभगवान बोले 
हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृत्ति तथा मोह- ये सभी अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जायँ तो भी गुणातीत मनुष्य इनसे द्वेष नहीं करता और ये सभी निवृत्त हो जायँ तो इनकी इच्छा नहीं करता।  
 
व्याख्या- 
वृत्तियाँ एक समान किसी की भी नहीं रहतीं। तीनों गुणों की वृत्तियाँ तो गुणातीत महापुरुष के अन्तःकरण में भी होती हैं, पर उसका उन वृत्तियों से राग-द्वेष नहीं होता। वृत्तियाँ अपने-आप आती और चली जाती हैं। गुणातीत महापुरुष की दृष्टि उधर जाती ही नहीं; क्योंकि उसकी दृष्टि में एक परमात्मतत्त्व के सिवाय और कुछ रहता ही नहीं। गुणातीत महापुरुष में ‘अनुकूलता बनी रहे, प्रतिकूलता मिट जाय’- ऐसी इच्छा नहीं होती। निर्विकारता का अनुभव होने पर उसे अनुकूलता- प्रतिकूलता का ज्ञान तो होता है, पर स्वयं पर उनका असर नहीं पड़ता। अन्तःकरण में वृत्तियाँ बदलती हैं, पर स्वयं उनसे निर्लिप्त रहता है। साधक पर भी वृत्तियों का असर नहीं पड़ना चाहिये; क्योंकि गुणातीत मनुष्य साधक का आदर्श होता है, साधक उसका अनुयायी होता है।  साधकमात्र के लिये यह आवश्यक है कि वह शरीर का धर्म अपने में न माने। वृत्तियाँ अन्तःकरण में हैं, अपने में नहीं। अतः साधक वृत्तियों को न तो अच्छा माने, न बुरा माने और न अपने में ही माने। कारण कि वृत्तियाँ तो आने-जाने वाली हैं, पर स्वयं निरन्तर रहने वाला है। वृत्तियाँ हम में नहीं होतीं, प्रत्युत अन्तःकरण में ही होती हैं। यदि वृत्तियाँ हम में होतीं तो जब तक हम रहते, तब तक वृत्तियाँ भी रहतीं। परन्तु यह सबका अनुभव है कि हम तो निरन्तर रहते हैं, पर वृत्तियाँ आती-जाती रहती हैं। वृत्तियों का सम्बन्ध प्रकृति के साथ है और हमारा (स्वयं का) सम्बन्ध परमात्मा के साथ है। इसलिये वृत्तियों के परिवर्तन का अनुभव करने वाला स्वयं एक ही रहता है। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१८)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । 
जन्ममृत्युजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्नते ॥२०॥ 
 
देहधारी (विवेकी मनुष्य) देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करने जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रूप दुःखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है। 
 
व्याख्या- 
मनुष्य मात्र के भीतर यह भाव रहता है कि मैं बना रहूँ, कभी मरूँ नहीं। वह अमर रहना चाहता है। अमरता की इस इच्छा से सिद्ध होता है कि वास्तव में वह अमर है। यदि वह अमर न होता तो उसमें अमरता की इच्छा भी नहीं होती। उदाहरणार्थ, हमें भूख और प्यास लगती है तो इससे सिद्ध होता है कि ऐसी वस्तु (अन्न और जल) है, जिससे भूख और प्यास मिट जाती है। यदि अन्न-जल न होते तो भूख-प्यास भी नहीं लगती। अतः अमरता स्वतःसिद्ध है[1]। परन्तु जब मनुष्य अपने विवेक को महत्व न देकर शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है अर्थात ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा मान लेता है, तब उसमें मृत्यु का भय और अमरता की इच्छा पैदा हो जाती है। जब वह अपने विवेक को महत्व देता है कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ; शरीर तो निरन्तर मृत्यु में रहता है और मैं स्वयं निरन्तर अमरता में रहता हूँ’ तब उसे अपनी स्वतः सिद्ध अमरता का अनुभव हो जाता है। अतः साधक को चाहिये कि वह जन्म मृत्यु, वृद्धावस्था आदि शरीर के विकारों को मुख्यता न देकर अपनी चिन्मय सत्ता (होने पन)- को ही मुख्यता दे। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

नान्यं गुणेभ्य: कर्तारं यदा दृष्टानुपश्यति । 

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मदूभावं सोऽधिगच्छति ॥१९॥ 

जब विवेकी (विचार-कुशल) मनुष्य तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और अपने को गुणों से पर अनुभव करता है, तब वह मेरे सत्स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। 

व्याख्या- 
सम्पूर्ण क्रियाओं के होने में गुण ही कारण हैं, अन्य कोई कारण नहीं है। विवेकशील साधक जिससे गुण प्रकाशित होते हैं, उस प्रकाशक में अपनी स्वाभाविक स्थिति का अनुभव करता है अर्थात अपने को गुणों (क्रियाओं और पदार्थों)- से असंग अनुभव करता है। गुणों से असंग अनुभव करने पर वह योगारूढ़ हो जाता है। योगारूढ़ होने से शान्ति की प्राप्ति होती है और उस शान्ति में न अटकने से ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सत्त्वातसंजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । 

प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१७॥ 
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: । 
जघन्यगुणवृत्तिस्थाअधो गच्छन्ति तामसा: ॥१८॥

सत्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं। तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं। 
 सत्वगुण में स्थित मनुष्य ऊध्र्वलोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।

 व्याख्या- ज्ञान (विवेक) सत्वगुण से प्रकट होता है और संग न करने पर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वज्ञान में परिणत हो जाता है। परन्तु रजोगुण-तमोगुण से होने वाले लोभ, प्रमाद, मोह, अज्ञान बढ़ते है। तो कोई नुकसान बाकी नहीं रहता, कोई दुःख बाकी नहीं रहता, कोई मूढ़योनि बाकी नहीं रहती, कोई नरक बाकी नहीं रहता। 

 सात्विक, राजस अथवा तामस मनुष्य की गति तो अन्तिम चिन्तन के अनुसार होगी, पर सुख-दुःख का भोग उनके कर्मों के अनुसार ही होगा। उदाहरणार्थ, किसी के कर्म तो अच्छे हैं, पर अन्तिम चिन्तन पशु का हो गया तो अन्तिम चिन्तन के अनुसार वह पशु बन जायगा, परन्तु उस पशुयोनि में भी उसे कर्मों के अनुसार बहुत सुख-आराम मिलेगा। इसी प्रकार किसी के कर्म तो बुरे हैं, पर अन्तिम चिन्तन के अनुसार वह मनुष्य बन गया तो उस मनुष्य योनि में भी उसे कर्मों के अनुसार दुःख, शोक, रोग आदि मिलेंगे। आधुनिक वेदान्त में आया है कि सत्वगुण से पुण्य तथा रजोगुण से पाप उत्पन्न होता है; किन्तु तमोगुण से आयु वृथा होती है- 
सात्विकैः पुण्यनिष्पत्तिः पापोत्पत्तिश्च राजसैः। 
तामसैर्नोभयं किन्तु वृथायुःक्षपणं भवेत्।। 
परन्तु यह बात गीता से विरुद्ध पड़ती है। भगवान यहाँ कहते हैं कि तमोगुण से मनुष्य को अधोगति की प्राप्ति होती है- ‘अधो गच्छन्ति तामसाः’। पहले भी भगवान ने कहा है- ‘तथा प्रजीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते’। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।१५।।
  कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्विकं निर्मलं फलम् । 

रजसस्तुफलं दु:खमज्ञानं तमस:फलम् ॥१६॥   

रजोगुण के बढ़नेपर मरने वाला प्राणी मनुष्ययोनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़योनियों में जन्म लेता है।

विवेकी पुरुषों ने शुभ कर्म का तो सात्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख कहा है और तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

  व्याख्या—

जिसने जीवनभर अच्छे कर्म किये हैं, जिसके अच्छे भाव रहे हैं, वह यदि अन्तकाल में रजोगुण के बढ़ने पर मर जाता है तो मनुष्ययोनि में जन्म लेने पर भी उसके आचरण, भाव अच्छे रहेंगे । इसी प्रकार अच्छे कर्म करनेवाला यदि अन्तकाल में तमोगुण के बढ़ने पर मर जाता है तो पशु, पक्षि आदि मूढ़योनि में जन्म लेने पर भी उसके आचरण, भाव अच्छे ही रहेंगे ।

रजोगुण में ‘राग’-अंश ही जन्म-मरण देनेवाला है, ‘क्रिया’- अंश नहीं । पदार्थ, क्रिया अथवा व्यक्ति, किसीमें भी राग हो जायगा तो वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेगा । मनुष्य स्वाभाविक कर्मसंगी है; क्योंकि नये कर्म करने का अधिकार मनुष्ययोनि में ही है । 


 वास्तव में कर्म सात्विक-राजस-तामस नहीं होते, प्रत्युत कर्ता ही सात्विक-राजस-तामस होता है। जैसा कर्ता होता है, उसके द्वारा वैसे ही कर्म होते हैं, जैसे कर्म होते हैं, वैसा ही भाव दृढ़ होता है। जैसा भाव होता है, उसके अनुसार ही अन्तकालीन चिन्तन होता है। अन्तकालीन चिन्तन के अनुसार ही गति होती है।
 
ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

  अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । 
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१३॥  
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । 
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४॥ 
 
हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह- ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं। 
जिस समय सत्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है तो वह उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है। 
 
व्याख्या- भगवान पूर्वोक्त तीन श्लोकों में क्रमशः सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की वृद्धि के लक्षणों का वर्णन करके साधक को सावधान करते हैं कि गुणों के साथ अपना सम्बन्ध मानने से ही गुणों में होने वाली वृत्तियाँ उसे अपने में प्रतीत होती हैं। वास्तव में साधक का इन वृत्तियों के साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। गुण तथा गुणों की वृत्तियाँ प्रकृति का कार्य होने से परिवर्तनशील हैं और स्वयं परमात्मा का अंश होने से अपरिवर्तनशील है। परिवर्तनशील के साथ अपरिवर्तनशील का सम्बन्ध कैसे हो सकता है?  
  
गुणों से उत्पन्न होने वाली वृत्तियाँ कर्मों की अपेक्षा कमजोर नहीं है। सात्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मों के समान ही श्रेष्ठ है। तात्पर्य यह हुआ कि शास्त्रविहित पुण्यकर्मों में भी भाव का ही महत्व है, पुण्यकर्म का नहीं पदार्थ, क्रिया, भाव और उद्देश्य-ये चारों उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।  यदि उत्तमवेत्ता (विवेकवान्) मनुष्य सत्वगुण को अपना मानते हुए उसमें रमण न करे और भगवान के सम्मुख रहे तो वह सत्वगुण से भी असंग (गुणातीत) हो कर भगवान के परमधाम को चला जायगा, अन्यथा सत्वगुण का सम्बन्ध रहने पर वह ब्रह्मलोक तक के ऊँचे लोकों तक ही जायगा।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।१२।।

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

व्याख्या—

जब रजोगुण बढ़ता है तब लोभ, प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं । अतः ऐसे समय साधक को यह विचार करना चाहिये कि जब अनन्त ब्रह्माण्डों में लेशमात्र भी कोई वस्तु अपनी नहीं है, सब वस्तुएँ मिलने-बिछुड़नेवाली हैं, फिर अपने लिये क्या करना चाहिये ? ऐसा विचार करके रजोगुणमयी वृत्तियों को मिटा दे, उनसे उदासीन हो जाय ।
रजोगुण असंगतक विरोधी है-‘रजो रागात्मकं विद्धि’ (गीत १४ । ७) । मनुष्य क्रिया और पदार्थसे असंग होनेपर ही योगारूढ़ होता है (गीता ६ । ४) । परन्तु क्रिया और पदार्थक संग करनेके कारण रजोगुण मनुष्यको योगारूढ़ नहीं होने देता ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.११)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।।

जब इस मनुष्यशरीर में सब द्वारों (इन्द्रियों और अन्तःकरण) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

व्याख्या—

‘प्रकाश’ और ‘ज्ञान’-दोनोंमें भेद है । ‘प्रकाश’ का अर्थ है-इन्द्रियों और अन्तःकरणमें जागृति अर्थात्‌ होनेवाला मनोराज्य तथा तमोगुणसे होनेवाले निद्रा, आलस्य और प्रमाद न होकर स्वच्छता होना । ‘ज्ञान’ का अर्थ है-विवेक अर्थात्‌ सत्‌-असत्‌, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका ज्ञान होना । प्रकाश और ज्ञान आनेपर साधक उनको अपना गुण मानकर अभिमान न करे, प्रत्युत उनको सत्त्वगुण का ही कार्य माने और विशेषरूप से भजन-ध्यान आदि में लग जाय । कारण कि ऐसे समय में किये गये साधन से अधिक लाभ हो सकता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।१०।।

हे भरतवंशोद्भव ! अर्जुन रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है ।

व्याख्या—

दो गुणों को दबाकर एक गुण बढ़ता है, बढ़ा हुआ गुण मनुष्यपर विजय करता है और विजय करके मनुष्य को बाँध देता है । जो गुण बढ़ता है, उसकी मुख्यता हो जाती है और दूसरे गुणों की गौणता हो जाती है । यह गुणों का स्वभाव है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।९।।

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में और रजोगुण कर्म में लगाकर मनुष्य पर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में भी लगाकर मनुष्य पर विजय करता है ।

व्याख्या—

सत्त्वगुण केवल सुख होनेपर विजय नहीं करता, प्रत्युत सुख का संग होने पर विजय करता है-‘सुखसङ्गेन बध्नाति’ (गीता १४ । ६) । इसी तरह रजोगूण भी कर्म का संग होने पर विजय करता है-‘तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्‌’ (गीता १४ । ७) । परन्तु तमोगुण स्वरूप से ही विजय करता है । इसलिये तमोगुणमें ‘संग’ शब्द नहीं आया है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०८)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।।८।।

हे भरतवंशी अर्जुन ! सम्पूर्ण देहधारियों को मोहित करनेवाले तमोगुण को तुम अज्ञान से उत्पन्न होनेवाला समझो । वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा देहधारियों को बाँधता है ।

व्याख्या—

सत्त्वगुण और रजोगुण तो संग (सुखासक्ति)--से बाँधते हैं, पर तमोगुण स्वरूप से ही बाँधने वाला है । ये तीनों गुण प्रकृति के कार्य हैं और जीव स्वयं प्रकृति और उसके कार्य गुणों से सर्वथा रहित है । परन्तु गुणों के साथ सम्बन्ध जोड़ने के कारण स्वयं गुणातीत होते हुए भी गुणों से बँध जाता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।।७।।

हे कुन्तीनन्दन ! तृष्णा और आसक्ति को पैदा करनेवाले रजोगुण को तुम रागस्वरूप समझो । वह कर्मों की आसक्ति से शरीरधारी को बाँधता है ।

व्याख्या—
रजोगुण रागस्वरूप है अर्थात्‌ किसी वस्तु, व्यक्ति आदि में प्रियता उत्पन्न होती है, वह प्रियता रजोगुण है । रजोगुण कर्मोंके संग (आसक्ति)-से मनुष्यको बाँधता है । अतः सात्त्विक कर्म भी संग होनेसे बाँधनेवाले हो जाते हैं । यदि संग न हो तो कर्म बन्धनकारक नहीं होते । इसलिये कर्मयोगसे मुक्ति हो जाती है; क्योंकि कर्मोंका और उनके फलोंका संग न होनेसे ही कर्मयोग होता है (गीता ६ । ४) ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।६।।

हे पापरहित अर्जुन ! उन गुणों में सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होने के कारण प्रकाशक और निर्विकार है । वह सुख और ज्ञान की आसक्ति से (देहीको) बाँधता है ।

व्याख्या—

गुणातीत होने के बहुत समीप होने के कारण सत्त्वगुण को अनामय (निर्विकार) कहा गया है । परन्तु सुख और ज्ञान के संग के कारण वह विकारी हो जाता है; क्योंकि संग रजोगुण का स्वरूप है । सुख और ज्ञान बाधक नहीं हैं, प्रत्युत उनका संग बाधक है । संग है-उनको अपना मान लेना । वास्तव में सत्त्वगुण अपना है ही नहीं, वह तो प्रकृति का है । अतः जब तक संग रहता है, तब तक मुक्ति नहीं होती; क्योंकि स्वरूप असंग है ।

सात्त्विक ज्ञान में तो ‘मैं ज्ञानी हूँ’-यह संग रहता है, पर तत्त्वज्ञान सर्वथा असंग है अर्थात्‌ तत्त्वज्ञान होनेपर ‘मैं ज्ञानी हूँ’- यह संग नहीं रहता । सात्त्विक ज्ञान में द्रष्टा रहता है और अपने में विशेषता का भान होता है, परन्तु तत्त्वज्ञान में कोई द्रष्टा नहीं रहता और अपने में कोई कमी भी नहीं रहती तथा (व्यक्तित्व न रहनेसे) विशेषता का भान भी नहीं होता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।५।।

हे महाबाहो ! प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देही को देह में बाँध देते हैं ।

व्याख्या—

प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण प्रकृति-विभाग में ही हैं । परन्तु प्रकृति के कार्य शरीर से अपना सम्बन्ध मान लेने के कारण ये गुण अविनाशी चेतन को नाशवान्‌, जड़ शरीर में बाँध देते हैं अर्थात्‌ ‘मैं शरीर हूँ, शरीर मेरा है’ ऐसा देहाभिमान उत्पन्न कर देते हैं । तात्पर्य यह कि सभी विकार प्रकृति के सम्बन्ध से उत्पन्न होते हैं । चिन्मय सत्तामात्र स्वरूप में कोई भी विकार नहीं है--‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदारण्यक० ४ । ३ । १५), ‘देहेऽस्मिन्पुरुषः परः’ (गीता १३ । २२) । विकारों के कारण ही जन्म-मरण होता है ।

वास्तवमें गुण जीव को नहीं बाँधते, प्रत्युत जीव ही उनका संग करके बँध जाता है । अगर गुण बाँधने वाले तो गुणों के रहते हुए कोई उनसे छूट सकता ही नहीं, गुणातीत (जीवनमुक्त) हो सकता ही नहीं !

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।४।।

हे कुन्तीनन्दन ! सम्पूर्ण योनियों में प्राणियों के जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीजस्थापन करने वाला पिता हूँ ।

व्याख्या—

चौरासी लाख योनियाँ, देवता, पितर, गन्धर्व, भूत-प्रेत, पिशाच, स्थावर-जंगम, जलचर-थलचर-नभचर, जरायुज-अण्डज-उद्भिज-स्वेदज आदि सम्पूर्ण योनियों के जितने भी मूर्त-अमूर्त, व्यक्त-अव्यक्त शरीर हैं, उन सबमें भगवान्‌ अपने चेतन-अंशरूप बीज को स्थापित करते हैं । इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक प्राणी में स्थित परमात्मा का अंश शरीरों की भिन्नता से ही भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है । वास्तव में सम्पूर्ण प्राणियों में एक ही परमात्मतत्त्व विद्यमान है (गीता १३ । २) ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।३।।

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्तिस्थान है और मैं उसमें जीवरूप गर्भ का स्थापन करता हूँ । उससे सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है ।

व्याख्या—

जीव जब तक मुक्त नहीं होता, तब तक प्रकृति के अंश कारणशरीर से उसका सम्बन्ध बना रहता है और वह महाप्रलय में कारणशरीर सहित ही प्रकृति में लीन होता है । जब उस जीवके कर्म परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब महासर्ग के आदि में भगवान्‌ उसका प्रकृति के साथ पुनः विशेष सम्बन्ध स्थापित कर देते हैं ।

ॐ तत्सत् !