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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः* पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।१४।।

प्राणियों के शरीर में रहनेवाला मैं प्राण-अपान से युक्त वैश्वानर (जठराग्नि) होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

व्याख्या—

पृथ्वी में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करना, चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण वनस्पतियों का पोषण करना, फिर उनको खानेवाले प्राणियों के भीतर जठराग्नि होकर खाये हुए अन्न को पचाना आदि सम्पूर्ण कार्य भगवान्‌ की ही शक्ति से होते हैं । परन्तु मनुष्य व्यर्थ में ही अभिमान कर लेता है; जैसे बैलगाड़ी के नीचे छाया में चलने वाला कुत्ता समझता है कि बैलगाड़ी मैं चलाता हूँ !

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* गीता में सब जगह प्राण और अपान—इन दोनों का ही वर्णन हुआ है ; जैसे—
(१).अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे | प्राणाऽपानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा: ||....(४.२९)
(२).प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यांतरचारिणौ ||...(५.२७)

ॐ तत्सत् !

Thursday, 11 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

  अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । 
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१३॥  
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । 
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४॥ 
 
हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह- ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं। 
जिस समय सत्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है तो वह उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है। 
 
व्याख्या- भगवान पूर्वोक्त तीन श्लोकों में क्रमशः सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की वृद्धि के लक्षणों का वर्णन करके साधक को सावधान करते हैं कि गुणों के साथ अपना सम्बन्ध मानने से ही गुणों में होने वाली वृत्तियाँ उसे अपने में प्रतीत होती हैं। वास्तव में साधक का इन वृत्तियों के साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। गुण तथा गुणों की वृत्तियाँ प्रकृति का कार्य होने से परिवर्तनशील हैं और स्वयं परमात्मा का अंश होने से अपरिवर्तनशील है। परिवर्तनशील के साथ अपरिवर्तनशील का सम्बन्ध कैसे हो सकता है?  
  
गुणों से उत्पन्न होने वाली वृत्तियाँ कर्मों की अपेक्षा कमजोर नहीं है। सात्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मों के समान ही श्रेष्ठ है। तात्पर्य यह हुआ कि शास्त्रविहित पुण्यकर्मों में भी भाव का ही महत्व है, पुण्यकर्म का नहीं पदार्थ, क्रिया, भाव और उद्देश्य-ये चारों उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।  यदि उत्तमवेत्ता (विवेकवान्) मनुष्य सत्वगुण को अपना मानते हुए उसमें रमण न करे और भगवान के सम्मुख रहे तो वह सत्वगुण से भी असंग (गुणातीत) हो कर भगवान के परमधाम को चला जायगा, अन्यथा सत्वगुण का सम्बन्ध रहने पर वह ब्रह्मलोक तक के ऊँचे लोकों तक ही जायगा।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।१८।।

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेप से कहा गया। मेरा भक्त इस को तत्त्व से जानकर मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—

समग्र परमात्माका ज्ञान वास्तवमें भक्तिसे ही हो सकता है । इसलिये साधकको भक्त होना चाहिये । क्षेत्रको तत्त्वसे जाननेपर क्षेत्रसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है । ज्ञान (साधन-समुदाय)-को तत्त्वसे जाननेपर देहाभिमान मिट जाता है । ज्ञेयको तत्त्वसे जाननेपर उसकी प्राप्ति हो जाती है ।

यहाँ आये ‘मद्भावायोपपद्यते’ पदको गीतामें कई प्रकारसे कहा गया है; जैसे-‘मद्भावमागताः’ (४ । १०), ‘मम साधर्म्यमागताः’ (१४ । २), ‘मद्भावं सो$धिगच्छति’ (१४ । १९) ‘मद्भाव’ का अर्थ है- मुझ परमात्माकी सत्ता । यह सिद्धान्त है कि सत्ता एक हीहोती है, दो नहीं । भगवान्‌ने ज्ञान और भक्ति-दोनोंमें ही अपने भावकी प्राप्ति बतायी है । ‘ज्ञान’ में इसका तात्पर्य है-ब्रह्मसे साधर्म्य होना अर्थात्‌ जैसे ब्रह्म सत्‌-चित्‌-आनन्दस्वरूप है, ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषका भी सत्‌-चित्‌-आनन्दरूप होना । ‘भक्ति’ में इसका तात्पर्य है-भक्तकी भगवान्‌के साथ आत्मीयता अर्थात्‌ अभिन्नता होना ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः।।१८।।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः।।१९।।

जो शत्रु और मित्र में तथा मान-अपमान में सम है और शीतउष्ण (अनुकूलताप्रतिकूलता) तथा सुखदुःख में सम है एवं आसक्ति से रहित है, और जो निन्दास्तुति को समान समझनेवाला, मननशील, जिसकिसी प्रकार से भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहने के स्थान तथा शरीर में ममताआसक्ति से रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

व्याख्या—

इन दो श्लोकों में भगवान्‌ ने वे ही स्थल दिये हैं, जहाँ समता में कठिनता आती है । यदि इनमें समता हो जाय तो अन्य जगह समता होने में कठिनता नहीं प्रतीत होगी । अपने पर कोई असर न पड़ना ही समता है ।

यद्यपि भक्त की दृष्टि में भगवान्‌ के सिवाय दूसरी सत्ता होती ही नहीं, तथापि दूसरे लोगों की दृष्टि में वह शत्रु और मित्र में समभाव वाला दीखता है । शत्रुता-मित्रता का ज्ञान होने पर भी वह सम रहता है ।

भक्त सब प्रकारकी अनुकूलता-प्रतिकूलता में सम रहता है । उसका न तो अनुकूलता में राग होता है, न प्रतिकूलता में द्वेष होता है ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।।१९।।

आपको मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त प्रभावशाली, अनन्त भुजाओंवाले, चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोंवाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुखों वाले और अपने तेज से संसार को संतप्त करते हुए देख रहा हूँ ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।१७।।

हे योगिन् ! हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आप को कैसे जानूँ और हे भगवन् ! किनकिन भावों में आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात् किनकिन भावों में मैं आपका चिन्तन करूँ?

व्याख्या—

अर्जुन ने यह प्रश्न सुगमतापूर्वक भगवत्प्राप्ति के उद्देश्य से किया है कि मैं आपके समग्ररूप को कैसे जानूँ ? किन रूपोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ ? इससे सिद्ध होता है कि विभूतियाँ गौण नहीं हैं, प्रत्युत भगवत्प्राप्ति का माध्यम होनेसे मुख्य हैं । विभूतिरूप से साक्षात्‌ भगवान्‌ ही हैं । जब तक मनुष्य भगवान्‌ को नहीं जानता, तब तक उसमें गौण अथवा मुख्यकी भावना रहती है । भगवान्‌ को जानने पर गौण अथवा मुख्यकी भावना नहीं रहती; क्योंकि भगवान्‌ के सिवाय और कुछ है ही नहीं, फिर उसमें क्या गौण और क्या मुख्य ? तात्पर्य है कि गौण अथवा मुख्य साधक की दृष्टि में है, सिद्ध की दृष्टि में नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥ १६॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥ १७॥
गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत्।
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥ १८॥

क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ । जाननेयोग्य पवित्र ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ । इस सम्पूर्ण जगत् का निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान,निधान (भण्डार) तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ ।

व्याख्या—

उपर्युक्त श्लोकोंको देखते हुए साधक यह बात दृढ़तासे स्वीकार कर ले कि कार्य-कारणरूपसे स्थूल-सूक्ष्मरूप जो कुछ देखने, सुनने, समझने और माननेमें आता है, वह सब केवल भगवान्‌ ही हैं ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)



परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:।
य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥ २०॥
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥ २१॥

परन्तु उस अव्यक्त (ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर)-से अन्य (विलक्षण) अनादि अत्यन्त श्रेष्ठ भावरूप जो अव्यक्त (ईश्वर) है, वह सम्पूर्ण प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
उसी को अव्यक्त और अक्षर—ऐसा कहा गया है तथा उसी को परम गति कहा गया है और जिस को प्राप्त होने पर जीव फिर लौटकर संसार में नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।

व्याख्या—
ब्रह्माजी के सूक्ष्मशरीर से भी श्रेष्ठ कारणशरीर (मूल प्रकृति) है और उससे भी श्रेष्ट परमात्मा हैं । परमात्मा के समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर उनसे श्रेष्ठ श्रेष्ट कोई हो ही कैसे सकता है (गीता ११ । ४३) । असंख्य ब्रह्मा जी उत्पन्न हो-होकर लीन हो गये, पर परमात्मा वैसे-के-वैसे ही हैं ।
वास्तवमें परमात्मतत्त्व वर्णनातीत है । अव्यक्त, अक्षर, परमगति आदि नाम उस तत्त्व का संकेतमात्र करते है; क्योंकि वह अव्यक्त-व्यक्त, अक्षर-क्षर, गति-स्थिति आदिसे रहित निरपेक्ष तत्त्व है । उसे प्राप्त होनेपर जीव लौटकर संसारमें नहीं आता । कारण कि जीव उस परमात्मतत्त्वका सनातन अंश होनेसे उससे अलग नहीं है । संसारमें तो वह भूलसे अपनेको स्थित मानता है । वास्तवमें शरीर ही संसारमें स्थित है, स्वयं नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ १६॥

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी—ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।

व्याख्या—

पूर्वश्लोकमें भगवान्‌ने विमुख हुए मनुष्योंकी बात कहकर अब भगवान्‌के सम्मूख हुए भक्तोंकी बात कहते हैं । ऐसे भक्त चार प्रकारके होते हैं-अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और प्रेमी । जबतक संसारका किंचित्‌ सम्बन्ध रहता है, तबतक अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु-ये तीन भेद रहते हैं । परन्तु संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर मनुष्य ज्ञानी अर्थात्‌ प्रेमी भक्त होता है ।

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु-तीनोंमें भगवान्‌की मुख्यता तथा सम्मुखता रहती है । अतः अर्थार्थी भगवान्‌से ही अपनी धन्स्की इच्छा पूरी करन चाहता है । आर्त भगवान्‌से ही अपना दुःख मिटाना चाहता है । जिज्ञासु भगवान्‌से ही अपनी जिज्ञासा शान्त करान चाहता है । जब भक्त एक भगवान्‌के सिवाय कुछ भी नहीं चाहता, तब वह ज्ञानी अर्थात्‍६ प्रेमी भक्त होता है ।

पूर्वपक्ष-ज्ञानीको प्रेमी भक्त कैसे मान लिय गया ? येदि उसे तत्त्वज्ञनी मान लें तो क्या आपत्ति है ?

उत्तरपक्ष-कुछ ऐसे कारण हैं, जिनसे ‘ज्ञानी’ को प्रेमी भक्त मानना ही अधिक उपयुक्त दीखता है; जैसे-

(१) भगवान्‌ने ‘चतुर्विधा भजन्ते माम्‌’ कहकर ‘ज्ञानी’ को चार प्रकारके भक्तोंके अन्तर्गत लिया है ।
(२) भगवान्‌ने अगले श्लोकमें ज्ञानीको अनन्य-भक्तिवाला कहा है-‘एकभक्तिर्विशिष्यते’ और अपनेको उसका अत्यन्त प्रिय बताय है-‘प्रियो हि ज्ञानिनो$त्यर्थम्‌’ ।
(३) भगवान्‌ने ‘वासुदेवः सर्वम्‌’ का अनुभव करनेवाले भक्तको ही वास्तविक ज्ञानी बताया है (७ । १९) ।

पूर्वपक्ष- परन्तु भगवान्‌ने ‘भक्त’ शब्द न देकर ‘ज्ञानी’ शब्द दिया ही क्यों ?

उत्तरपक्ष- कोई यह न समझ ले कि भक्तमें ज्ञानकी कमी या अभाव रहता है, इसलिये ‘ज्ञानी’ शब्द देकर भगवान्‌ने यह बताया है कि मेरे भक्तमें किसी प्रकारकी कोई कमी नहीं रहती । तत्त्वज्ञानीको तो ब्रह्मका ज्ञान होता है, पर भक्तको विज्ञानसहित ज्ञानका अर्थात्‌ समग्रका ज्ञान हो जाता है (गीता ७ । २९-३०) ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 2 April 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.१३)

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानस:।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥ १५॥

वशमें किये हुए मनवाला योगी मनको इस तरह से सदा (परमात्मामें) लगाता हुआ मुझ में सम्यक् स्थिति वाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 9 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥ १४॥

परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।

व्याख्या—

स्वरूपकी तरह परमात्मा भी किसीको कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं करते । मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है । कर्तापन, कर्म और कर्मफलके साथ संयोग जीवका काम है, परमात्माका नहीं । अतः इनका त्याग करनेका दायित्व भी जीवपर ही है । जीव ही अज्ञानवश प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़कर कर्मोंका कर्ता बनता है और कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 31 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१३)


त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रय:।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति स:॥ २०॥

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके (संसारके) आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

व्याख्या—

जिसके भीतर कर्तृत्वाभिमान और फलासक्ति है, वह कर्म न करने पर भी बँधा हुआ है । परन्तु जिसके भीतर कर्तृत्वाभिमान और फलासक्ति नहीं है, वह कर्म करते हुए भी मुक्त है ।
ॐ तत्सत् !

Tuesday, 27 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१३)

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय:॥ १८॥

उस (कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुष)-का इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें (किसी भी प्राणीके साथ) इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।

व्याख्या—

जैसे ‘करना’ प्रकृति के सम्बन्ध से है, ऐसे ‘न करना’ भी प्रकृति के सम्बन्ध से है । करना और न करना-दोनों सापेक्ष है, परन्तु तत्त्व निरपेक्ष है । इसलिये स्वयं (चिन्मय सत्तामात्र)- का न तो करनेके साथ सम्बन्ध है, न नहीं करनेके साथ सम्बन्ध है । करना, न करना तथा पदार्थ-ये सब उसी सत्तामात्रसे प्रकाशित होते हैं (गीता १३ । ३३) ।

कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें करनेका राग तथा पानेकी इच्छा सर्वथा नहीं रहती, इसलिये उसका न तो कुछ करनेसे मतलब रहता है, न कुछ नहीं करनेसे मतलब रहता है और न उसका किसी भी प्राणी-पदार्थसे कुछ पानेसे ही मतलब रहता है । तात्पर्य है कि उसका प्रकृति-विभागसे सर्वथा सम्बन्ध नहीं रहता ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 28 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.१३)

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ २०॥

यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और अनादि है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।

व्याख्या—

उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना-ये छः विकार शरीरमें ही होते हैं । शरीरीमें ये विकार कभी हुए ही नहीं, कभी होंगे नहीं, कभी हो सकते ही नहीं ।

शरीरी कभी उत्पन्न नहीं होता-‘न जायते’, ‘अजः’; उत्पन्न होकर विकारी सत्तावाला नहीं होता-‘अयं भूत्वा भविता वा न भूय:’; यह बदलता नहीं- ‘शाश्वतः’; यह बढ़ता नहीं-‘पुराणः’, यह क्षीण नहीं होता-‘नित्यः’; और यह मरता नहीं-‘न म्रियते’, न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ ।

मुख्य विकार दो ही हैं-उत्पन्न होना और नष्ट होना । अतः प्रस्तुत श्लोकमें इस दोनों विकारोंका दो-दो बार निषेध किया गया है; जैसे-‘न जायते म्रियते’ और ‘अजः’, ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 15 October 2016

गीता प्रबोधनी- पहला अध्याय (पोस्ट.१३)


उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ ४४॥
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता:॥ ४५॥
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय:।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥ ४६॥

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:॥ ४७॥

हे जनार्दन ! जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरकों में वास होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं। यह बड़े आश्चर्य और खेदकी बात है कि हमलोग बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय कर बैठे हैं, जो कि राज्य और सुखके लोभसे अपने स्वजनोंको मारनेके लिये तैयार हो गये हैं। अगर ये हाथोंमें शस्त्र-अस्त्र लिये हुए धृतराष्ट्र के पक्षपाती लोग युद्धभूमि में सामना न करनेवाले तथा शस्त्ररहित मुझे मार भी दें तो वह मेरे लिये बड़ा ही हितकारक होगा।

संजय बोले—

ऐसा कहकर शोकाकुल मनवाले अर्जुन बाणसहित धनुष का त्याग करके युद्धभूमि में रथ के मध्यभाग में बैठ गये।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम
प्रथमोऽध्याय:॥ १॥