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Friday, 9 June 2017

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 
  
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्यस्ये मनोरथम् । 
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥१३॥  
 
(वे इस प्रकार के मनोरथ किया करते हैं कि-) इतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर लीं और अब मनोरथ को प्राप्त (पूरा) कर लेंगे। इतना धन तो हमारे पास है ही, इतना धन फिर भी हो जायगा। 
 
 व्याख्या- 
पूर्वपक्ष- दैवी-सम्पत्ति वाले साधकों के मन में भी कभी-कभी व्यापार आदि को लेकर ऐसी स्फुरणाएँ होती हैं कि इतना काम तो हो गया, इतना काम करना बाकी है और इतना काम आगे हो जायगा, इतना पैसा (व्यापार आदि में) आ गया है और इतना पैसा वहाँ देनला है, आदि-आदि। फिर उनमें और आसुरी-सम्पत्ति वाले मनुष्यों में क्या अन्तर हुआ?  
उत्तरपक्ष- दोनों की वृत्तियाँ एक-सी दीखने पर भी दोनों के उद्देश्य में बहुत अन्तर है। साधक का उद्देश्य परमात्म प्राप्ति का होता है; अतः वह उन वृत्तियों में तल्लीन नहीं होता। परन्तु आसुरी सम्पत्ति वालों का उद्देश्य धन का संग्रह करने तथा भोग भोगने को रहता है; अतः वे उन वृत्तियों में ही तल्लीन रहते हैं।

ॐ तत्सत् ! 

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 
  
आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: । 
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥१२॥  
 
वे आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर पदार्थों का भोग करने के लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करने की चेष्टा करते रहते हैं।  
 
व्याख्या- 
जब तक मनुष्य का सम्बन्ध शरीर-संसार के साथ रहता है, तब तक उसकी कामनाओं का अन्त नहीं आता। दूसरे अध्याय के इकतालीसवें श्लोक में भी आया है कि अव्यवसायी मनुष्यों की बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओं वाली होती हैं। कारण कि उन्होंने अविनाशी तत्त्व से विमुख होकर नाशवान को सत्ता और महत्ता दे दी तथा उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लिया।  
आसुर स्वभाव वाले मनुष्य काम और क्रोध को स्वाभाविक मानते हैं। काम और क्रोध के सिवाय उन्हें और कुछ दीखता ही नहीं, इनसे आगे उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। मनुष्य समझता है कि क्रोध करने से दूसरा हमारे वश में रहेगा। परन्तु जो मजबूर, लाचार होकर हमारे वश में हुआ है वह कब तक वश में रहेगा? मौका पड़ते ही वह घात करेगा। अतः क्रोध का परिणाम बुरा ही होता है।

ॐ तत्सत् ! 

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: । 
मोहादृगृहीत्वासद्ग्राहान्प्रर्तन्तेऽशुचिव्रता: ॥१०॥  
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: । 
कामोपभोग परमा एतावदिति निश्चिता: ॥११॥  

कभी पूरी न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मद में चूर रहने वाले तथा अपवित्र व्रत धारण करने वाले मनुष्य मोह के कारण दुराग्रहों को धारण करके (संसार में) विचरते रहते हैं।   
वे मृत्यु पर्यन्त रहने वाली अपार चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, पदार्थों का संग्रह और उनका भोग करने में ही लगे रहने वाले और ‘जो कुछ है, वह इतना ही है’- ऐसा निश्चय करने वाले होते हैं।

ॐ तत्सत् ! 

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥८॥ 
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माण:क्षयाय जगतोऽहिता: ॥९॥

वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, बिना मर्यादा के और बिना ईश्वर के अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, इसके सिवाय और क्या कारण है? (और कारण हो ही नहीं सकता।)
 इस (पूर्वाक्त नास्तिक) दृष्टि का आश्रयम लेने वाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूप को नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्र कर्म करने वाले और संसार के शत्रु हैं, उन मनुष्यों की सामथ्र्य का उपयोग जगत का नाश करने के लिये ही होता है।  

ॐ तत्सत् ! 

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु ॥६॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥७॥ 

इस लोक में दो तरह के ही प्राणियों की सृष्टि है- दैवी और आसुरी। दैवी को तो मैंने विस्तार से कह दिया, अब हे पार्थ! तु मुझ से आसुरी को (विस्तार से) सुनो।
आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य किस में प्रवृत्त होना चाहिये और किससे निवृत्त होना चाहिये- इसको नहीं जानते और उनमें न तो बाह्य शुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य- पालन ही होता है।

व्याख्या-
आसुर मनुष्य केवल अपना सुख-आराम, अपना स्वार्थ देखते हैं। जिससे अपने को सुख मिलता दीखे, उसी में उनकी प्रवृत्ति होती है और जिससे दुःख मिलता दीखे, स्वार्थ सिद्ध होता न दीखे, उसी से उनकी निवृत्ति होती है। वास्तव में प्रवृत्ति और निवृत्ति में शास्त्र ही प्रमाण है; परन्तु अपने शरीर और प्राणों में मोह रहने के कारण आसुर मनुष्यों की प्रवृत्ति और निवृत्ति शास्त्र को लेकर नहीं होती। आसुर स्वभाव के कारण वे शास्त्र की बात सुनते ही नहीं और अगर सुन भी लें तो उसे समझ सकते ही नहीं। कभी सन्त-महात्मओं से शास्त्र की बात सुनने पर भी वे उन्हें स्वीकार नहीं करते।  

ॐ तत्सत् ! 

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 

दैवीसंपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुच: संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥५॥

दैवी सम्पत्ति मुक्ति के लिये और आसुरी सम्पत्ति बन्धन के लिये मानी गयी है। हे पाण्डव! तुम दैवी-सम्पत्ति को प्राप्त हुए हो, इसलिये तुम शोक (चिन्ता) मत करो।

व्याख्या-

जीव के एक ओर भगवान हैं और एक ओर संसार है। जब वह भगवान के सम्मुख होता है तब उसमें दैवी-सम्पत्ति आती है और जब वह संसार के सम्मुख होता है तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आती है।
दूसरों के सुख के लिये कर्म करना अथवा दूसरों का सुख चाहना ‘चेतनता’ है, और अपने सुख के लिये कर्म करना अथवा सुख चाहना, ‘जड़ता’ है। भजन-ध्यान भी आपके सुख के लिये, अपने मान-आदर के लिये करना जड़ता है। चेतनता की मुख्यता से दैवी-सम्पत्ति आती है और जड़ता की मुख्यता से आसुरी-सम्पत्ति आती है। मूल दोध एक ही है, जिससे सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्ति उत्पन्न होती है, और मूल गुण भी एक ही है, जिससे सम्पूर्ण दैवी-सम्पत्ति प्रकट होती है।
मूल दोष है- शरीर-संसार की सत्ता और महत्ता स्वीकार करके उससे सम्बन्ध जोड़ना। मूल गुण है- भगवान की सत्ता और महत्ता स्वीकार करके उनसे सम्बन्ध-जोड़ना। यह मूल दोष और मूल गुण ही स्थान भेद से अनेक रूपों में दीखता है।
जब गुणों के साथ अवगुण रहते हैं, तभी तक गुणों की महत्ता दीखती है और उनका अभिमान होता है। कोई भी अवगुण न रहे तो अभिमान नहीं होता। अभिमान आसुरी-सम्पत्ति का मूल है। अभिमान के कारण मनुष्य को दूसरों की अपेक्षा अपने में विशेषता दीखने लगती है-यह आसुरी-सम्पत्ति है। अभिमान होने के कारण दैवी-सम्पत्ति भी आसुरी-सम्पत्ति की वृद्धि करने वाली बन जाती है। जब गुणों के साथ अवगुण नहीं रहते, तब गुणों की महत्ता नहीं दीखती और उनका अभिमान भी नहीं होता। अभिमान न होने के कारण अर्जुन को अपने में गुण (श्रेष्ठता) नहीं दीखते। इसलिये उनकी चिन्ता दूर करने के लिये भगवान उन से कहते हैं कि तुम्हारे में दैवी-सम्पत्ति है, भले ही वह तुम्हें न दीखे।
गीता में ‘मा शुचः’ पद दो बार आये हैं- एक यहाँ और दूसरा अठारहवें अध्याय के छाछठवें श्लोक में। यहाँ ये पद ‘साधन’ के विषय में और अठारहवें अध्याय में ‘सिद्धि’ के विषय में चिन्ता न करने के लिये आये हैं। अतः भक्त को इन दोनों ही विषयों में चिन्ता नहीं करनी चाहिये। 

ॐ तत्सत् ! 

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥३॥
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥४॥

तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीर की शुद्धि, वैर-भाव का न होना और मान को न चाहना; हे भरतवंशी अर्जुन! ये सभी दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए मनुष्य के लक्षण हैं। 
हे पृथानन्दन! दम्भ करना, घमण्ड करना और अभिमान करना, क्रोध करना तथा कठोरता रखना और अविवेक का होना भी-ये सभी आसुरी सम्पदा को प्राप्त हुए मनुष्य के लक्षण हैं।


ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी सोलहवाँ अध्याय (पोस्ट.१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥१॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम् ॥२॥
श्रीभगवान बोले -
भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की अत्यन्त शुद्धि ज्ञान के लिये योग में दृढ़ स्थिति और सात्विक दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, कर्तव्य-पालन के लिये कष्ट सहना और शरीर-मन-वाणी की सरलता।
अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध न करना, संसार की कामना का त्याग, अन्तःकरण में राग-द्वेषजनित हल चल का न होना, चुगली न करना, प्राणियों पर दया करना, सांसारिक विषयों में न ललचाना, अन्तःकरण की कोमलता, अकर्तव्य करने में लज्जा, चपलता का अभाव। 


ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

इति गुह्रातमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृकृत्यश्च भारत ॥२०॥

हे निष्पाप अर्जुन! इदस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन! इसकेा जानकर मनुष्य ज्ञानवान (ज्ञात-ज्ञातव्य) तथा कृतकृत्य हो जाता है। व्

याख्या-

भगवान ने इस अध्याय में अपने-आप को पुरुषोत्तमरूप से अर्थात अलौकिक समग्ररूप से प्रकट किया है, इसलिये इसे ‘गुह्यतम शास्त्र’ कहा गया है।
पूर्वश्लोक में सर्वभाव से भगवान का भजन करने अर्थात अव्यभिचारिणी भक्ति की बात विशेषरूप से आयी है। भक्ति में मनुष्य प्राप्त प्राप्तव्य हो जाता है। अतः पूर्वश्लोक में प्राप्त प्राप्तव्य होने की बात माननी चाहिये। इस श्लोक में (‘बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च’ पद में) ज्ञातज्ञातव्य तथा कृतकृत्य होने की बात आयी है।
लौकिक क्षर और अक्षर तो प्राप्त हैं; अतः अलौकिक परमात्मा ही प्राप्तव्य हैं। इस श्लोक में यह भाव निकलता है कि भक्त को ज्ञानयोग तथा कर्मयोग- दोनों का फल प्राप्त हो जाता है अर्थात वह ज्ञातज्ञातव्य और कृतकृत्य भी हो जाता है।
ऊँ तत्सदिति

श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पंचदशोऽध्यायः।।१५।। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१८)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

  यो मामेवमसंमूढ़ो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥१९॥

हे भरतवंशी अर्जुन! इस प्रकार जो मोह रहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है।

व्याख्या-

किसी विशेष महत्वपूर्ण बात पर मन रागपूर्वक लगता है और बुद्धि श्रद्धापूर्वक। जब मनुष्य भगवान को क्षर से अतीत जान लेता है, तब उसका मन क्षर से हट कर भगवान में लग जाता है। जब वह भगवान को अक्षर से उत्तम जान लेता है, तब उसकी बुद्धि भगवान में लग जाती है फिर उसकी प्रत्येक वृत्ति और क्रिया से स्वतः भगवान का भजन होता है। कारण कि उसकी दृष्टि में एक भगवान के सिवाय दूसरा कोई होता ही नहीं।
गीता में ‘सर्ववित्’ शब्द केवल भक्त के लिये ही यहाँ आया है। भक्त समग्र को अर्थात लौकिक और अलौकिकदोनों को जानता है, इसलिये वह सर्ववित् होता है। कारण कि लौकिक के अन्तर्गत अलौकिक नहीं आ सकता, पर अलौकिक के अन्तर्गत लौकिक भी आ जाता है। अतः निर्गुण तत्त्व (अक्षर)- को जानने वाला ब्रह्मज्ञानी सर्ववित् नहीं होता, प्रत्युत समग्र भगवान को जानने वाला भक्त सर्ववित होता है। 


ॐ तत्सत् !

Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१७)


॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।१८।।

मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ ।

व्याख्या—

क्षर और अक्षर की स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं, पर परमात्मा की स्वतन्त्र सत्ता है । क्षर और अक्षर दोनों परमात्मा में ही रहते हैं । परन्तु अक्षर अर्थात्‌ जीव क्षर के साथ सम्बन्ध जोड़कर उसके अधीन हो जाता है-‘ययेदं धार्यते जगत्‌’ (गीता ७ । ५) । परमात्मा क्षर के अधीन नहीं होते, प्रत्युत क्षर से अतीत रहते हैं । इसलिये परमात्मा अक्षर (जीव)-से भी उत्तम हैं । यदि जीव जगत्‌ के साथ सम्बन्ध न जोड़कर उसके स्वामी परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़े तो वह परमात्मा से अभिन्न (आत्मीय) हो जायगा-‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌’ (गीता ७ । १८) ।

मुक्ति में तो अक्षर (स्वरूप)-में स्थिति होती है, पर भक्ति में अक्षर से भी उत्तम पुरुषोत्तम की प्राप्ति होती है । स्वरूप अंश है, परुषोत्तम अंशी हैं ।


ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।१७।।

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नाम से कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर सब का भरणपोषण करता है।

व्याख्या—
पुरुषोत्तमको ‘अन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो लौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम्को ‘अन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो अलौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम दोनोंसे विलक्षण अर्थात्‌ अलौकिक हैं । अतः परमात्मा विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्‍वास्के विषय हैं । परमात्माके होनेमें भक्त, सन्त-महात्मा, वेद और शास्त्र ही प्रमाण हैं । ‘अन्य’ का स्पष्टीकरण भगवान्‌ ने अगले श्लोक में किया है ।
भगवान्‌ मात्र प्राणियों का पालन-पोषण करते हैं । पालन-पोषण करने में भगवान्‌ किसी के साथ कोई पक्षपात (विषमता) नहीं करते । वे भक्त-अभक्त, पापी-पुण्यात्मा, आस्तिक-नास्तिक आदि सब का समानरूप से पालन-पोषण करते हैं । प्रत्यक्ष देखने में भी आता है कि भगवान्‌ द्वारा रचित सृष्टि में सूर्य सब को समानरूप से प्रकाश देता है, पृथ्वी सब को समानरूप से धारण करती है, वायु श्‍वास लेने के लिये सब को समानरूप से प्राप्त होती है, अन्न-जल सबको समानरूप से तृप्त करते हैं, इत्यादि । जब भगवान्‌ के द्वारा रचित सृष्टि भी इतनी निष्पक्ष, उदार है तो फिर भगवान्‌ स्वयं कितने निष्पक्ष, उदार होंगे !
आधुनिक वेदान्तियों ने ईश्‍वर को कल्पित बताकर साधक-जगत्‌ की बड़ी हानि की है ! उन्हें इस बात का भय है कि ईश्‍वर को मानने से अपने अद्वैत सिद्धान्त में कमी आ जायगी ! परन्तु ईश्‍वर किस की कल्पना है--इसका उत्तर उनके पास नहीं है । वास्तव में सत्ता एक ही है । दूसरी सत्ता का तात्पर्य संसार से है, ईश्‍वर से नहीं; क्योंकि संसार ‘पर’ है और ईश्‍वर ‘स्व’ (स्वकीय) है । अपना राग मिटाये बिना दूसरी सत्ता नहीं मिटेगी । राग तो अपना है, पर मान लिया ईश्‍वरको कल्पित ! अतः ईश्‍वरको कल्पित न मानकर अपना राग मिटाना चाहिये । ईश्‍वर कल्पित नहीं है, प्रत्युत अलौकिक है । वह मायारूपी धेनुका बछड़ा नहीं है, प्रत्युत साँड़ है ! उपनिषद्‌में भी आया है-मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तो महेश्‍वरम्‌’ (श्वेताश्वतर० ४ । १०) ‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और मायापति महेश्वरको समझना चाहिये । आजतक जिस ईश्‍वरके असंख्य भक्त हो चुके हैं, वह कल्पित कैसे हो सकता है ?’

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)


॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।१६।।

इस संसार में क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकार के पुरुष हैं । सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है।

व्याख्या—

पहले छ्ठे श्लोक में और फिर बारहवें से पन्द्रहवें श्लोक तक भगवान्‌ ने अलौकिक तत्त्व का वर्णन किया कि स्वतन्त्र सत्ता अलौकिक की ही है, लौकिक की नहीं । लौकिक की सत्ता अलौकिक से ही है । अलौकिक से ही लौकिक प्रकाशित होता है । लौकिक में जो प्रभाव देखने में आता है, वह सब अलौकिक का ही है । अब सोलहवें श्लोक में भगवान्‌ ‘लोके’ पद से ‘लौकिक तत्त्व’ का वर्णन करते हैं ।
क्षर (जगत्‌) तथा अक्षर (जीव)-दोनों लौकिक हैं, और भगवान्‌ इस दोनोंसे विलक्षण अर्थात्‌ अलौकिक हैं-‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः’ (गीता १५ । १७) । कर्मयोग और ज्ञानयोग-ये दो योगमार्ग भी लौकि हैं-‘लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा......’ (गीता ३ । ३) । क्षरको लेकर कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; परन्तु भक्तियोग अलौकिक है, जो भगवान्‌ को लेकर चलता है । सातवें अध्यायमें वर्णित अपरा प्रकृति को यहाँ ‘क्षर’ नाम से और परा प्रकृति को यहाँ ‘अक्षर’ नाम से कह गया है ।



ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

  सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । '
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५॥ 

मैं ही सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ तथा मुझ से ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषों का नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। वेदों के तत्त्व का निर्णय करने वाला और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ। 

व्याख्या-
पिछले तीन श्लोकों में भगवान ने प्रभाव और क्रियारूप से अपनी विभूतियों का वर्णन किया, अब प्रस्तुत श्लोक में स्वयं अपना वर्णन करते हैं। तात्पर्य है कि इस श्लोक में स्वयं भगवान का वर्णन है, आदित्यगत, चन्द्रगत, अग्निगत अथवा वैश्वानरगत भगवान का वर्णन नहीं। मूल में एक ही तत्त्व है, केवल वर्णन में भिन्नता है। 
पहले ‘ममैवांशो जीवलोके’पदों से यह सिद्ध हुआ कि भगवान अपने हैं और यहाँ ‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः’ पदों से यह सिद्ध होता है कि भगवान अपने में हैं। भगवान को अपना स्वीकार करने से उनमें स्वाभाविक प्रेम होगा और अपने में स्वीकार करने से उन्हें पाने के लये दूसरी जगह जाने की जरूरत नहीं रहेगी। सबके हृदय में रहने के कारण भगवान प्राणिमात्र को नित्यप्राप्त हैं; अतः किसी भी साधक को भगवान की प्राप्ति से निराश नहीं होना चाहिये। 
भगवान कहते हैं कि वेद अनेक है, पर उन सब में जानने योग्य एक मैं ही हूँ और उन सबको जानने वाला भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ- ‘वासुदेवः सर्वम्।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः* पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।१४।।

प्राणियों के शरीर में रहनेवाला मैं प्राण-अपान से युक्त वैश्वानर (जठराग्नि) होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

व्याख्या—

पृथ्वी में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करना, चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण वनस्पतियों का पोषण करना, फिर उनको खानेवाले प्राणियों के भीतर जठराग्नि होकर खाये हुए अन्न को पचाना आदि सम्पूर्ण कार्य भगवान्‌ की ही शक्ति से होते हैं । परन्तु मनुष्य व्यर्थ में ही अभिमान कर लेता है; जैसे बैलगाड़ी के नीचे छाया में चलने वाला कुत्ता समझता है कि बैलगाड़ी मैं चलाता हूँ !

.......................................................
* गीता में सब जगह प्राण और अपान—इन दोनों का ही वर्णन हुआ है ; जैसे—
(१).अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे | प्राणाऽपानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा: ||....(४.२९)
(२).प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यांतरचारिणौ ||...(५.२७)

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२ )


॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: ॥१३॥

मैं ही पृथ्वी में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ और (मैं ही) रसस्वरूप चन्द्रमा होकर समस्त ओषधियों (वनस्पतियों)-को पुष्ट करता हूँ।

व्याख्या-
पृथ्वी, चन्द्रमा आदि सब भगवान की अपरा प्रकृति है। अतः इसके उत्पादक, धारक, पालक, संरक्षक, प्रकाशक आदि सब कुछ भगवान ही हैं। भगवान की शक्ति होने से अपरा प्रकृति भगवान से अभिन्न है।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.११)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१२॥

सूर्य को प्राप्त हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमा में है तथा जो तेज अग्नि में है, उस तेज को मेरा ही जान।

व्याख्या-
प्रभाव और महत्व की तरफ आकर्षित होना जीव का स्वभाव है। प्राकृत पदार्थों के सम्बन्ध से जीव प्राकृत पदार्थों के प्रभाव और महत्व से प्रभावित हो जाता है। अतः हीवपर पड़े प्राकृत पदार्थों के प्रभाव और महत्व को हटाने के लिये भगवान का यह रहस्य प्रकट करते हैं कि उन पदार्थों में जो प्रभाव और महत्व देखने में आता है, वह वस्तुतः (मूल में) मेरा ही है, उनका नहीं। सर्वोपरि प्रभावशाली तथा महत्वशाली मैं ही हूँ। मेरे ही प्रकाश से सब प्रकाशित हो रहे हैं।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१०)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
 
   यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । 
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: ॥११॥  
 
यत्न करने वाले योगी लोग अपने-आप में स्थित इस परमात्मतत्त्व का अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करने पर भी इस तत्त्व का अनुभव नहीं करते।  
 
व्याख्या- 
सदा न भोग साथ रहता है, न संग्रह साथ रहता है- यह विवेक मनुष्य में स्वतः है। परन्तु जो मनुष्य शास्त्र पढ़ते हुए, सत्संग करते हुए, साधन करते हुए भी अपने विवेक की तरफ ध्यान नहीं देते, भोग और संग्रह से अलगाव का अनुभव नहीं करते, वे मनुष्य ‘अकृतात्मा’ हैं। ऐसे मनुष्यों को अठारहवें अध्याय के सालहवें श्लोक में भगवान ने ‘अकृतबुद्धि’ और ‘दुर्मति’ कहा है। यद्यपि परमात्मप्राप्ति कठिन नहीं है, तथापि भीतर में राग, आसक्ति, सुखबुद्धि पड़ी रहने से साधन करते हुए भ्ज्ञी परमात्मा को नहीं जानते। कारण कि भोग तथा संग्रह में रुचि रखने वाले मनुष्य का विवेक स्थिर नहीं रहता।  
पूर्वश्लोक में जिन्हें ‘विमूढाः’ कहा गया है, उन्हीं को यहाँ ‘अचेतसः कहा गया है। गुणों से मोहित होने के कारण वे न तो विषयेां के विभाग को जानते हैं और न स्वयं के विभाग को ही जानते हैं अर्थात भेागों का संयोग-वियोग अलग है और स्वयं अलग है-यह नहीं जानते।  
सातवें से ग्यारहवें श्लोक तक के इस प्रकरण में भगवान यह बताना चाहते हैं कि मेरा अंश जीवात्मा सर्वथा अलग है और जिस सामग्री (शरीरादि पदार्थ और क्रिया)- को वह भूल से अपनी मानता है, वह सर्वथा अलग है। सूर्य और अमावस्या की रात्रि की तरह दोनों का विभाग ही अलग-अलग है। उनका परस्पर संयोग होना सम्भव ही नहीं है। जो उपर्युक्त जड़ और चेतन-दोनों के विभाग को सर्वथा अलग-अलग देखता है, वही ज्ञानी और योगी है। परन्तु जो दोनों को मिला हुआ देखता है, वह अज्ञानी और भोगी है।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ॥१०॥

शरीर को छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीर में स्थित हुए अथवा विषयों को भोगते हुए भी गुणों से युक्त जीवात्मा के स्वरूप को मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रों वाले (ज्ञानी मनुष्य ही) जानते हैं।

व्याख्या-
शरीर को छोड़कर जाना, दूसरे शरीर में स्थित होना और विषयों को भोगना-तीनों क्रियाएँ अलग-अलग हैं, पर उनमें रहने वाला जीवात्म एक ही है-यह बात प्रत्यक्ष होते हुए भी अविवेकी मनुष्य इसको नहीं जानता अर्थात अपने अनुभव को महत्व नहीं देता। कारण कि तीनों गुणों से मोहित होने के कारण वह बेहोश-सा रहता है।
 भगवान ने पिछले श्लोक में पाँच क्रियाएँ बतायी थीं-सुनना, देखना, स्पर्श करना, स्वाद लेना तथा सूँघना, और इस श्लोक में तीन क्रियाएँ बतायी हैं- शरीर को छोड़कर जाना, दूसरे शरीर में स्थित होना तथा विषयों को भोगना। इन आठों में कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं रहती, पर स्वयं निरन्तर रहता है। क्रियाएं तो आठ हैं, पर इन सब में स्वयं एक ही रहता है। इसलिये इनके भाव और अभाव का, आरम्भ और अन्त का ज्ञान सब को होता है। जिसे आरम्भ और अन्त का ज्ञान होता है, वह स्वयं नित्य होता है- यह नियम है।
अनेक अवस्थाओं में स्वयं एक रहता है और एक रहते हुए अनेक अवस्थाओं में जाता है। यदि स्वयं एक न रहता तो सब अवस्थाओं का अलग-अलग अनुभव कौन करता? परन्तु ऐसी बात प्रत्यक्ष होते हुए भी विमूढ़ मनुष्य इस तरफ नहीं देखते, प्रत्युत ज्ञानरूपी नेत्रों वाले योग मनुष्य ही देखते हैं। 

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.०८)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
 
  श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । 
 अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥९॥  
 
यह जीवात्मा मन का आश्रय लेकर ही श्रोत्र और नेत्र तथा त्वचा, रसना और घ्राण-इन पाँचों इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता है।  
 
व्याख्या- 
जैसे कोई व्यापारी किसी कारणवश एक जगह से दुकान उठाकर दूसरी जगह लगाता है, ऐसे ही जीवात्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाता है और जैसे पहले शरीर में जाने पर (वही स्वभाव होने से) विषयों का सेवन करने लगता है। इस प्रकार जीवात्मा बार-बार विषयों में आसक्ति के कारण ऊँच-नीच योनियों में भटकता रहता है। कारण कि विषयों का सेवन करने से स्वयं की गौणता और शरीर-संसार की मुख्यता हो जाती है। इसलिये स्वयं भी जगद्रूप हो जाता है। 

ॐ तत्सत् !