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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

  सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । '
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५॥ 

मैं ही सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ तथा मुझ से ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषों का नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। वेदों के तत्त्व का निर्णय करने वाला और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ। 

व्याख्या-
पिछले तीन श्लोकों में भगवान ने प्रभाव और क्रियारूप से अपनी विभूतियों का वर्णन किया, अब प्रस्तुत श्लोक में स्वयं अपना वर्णन करते हैं। तात्पर्य है कि इस श्लोक में स्वयं भगवान का वर्णन है, आदित्यगत, चन्द्रगत, अग्निगत अथवा वैश्वानरगत भगवान का वर्णन नहीं। मूल में एक ही तत्त्व है, केवल वर्णन में भिन्नता है। 
पहले ‘ममैवांशो जीवलोके’पदों से यह सिद्ध हुआ कि भगवान अपने हैं और यहाँ ‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः’ पदों से यह सिद्ध होता है कि भगवान अपने में हैं। भगवान को अपना स्वीकार करने से उनमें स्वाभाविक प्रेम होगा और अपने में स्वीकार करने से उन्हें पाने के लये दूसरी जगह जाने की जरूरत नहीं रहेगी। सबके हृदय में रहने के कारण भगवान प्राणिमात्र को नित्यप्राप्त हैं; अतः किसी भी साधक को भगवान की प्राप्ति से निराश नहीं होना चाहिये। 
भगवान कहते हैं कि वेद अनेक है, पर उन सब में जानने योग्य एक मैं ही हूँ और उन सबको जानने वाला भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ- ‘वासुदेवः सर्वम्।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । 

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥१९॥ 
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरूच्यते । 
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरूच्यते ॥२०॥ 

प्रकृति और पुरुष-दोनों को ही तुम अनादि समझो और विकारों को तथा गुणों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न समझो। कार्य और करण के द्वारा होने वाली क्रियाओं को उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और सुख-दुःख के भोक्तापन में पुरुष हेतु कहा जाता है। 

व्याख्या- भगवान क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभाग का ही प्रकृति और पुरुष के नाम से पुनः वर्णन करते हैं। शरीर तथा संसार प्रकृति-विभाग में और आत्मा और परमात्मा पुरुष-विभाग में हैं। जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं, ऐसे ही इनके भेद का ज्ञान अर्थात विवेक भी अनादि है। अतः विवेक-दृष्टि से देखें तो ये दोनों विभाग एक-दूसरे से बिलकुल असम्बद्ध हैं। 
विकृतिमात्र जड़ में ही होती है, चेतन में नहीं। अतः वास्तव में सुखी-दुःखी होना चेतन का धर्म नहीं है, प्रत्युत जड़ के संग से अपने को सुखी-दुःखी मानना चेतन का स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखी-दुःखी नहीं होता, प्रत्युत (सुखाकार-दुःखाकार वृत्ति से मिल कर) अपने को सुखी-दुःखी मान लेता है। चेतन में एक-दूसरे से विरुद्ध सुख-दुःख रूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं? दो भाव परिवर्तनशील प्रकृति में हो हो सकते हैं। जो अपरिवर्तनशील है, उसके दो भाव अथवा रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण विकार परिवर्तनशील में ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं जों-का-त्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृति के संग से उन विकारों को अपने में आरोपित करता रहता है। 
भगवान शक्तिमान हैं और प्रकृति उनकी शक्ति है। ज्ञान की दृष्टि से शक्ति और शक्तिमान-दोनों अलग-अलग हैं; क्योंकि शक्ति में तो परिवर्तन (घटना-बढ़ना) होता है, पर शक्तिमान ज्यों-का-त्यों रहता है। परन्तु भक्ति की दृष्टि से देखें तो शक्ति और शक्तिमान दोनों अभिन्न हैं; क्योंकि शक्ति को शक्तिमान से अलग नहीं कर सकते अर्थात शक्तिमान के बिना शक्ति की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ज्ञान और भक्ति-दोनों की बात रखने के लिये ही भगवान ने प्रकृति को न अनन्त कहा है, न सान्त, प्रत्युत ‘अनादि’ कहा है। कारण कि यदि प्रकृति को अनन्त (नित्य) कहें तो ज्ञान का खण्डन हो जायगा; क्योंकि ज्ञान की दृष्टि से प्रकृति की सत्ता ही नहीं है- ‘नासतो विद्यते भावः’[1]। यदि प्रकृति को सान्त (अनित्य) कहें तो भक्ति का खण्डन हो जायगा; क्योंकि भक्ति की दृष्टि से प्रकृति भगवान की शक्ति होने से भगवान से अभिन्न है- ‘सदसच्चाहम्’[2]। 
वास्तव में परमात्मा का स्वरूप ‘समग्र’ है। परमात्मा में कोई शक्ति न हो-ऐसा सम्भव ही नहीं है। यदि परमात्मा को सर्वथा शक्तिरहित मानें तो परमात्मा एकदेशीय (सीमित) ही सिद्ध होंगे। उनमें शक्ति का परिवर्तन अथवा अदर्शन तो हो सकता है, पर शक्ति का अभाव नहीं हो सकता। शक्ति कारण रूप से उन में रहती ही है, अन्यथा परमात्मा के सिवाय शक्ति (प्रकृति)-के रहने का स्थान कहाँ होगा? इसलिये यहाँ प्रकृति और पुरुष-दोनों को अनादि कहा गया है। 

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


  ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । 

श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया: ॥२०॥  

परन्तु जो मुझमें श्रद्धा रखने वाले और मेरे परायण हुए भक्त इस धर्ममय अमृत का जैसा कहा है, वैसा ही भलीभाँति सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।  

व्याख्या- भगवान ने सिद्ध भक्तों के उनतालीस लक्षणों के पाँ प्रकरण कहे हैं- तेरहवें चौदहवें श्लोकों का पहला प्रकरण, पन्द्रहवें श्लोक का दूसरा प्रकरण, सोलहवें श्लोक का तीसरा प्रकरण, सत्रहवें श्लोक का चौथा प्रकरण और अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकों का पाँचवाँ प्रकरण। प्रत्येक प्रकरण के लक्षण धम्र्यामृत हैं। साधक भक्त जिस प्रकरण के लक्षणों को आदर्श मानकर साधन करता है, उसके लिये वही धम्र्यामृत है। ऐसे साधक भक्त भगवान को अत्यन्त प्रिय होते हैं।  
श्रद्धा साधक में होती है-‘श्रद्दधानाः’। सिद्ध में श्रद्धा नहीं होती, प्रत्युत अनुभव होता है; क्योंकि उसके अनुभव में एक परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं, सब कुछ परमात्मा ही हैं, फिर वह श्रद्धा क्या करे? साधक की दृष्टि में दूसरी सत्ता रहती है, इसलिये वह श्रद्धापूर्वक उपासना करता है। दूसरी सत्ता की मान्यता रहते हुए भी साधक भगवान के परायण रहता है और भगवान के सिवाय दूसरा कोई उसका प्रेमास्पद नहीं होता, इसलिये वह भगवान को अत्यन्त प्रिय होता है। 

ऊँ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां 
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः।।१२।।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।।१८।।

श्री भगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।।१९।।

हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनतेसुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।

श्रीभगवान् बोले –

हाँ, ठीक है। मैं अपनी दिव्य विभूतियों को तेरे लिये प्रधानता से (संक्षेपसे) कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ ! मेरी विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है।

व्याख्या—

जैसे भूखे को अन्न और प्यासे को जल प्रिय लगता है, ऐसे ही भक्त अर्जुन को भगवान्‌ के वचन बहुत प्रिय और विलक्षण लग रहे हैं । वे ज्यों-ज्यों भगवान्‌ के वचन सुनते हैं, त्यों-ही-त्यों उनका भगवान्‌ के प्रति विशेष भाव प्रकट होता जात है । कानों के द्वारा उन अमृतमय वचनों को सुनते हुए न तो उन वचनों का अन्त आता है और न उनको सुनते हुए तृप्ति ही होती है !

भगवान्‌ अनन्त हैं; अतः उनकी विभूतियाँ भी अनन्त हैं । इस कारण भगवान्‌ की सम्पूर्ण विभूतियों को न तो कोई कह सकता है और न सुन ही सकता है । अगर कोई कह-सुन ले तो फिर वे अनन्त कैसे रहेंगी ? इसलिये भगवान्‌ यहाँ और अध्याय के अन्त में भी कहते हैं कि मैं अपनी विभूतियों को संक्षेपसे कहूँगा; क्योंकि मेरी विभूतियों का अन्त नहीं है (गीता १०।४०) ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ १९॥

हे अर्जुन! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, मैं ही जलको ग्रहण करता हूँ और (फिर उस जलको मैं ही) वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

व्याख्या—
जो देखने, सुनने, पढ़ने तथा कल्पना करनेमें आता है और जिन शरीर-इन्द्रियाँ-म्न-बुद्धि-अहम्‌के द्वारा देखा, सुना, पढ़ा, सोचा जाता है, वह सब-का-सब असत्‌ (अपरा प्रकृति) है । परन्तु जो देखता, सुनता, पढ़ता, सोचता, जानता, मानता है, वह सत्‌ (परा प्रकृति) है । भगवान्‌ कहते हैं कि सत्‌ भी मैं हूँ और असत्‌ भी मैं हूँ ।
जैसे अन्नकूटके प्रसादमें रसगुल्ले, गुलाबजामुन आदि भी होते हैं और मेथी, करेले आदि का साग भी होता है अर्थात्‌ मीठा भी भगवान्‌का प्रसाद होता है और क्ड़वा भी । ऐसे ही अमृत भी भगवान्‌ हैं और मृत्यु भी । सूर्यरूपसे जलको ग्रहण करना और फित उसे बरसा देना-ये दोनों विपरीत कार्य (ग्रहण और त्याग) भी भगवान्‌ ही करते हैं ।
‘सद्सच्चाहम्‌’ (सत्‌ और असत्‌ भी मैं ही हूँ)- इसमें विवेक नहीं है, प्रत्युत विश्वास है । विश्वास विवेकसे भी तेज होता है कारण कि विवेक वहीं काम करता है, जहाँ सत्‌ और असत्‌- दोनों का विचार होता है । जब असत्‌ है ही नहीं तो फिर विवेक क्या करे ? विवेकमें तो सत्‌-असत्‌ विभाग है, पर विश्वासमें विभाग है ही नहीं । विश्वासमें केवल सत्‌-ही-सत्‌ अर्थात्‌ भगवान्‌-ही-भगवान्‌ हैं ।
ज्ञानमार्गमें सत्‌-असत्‌का विवेक मुख्य होनेसे इसमें ‘द्वैत’ है, पर भक्तिमार्गमें एक भगवान्‌का ही विश्वास मुख्य होनेसे इसमें ‘अद्वैत’ है । तात्पर्य है कि दो सत्ता न होनेसे वास्तविक अद्वैत भक्तिमें ही है ।
ज्ञानमार्गमें साधक असत्‌का निषेध करता है । निषेध करनेसे असत्‌की सत्ताका भाव बहुत समयतक बना रहता है । साधक असत्‌के निषेधपर जोर लगाता है, उतना ही असत्‌की सत्ताका भाव दृढ़ होता है । अतः असत्‌का निषेध करना उतना बढ़िया नहीं है, जितना उसकी उपेक्षा करना बढ़िया है । उपेक्षा करने की अपेक्षा भी ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’- यह भाव और भी बढ़िया है । अतः भक्त न असत्‌ को हटाता है, न असत्‌ की उपेक्षा करता है, प्रत्युत सत्‌-असत्‌ सब में भगवान्‌ को ही देखता है ।
अपने सहित इस संसार में जो कुछ दीखता है, वह भगवान्‍ का स्वरूप है और इसमें जो क्रिया दीख रही है, वह भगवान्‌की लीला है । भगवान्‌ और उनकी लीलाके सिवाय कुछ नहीं है । कोई जन्म गया, कोई मर गया, किसीका विवाह हो गया, किस्की सन्तान हो गयी, कोई बीमार हो गया, कोई नीरोग हो गया, किसीका आदर हो गया, किसीका निरादर हो गया, किसीको नफा हो गया, किसीको घाटा लग गया, कोई धनवान्‌ हो गया, कोई निर्धन हो गया- यह सब-का-सब भगवान्‌की लीला है । सर्ग-प्रलय भी उनकी लीला है और महा सर्ग-महाप्रलय भी उनकी लीला है । वे कभी सत्ययुगकी लीला करते हैं, कभी त्रेतायुगकी लीला करते हैं, कभी द्वापरयुगकी लीला करते हैं और कभी कलियुगकी लीला करते हैं । इस प्रकार भगवान्‌ और उनकी लीलाको देख-देखकर साधकको आनन्दित रहना चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

पुरुष: स पर: पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥ २२॥

हे पृथानन्दन अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है ।

व्याख्या—
ज्ञानमार्ग में तो ज्ञानी पुरुष संसार से छूट जाता है, मुक्त हो जाता है और अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है । परन्तु भक्तिमार्ग में संसार से मुक्त होने के साथ-साथ भक्त को भगवान्‌ की तथा उनके प्रेम की भी प्राप्ति हो जाती है । अतः कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो साधन हैं और भक्तियोग साध्य है ।

 ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय:॥ १७॥

उन चार भक्तोंमें मुझमें निरन्तर लगा हुआ अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानी भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

व्याख्या—

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु सर्वथा भगवान्‌के सम्मुख नहीं होते; परन्तु प्रेमी भक्त (निष्काम होनेसे) सर्वथा भगवान्‍ के सम्मुख होता है । इसलिये भक्त और भगवान्‌-दोनोंमें परस्पर प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी लीला चलती रहती है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 5 April 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.१४)


नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत:।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ १६॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा॥ १७॥

हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवाले का तथा न अधिक सोनेवाले का और न बिलकुल न सोनेवाले का ही सिद्ध होता है।
दु:खोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 9 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)


नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु:।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:॥ १५॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन:।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥ १६॥

सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पाप-कर्म को और न शुभ-कर्म को ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।
परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञानके द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है,उनका वह ज्ञान सूर्य की तरह परमतत्त्व परमात्मा को प्रकाशित कर देता है।

व्याख्या—

सर्वव्यापी चेतन-तत्त्व किसी के भी पाप-कर्म अथवा पुण्य-कर्म का कर्ता और भोक्ता नहीं बनता, प्रत्युत अज्ञानवश जीव ही कर्ता-भोक्ता बन जाता है ।

ज्ञानका कभी अभाव नहीं होता । अतः ‘अज्ञान’ शब्द ज्ञानके अभावका वाचक नहीं है, प्रत्युत अधूरे ज्ञानका वाचक है । बौद्धिक ज्ञान अधूरा ज्ञान है । अधूरे ज्ञानसे ही ज्ञानका अभिमान उत्पन्न होता है । पूर्ण ज्ञान होनेसे अभिमान मिट जाता है । अतः बौद्धिक ज्ञानको महत्त्व देना बहुत बड़ा अज्ञान है । बौद्धिक ज्ञानको महत्त्व देनेसे वास्तविक ज्ञानकी ओर दृष्टि नहीं जाती- यही अज्ञानके द्वारा ज्ञानको ढकना है ।

अपने विवेक को महत्त्व देने से अज्ञान का नाश हो जाता है । अज्ञान का नाश होनेपर वह विवेक ही तत्त्वज्ञान में परिणत हो जाता है ।

अज्ञानका नाश विवेकको महत्त्व देनेसे होता है, अभ्याससे नहीं । अभ्यास करनेसे जड़ता के साथ सम्बन्ध बना रहता है; क्योंकि जड़ता (शरीरादि)-की सहायता लिये बिना अभ्यास होता ही नहीं । तत्त्वज्ञानका अनुभव जड़ताके द्वारा नहीं होता, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होता है ।
ॐ तत्सत् !

Tuesday, 31 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१४)


निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह:।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ २१॥

जिसका शरीर और अन्त:करण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा इच्छारहित (कर्मयोगी) केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता।

व्याख्या—

केवल शरीर-निर्वाहके लिये जो कर्म किये जाँय, उनसे यदि कोई पाप बन भी जाय तो वह लगता नहीं । परन्तु जो मनुष्य भोग और संग्रहके लिये कर्म करता है, वह पापसे बच नहीं सकता ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 30 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१४)

तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष:॥ १९॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:।
लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमहर्सि॥ २०॥

इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्ति-रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।
राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्म (कर्म-योग)-के द्वारा ही परम-सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसलिये लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू (निष्काम-भावसे) कर्म करने के ही योग्य है अर्थात् अवश्य करना चाहिये ।

व्याख्या—

मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता, प्रत्युत आसक्तिसे बँधता है । आसक्ति ही मनुष्यका पतन करती है, कर्म नहीं । आसक्ति रहित होकर दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त होकर परमात्त्व-तत्त्वको प्राप्त हो जाता है । कर्ममें परिश्रम और कर्म-योगमें विश्राम है । शरीरकी आवश्यकता परिश्रममें है, विश्राममें नहीं । कर्मयोगमें शरीरसे होनेवाला परिश्रम (कर्म) दूसरोंकी सेवाके लिये और विश्राम (योग) अपने लिये है ।

जनकादि राजाओंने भी कर्मयोगके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त की थी । इससे सिद्ध होता है कि कर्मयोग मुक्तिका स्वतन्त्र साधन है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 28 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.१४)

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥ २१॥

हे पृथानन्दन ! जो मनुष्य इस शरीरी को अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये ?

व्याख्या—

शरीर की किसी भी क्रिया से शरीरी में किंचिन्मात्र भी कोई विकार उत्पन्न नहीं होता । अतः शरीरी किसी भी क्रिया का न तो कर्ता (तथा भोक्ता) बनता है, न कारयिता ही बनता है ।

ॐ तत्सत् !