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Monday, 16 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२८)

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:॥ ४२॥
एवं बुद्धे: परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥ ४३॥

इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है और जो बुद्धिसे भी पर है,
वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर (काम)-को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।

व्याख्या—

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहम्‌-ये आठ प्रकारके भेदोंवाली अपरा प्रकृति है (गीता ७ । ४) । बुद्धिसे भी पर जो अहम्‌ है, उस अहम्‌के जड़-अंशमें ‘काम’ रहता है । तात्पर्य है कि कामरूप विकार अपरा प्रकृति (जड़)-में रहता है, परा प्रकृति (चेतन)-में नहीं । परन्तु अहम्‌के साथ तादात्म्य करनेके कारण उस कामरूप विकारको चेतन (जीवात्मा) अपनेमें मान लेता है । जबतक अहम्‌रूप जड़-चेतनका तादात्म्य रहता है, तबतक जड़ और चेतनके विभागका ज्ञान नहीं होता । जबतक तादात्म्य है, तभीतक ‘काम’ है । तादात्म्य टूटनेपर उस कामका स्थान ‘प्रेम’ ले लेता है । काममें संसारकी ओर आकर्षण होता है और प्रेममें भगवान्‌की ओर ।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम
तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२७)

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥ ४०॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥ ४१॥

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामना के वास-स्थान कहे गये हैं। यह कामना इन (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि)-के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्य को मोहित करती है।

इसलिये हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! तू सबसे पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।

व्याख्या—

काम पाँच स्थानों में दीखता है-

(१) विषयों में (गीता ३ । ३४),
(२) इन्द्रियों में,
(३) मन में,
(४) बुद्धि में और
(५) अहम्‌ (जड़-चेतनके तादात्म्य)-में (गीता २ । ५९) ।

इन पाँच स्थानों में दीखने के कारण ये पाँचों काम के वासस्थान कहे गये हैं । मूल में काम ‘अहम्‌’ में ही रहता है (गीता ३ । ४२-४३) ।

संसार की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है-यह ज्ञान है । सब कुछ भगवान्‌ ही हैं-यह विज्ञान है । काम साधकको न तो ‘ज्ञान’ प्राप्त करने देता है, न ‘विज्ञान’ ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 13 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२६)


धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥ ३८॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥ ३९॥

जैसे धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जैसे जेर से गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामना के द्वारा यह (ज्ञान अर्थात् विवेक) ढका हुआ है।
हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्नि के समान कभी तृप्त न होने वाले और विवेकियों के कामनारूप नित्य वैरी के द्वारा मनुष्यका विवेक ढका हुआ है।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 12 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२५)

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:॥ ३६॥

श्रीभगवानुवाच

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥ ३७॥

अर्जुन बोले—

हे वार्ष्णेय ! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुए की तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है?

श्रीभगवान् बोले—

रजोगुणसे उत्पन्न यह काम अर्थात् कामना (ही पापका कारण है)। यह काम ही क्रोध (-में परिणत होता) है। यह बहुत खाने-वाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

व्याख्या—

जैसा मैं चाहूँ, वैसा हो जाय-यह ‘काम’ अर्थात्‌ कामना है । किसी भी क्रिया, वस्तु और व्यक्तिका अच्छा लगना अथवा उससे कुछ भी सुख चाहना ‘काम’ है । इस कामरूप एक दोषमें अनन्त पाप भरे हुए हैं । अतः जबतक मनुष्यके भीतर काम है, तबतक वह सर्वथा निर्दोष, निष्पाप नहीं हो सकता । कामनाके सिवाय पापोंका अन्य कोई कारण नहीं है । तात्पर्य है कि मनुष्यसे न तो ईश्वर पाप कराता है, न भाग्य पाप कराता है, न समय पाप कराता है, न परिस्थिति पाप कराती है, न कलियुग पाप कराता है, प्रत्युत मनुष्य स्वयं ही कामनाके वशीभूत होकर पाप करता है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 11 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२४)


श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:॥ ३५॥

अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

व्याख्या—

वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार निष्कामभावसे अपने-अपने कर्तव्यका पालन करना मनुष्यका ‘स्वधर्म’ है और जो उसके लिये निषिद्ध है, वह ‘परधर्म’ है । जिनमें दूसरेके अहितका भाव होता है, वे चोरी, हिंसा आदि किसीके भी स्वधर्म नहीं हैं, प्रत्युत कुधर्म अथवा अधर्म हैं ।
प्रत्येक धर्ममें कुधर्म, अधर्म और परधर्म-ये तीनों रहते हैं; जैसे- दूसरेके अनिष्टका भाव, कूटनीति आदि ‘धर्ममें कुधर्म’ है । यज्ञमें पशुबलि देना आदि ‘धर्ममें अधर्म’ है । जो अपनेलिये निषिद्ध है, ऐसा दूसरे वर्ण, आश्रम आदिका ‘धर्ममें परधर्म’ है । कुधर्म, अधर्म और परधर्मसे कल्याण नहीं होता । कल्याण उस धर्मसे होता है, जिसमें अपने स्वार्थ तथा अभिमानका त्याग और दूसरेका वर्तमानमें और भविष्यमें हित होता हो ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२३)


इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४॥

इन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें) विघ्न डालनेवाले शत्रु हैं।

व्याख्या—

भूलसे अपने सुख-दःखका कारण दूसरेको माननेसे ही राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं । यदि अन्तःकरणमें राग-द्वेष उत्पन्न हो जाँय तो उनके वशीभूत होकर कोई क्रिया नहीं करनी चाहिये; क्योंकि क्रिया करनेसे राग-द्वेष दृढ़ हो जाते हैं ।
साधक राग-द्वेषके वशीभूत भी न हो और उनको अपनेमें भी न माने । राग-द्वेष आगन्तुक दोष हैं । हमें इनके आने-जानेका ज्ञान होता है; अतः हम इनसे अलग हैं ।
ॐ तत्सत् !

Tuesday, 10 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२२)

सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति॥ ३३॥

सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। (फिर इसमें किसीका) हठ क्या करेगा?

व्याख्या—

चेतन-तत्त्व सम रहता है और प्रकृति विषम रहती है । इसलिये तत्त्वज्ञ महापुरुषोंके स्वरूपमें कोई भिन्नता नहीं होती, पर उनकी प्रकृति (स्वभाव)-में भिन्नता होती है । उनका स्वभाव राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण महान्‌ शुद्ध होता है । स्वभाव शुद्ध होनेपर भी तत्त्वज्ञ महापुरुषोंके स्वभावमें (जिस साधन-मार्गसे सिद्धि प्राप्त की है, उस मार्गके सूक्ष्म संस्कार रहनेके कारण) भिन्नता रहती है और उस स्वभावके अनुसार ही उनके द्वारा भिन्न-भिन्न व्यवहार होता है ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 8 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२१)


मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥ ३०॥
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा:।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:॥ ३१॥
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतस:॥ ३२॥

तू विवेकवती बुद्धि के द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मों को मेरे अर्पण करके कामनारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्म को कर ।
जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं ।
परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो अर्थात् उनका पतन ही होता है ।

व्याख्या—

यदि साधक भगवन्निष्ट है तो उसे सम्पूर्ण कर्म भगवान्‌ के अर्पित करने चाहिये । अर्पण करने का तात्पर्य है-अपने लिये कोई कर्म न करके केवल भगवान्‌ की प्रसन्नता के लिये ही सब कर्म करना ।
भगवान्‌ का मत है-मिलने तथा बिछुड़नेवाली कोई भी वस्तु (पदार्थ और क्रिया) अपनी तथा अपने लिये नहीं है । भगवान्‌ का मत ही वास्तविक सिद्धान्त है, जिसका अनुसरण करके मात्र मनुष्य मुक्त हो सकते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 7 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२०)



प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥ २९॥

प्रकृतिजन्य गुणों से अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१९)


तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो:।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ २८॥

परन्तु हे महाबाहो ! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।

व्याख्या—

यह सिद्धान्त है कि संसार (पदार्थ और क्रिया)- से अलग होनेपर ही संसारक ज्ञान होता है और परमात्मासे एक होने पर ही परमात्माका ज्ञान होता है । कारण यह है कि वास्तवमें हम संसारसे अलग और परमात्मासे एक हैं । तत्त्वज्ञ महापुरुष गुण-विभाग (पदार्थ) और कर्म-विभाग (क्रिया)- से सर्वथा अलग होनेपर यह जान लेता है कि संपूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं । स्वरूपमें कभी कोई क्रिया नहीं होती ।
ॐ तत्सत् !

Tuesday, 3 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१८)

प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ २७॥

सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्त:करणवाला अज्ञानी मनुष्य मैं कर्ता हूँ—ऐसा मान लेता है।

व्याख्या—

जड़-विभाग अलग है और चेतन-विभाग अलग है । क्रियामात्र जड़ प्रकृतिमें ही होती है । चेतनमें कभी कोई क्रिया होती ही नहीं-‘शरीरस्थो$पि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३ । ३१) । क्रियाका आरम्भ और समाप्ति तथा पदार्थका आदि और अन्त होता है; परन्तु चेतनका न आरम्भ तथा समाप्ति होती है, न आदि तथा अन्त होता है ।

भगवान्‌ने गीतामें कर्मोंके होनेमें पाँच कारण बताये हैं-

(१) प्रकृति-‘प्रकृतेः क्रियमाणानि०’ (३ । २७), ‘प्रकृत्यैव च कर्माणि०’ (१३ । २९) ।
(२) गुण-‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (३ । २८), ‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं० (१४ । १९) ।
(३) इन्द्रियाँ-‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते’ (५ । ९) ।
(४) स्वभाव-(क्रियाका वेग)-‘स्वभावस्तु प्रवर्तते’ (५ । १४),‘प्रकृति यान्ति भूतानि०’ (३ । ३३) ।
(५) पाँच हेतु-‘अधिष्ठानं तथा कर्ता०’ (१८ । १४) ।

उपर्युक्त पाँचों का मूल कारण एक ‘अपरा प्रकृति’ (जड़-विभाग) ही है । आज तक अनेक योनियों में जीव ने जो भी कर्म किये हैं, उनमें से कोई भी कर्म तथा कोई भी शरीर स्वरूपतक नहीं पहुंचा । सूर्य तक अंधकार कैसे पहुँच सकता है ? कारण कि कर्म और शरीरादि पदार्थों का विभाग ही अलग है और स्वरूप का विभाग ही अलग है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१७)


सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥ २५॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्॥ २६॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित तत्त्वज्ञ महापुरुष भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।

व्याख्या—

यद्यपि ज्ञानी महापुरुषके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता-‘तस्य कार्य न विद्यते’ (गीता ३ । १७), तथापि भगवान्‌ उसे आज्ञा देते हैं कि वह लोकसंग्रहके लिये स्वयं भी सावधानी पूर्वक कर्तव्य-कर्म करे और कर्मोंमें आसक्त दूसरे मनुष्योंसे भी वैसे ही कर्तव्य-कर्म करवाये ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 30 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१६)

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ २२॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित:।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:॥ २३॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा:॥ २४॥

हे पार्थ! मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्तव्यकर्ममें ही लगा रहता हूँ।
क्योंकि हे पार्थ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरता को करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।

व्याख्या—

भगवान्‌ भी अवतारकाल में सदा कर्तव्य-कर्ममें लगे रहते हैं, इसलिये जो साधक फलेच्छा व आसक्ति-रहित होकर सदा कर्तव्य-कर्म में लगा रहता है, वह सुगमतापूर्वक भगवान को प्राप्त हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१५)

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २१॥

श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

व्याख्या—

समाजमें जिस मनुष्यको लोग श्रेष्ट मानते हैं, उसपर विशेष जिम्मेदारी रहती है कि वह ऐसा कोई आचरण न करे तथा ऐसी कोई बात न कहे, जो लोक-मर्यादा तथा शास्त्र-मर्यादाके विरुद्ध हो ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१४)

तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष:॥ १९॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमहर्सि॥ २०॥

इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्ति-रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।
राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्म (कर्म-योग)-के द्वारा ही परम-सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिये लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू (निष्काम-भावसे) कर्म करने के ही योग्य है अर्थात् अवश्य करना चाहिये ।

व्याख्या—

मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता, प्रत्युत आसक्तिसे बँधता है । आसक्ति ही मनुष्यका पतन करती है, कर्म नहीं । आसक्ति रहित होकर दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त होकर परमात्त्व-तत्त्वको प्राप्त हो जाता है । कर्ममें परिश्रम और कर्म-योगमें विश्राम है । शरीरकी आवश्यकता परिश्रममें है, विश्राममें नहीं । कर्मयोगमें शरीरसे होनेवाला परिश्रम (कर्म) दूसरोंकी सेवाके लिये और विश्राम (योग) अपने लिये है ।

जनकादि राजाओंने भी कर्मयोगके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त की थी । इससे सिद्ध होता है कि कर्मयोग मुक्तिका स्वतन्त्र साधन है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 27 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१३)

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय:॥ १८॥

उस (कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुष)-का इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें (किसी भी प्राणीके साथ) इसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।

व्याख्या—

जैसे ‘करना’ प्रकृति के सम्बन्ध से है, ऐसे ‘न करना’ भी प्रकृति के सम्बन्ध से है । करना और न करना-दोनों सापेक्ष है, परन्तु तत्त्व निरपेक्ष है । इसलिये स्वयं (चिन्मय सत्तामात्र)- का न तो करनेके साथ सम्बन्ध है, न नहीं करनेके साथ सम्बन्ध है । करना, न करना तथा पदार्थ-ये सब उसी सत्तामात्रसे प्रकाशित होते हैं (गीता १३ । ३३) ।

कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें करनेका राग तथा पानेकी इच्छा सर्वथा नहीं रहती, इसलिये उसका न तो कुछ करनेसे मतलब रहता है, न कुछ नहीं करनेसे मतलब रहता है और न उसका किसी भी प्राणी-पदार्थसे कुछ पानेसे ही मतलब रहता है । तात्पर्य है कि उसका प्रकृति-विभागसे सर्वथा सम्बन्ध नहीं रहता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१२)

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ १७॥
परन्तु जो मनुष्य अपने-आप में ही रमण करनेवाला और अपने-आप में ही तृप्त तथा अपने-आप में ही सन्तुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।
व्याख्या—
जबतक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति नहीं हो जाती, तभी तक मनुष्यपर कर्तव्य-पालनकी जिम्मेदारी रहती है । परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर महापुरुष के लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता । उसके संसारमें रहनेमात्रसे संसारका हित होता है ।
ॐ तत्सत् !

Friday, 23 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.११)

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य:।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥ १६॥

हे पार्थ ! जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार (परम्परासे) प्रचलित सृष्टि-चक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है।

व्याख्या—

जो मनुष्य लोक-मर्यादा तथा शास्त्र-मर्यादाके अनुसार अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसे संसारमें जीनेका अधिकार नहीं है । कारण कि मनुष्योंके द्वारा अपने कर्तव्य्का पालन न करनेसे संसार मात्रको हानि पहूँचती है । वर्तमानमें जो अन्न, जल, वायु आदि प्रदूषित हो रहे हैं, अकाल, अनावृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाएँ आ रही हैं, उसमें मनुष्य का कर्तव्य-च्युत होना ही प्रधान कारण है ।
अपने लिये कर्म करना अनधिकृत चेष्टा है । कारण कि जो कुछ मिला है, वह सब संसार की सामग्री है । शरीरादि सब पदार्थ संसारके ही हैं, अपने नहीं । अतः हम पर संसार का ऋण है; जिसे उतारने के लिये हमें सब कर्म संसार के हित के लिये ही करने हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१०)

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव:।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव:॥ १४॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ १५॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्नकी उत्पत्ति वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे सम्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षर ब्रह्मसे प्रकट हुआ जान । इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म)-में नित्य स्थित है।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.०९)

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥ १३॥

यज्ञशेष (योग)- का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं । परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पाप का ही भक्षण करते हैं ।

व्याख्या—

सम्पूर्ण पापोंका कारण है-कामना । अतः कामनापूर्वक अपने लिये कोई भी कर्म करना पाप (बन्धन) है और निष्कामभावसे दूसरोंके लिये कर्म करना पुण्य है । पापका फल दुःख और पुण्यका फल सुख है । इसलिये स्वार्थभावसे अपने लिये कर्म करनेवाले दुःख पाते हैं और निःस्वार्थभावसे दूसरोंके लिये कर्म करनेवाले सुख पाते हैं ।

ॐ तत्सत् !