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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)


॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।१६।।

इस संसार में क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकार के पुरुष हैं । सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है।

व्याख्या—

पहले छ्ठे श्लोक में और फिर बारहवें से पन्द्रहवें श्लोक तक भगवान्‌ ने अलौकिक तत्त्व का वर्णन किया कि स्वतन्त्र सत्ता अलौकिक की ही है, लौकिक की नहीं । लौकिक की सत्ता अलौकिक से ही है । अलौकिक से ही लौकिक प्रकाशित होता है । लौकिक में जो प्रभाव देखने में आता है, वह सब अलौकिक का ही है । अब सोलहवें श्लोक में भगवान्‌ ‘लोके’ पद से ‘लौकिक तत्त्व’ का वर्णन करते हैं ।
क्षर (जगत्‌) तथा अक्षर (जीव)-दोनों लौकिक हैं, और भगवान्‌ इस दोनोंसे विलक्षण अर्थात्‌ अलौकिक हैं-‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः’ (गीता १५ । १७) । कर्मयोग और ज्ञानयोग-ये दो योगमार्ग भी लौकि हैं-‘लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा......’ (गीता ३ । ३) । क्षरको लेकर कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; परन्तु भक्तियोग अलौकिक है, जो भगवान्‌ को लेकर चलता है । सातवें अध्यायमें वर्णित अपरा प्रकृति को यहाँ ‘क्षर’ नाम से और परा प्रकृति को यहाँ ‘अक्षर’ नाम से कह गया है ।



ॐ तत्सत् !

Thursday, 11 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।१५।।
  कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्विकं निर्मलं फलम् । 

रजसस्तुफलं दु:खमज्ञानं तमस:फलम् ॥१६॥   

रजोगुण के बढ़नेपर मरने वाला प्राणी मनुष्ययोनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़योनियों में जन्म लेता है।

विवेकी पुरुषों ने शुभ कर्म का तो सात्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख कहा है और तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

  व्याख्या—

जिसने जीवनभर अच्छे कर्म किये हैं, जिसके अच्छे भाव रहे हैं, वह यदि अन्तकाल में रजोगुण के बढ़ने पर मर जाता है तो मनुष्ययोनि में जन्म लेने पर भी उसके आचरण, भाव अच्छे रहेंगे । इसी प्रकार अच्छे कर्म करनेवाला यदि अन्तकाल में तमोगुण के बढ़ने पर मर जाता है तो पशु, पक्षि आदि मूढ़योनि में जन्म लेने पर भी उसके आचरण, भाव अच्छे ही रहेंगे ।

रजोगुण में ‘राग’-अंश ही जन्म-मरण देनेवाला है, ‘क्रिया’- अंश नहीं । पदार्थ, क्रिया अथवा व्यक्ति, किसीमें भी राग हो जायगा तो वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेगा । मनुष्य स्वाभाविक कर्मसंगी है; क्योंकि नये कर्म करने का अधिकार मनुष्ययोनि में ही है । 


 वास्तव में कर्म सात्विक-राजस-तामस नहीं होते, प्रत्युत कर्ता ही सात्विक-राजस-तामस होता है। जैसा कर्ता होता है, उसके द्वारा वैसे ही कर्म होते हैं, जैसे कर्म होते हैं, वैसा ही भाव दृढ़ होता है। जैसा भाव होता है, उसके अनुसार ही अन्तकालीन चिन्तन होता है। अन्तकालीन चिन्तन के अनुसार ही गति होती है।
 
ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।२१।।

प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणों का भोक्ता बनता है और गुणों का सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है।

व्याख्या—

‘मैं’ जड़ (प्रकृति) है और ‘हूँ’ चेतन (पुरुष) है । ‘मैं हूँ’-यह जड़-चेतनका तादात्म्य है । इस ‘मैं हूँ’ में ही कर्तापन तथा भोक्तापन रहता है । यदि साधक ‘मैं’ को मिटा दे तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ रहेगा । जैसे लोहे और अग्नि में तादात्म्य न रहने से लोहा पृथ्वी पर ही रह जाता है और अग्नि निराकार अग्नि-तत्त्व में लीन हो जाती है, ऐसे ‘मैं’ (अहम्‌) तो प्रकृतिमें ही रह जाता है और ‘हूँ’ (‘है’ का स्वरूप होनेसे) ‘है’ में ही विलीन हो जाता है । मेरा कुछ नहीं है और मुझे कुछ नहीं चाहिये-इन दो बातोंकी सिद्धि होते ही ‘हूँ’ सत्तामात्रमें अर्थात्‌ ‘है’ में विलीन हो जाती है । तात्पर्य है कि ‘मैं’ (जड़-अंश) जड़में और ‘हूँ’ (चेतन-अंश) चेतन तत्त्वमेम विलीन हो जाता है । इस प्रकार जड़-चेतनकी ग्रन्ति छूट जाती है और फिर एक ‘है’ (सत्तामात्र)- के सिवाय कुछ नहीं रहता । ‘है’ में कर्तापन और भोक्तापन नहीं है । तात्पर्य है कि भोगोंमें ‘हूँ’ खिंचता है, ‘है’ नहीं खिंचता । ‘हूँ’ ही कर्ता-भोक्ता बनता है, ‘है’ कर्ता-भोक्ता नहीं बनता । अतः साधक ‘हूँ’ को न मानकर ‘है’ को ही माने अर्थात्‌ अनुभव करे ।

सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण कोई बाधा नहीं देते; परन्तु इनका संग करनेसे जीव ऊर्ध्वगति, मध्यगति अथवा अधोगतिमें जाता है । गुणोंका संग जीव स्वयं करता है । असंगता जीवका स्वरूप है-‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदा० ४ । ३ । १५) । यदि जीव गुणोंका संग न करे तो जन्म-मरण हो ही नहीं सकता ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।।२१।।

वे ही देवताओं के समुदाय आप में प्रविष्ट हो रहे हैं । उनमेंसे कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आप के नामों और गुणों का कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समुदाय कल्याण हो ! मङ्गल हो ! ऐसा कहकर उत्तम उत्तम स्तोत्रों के द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं ।

व्याख्या—

देवता, महर्षि, सिद्ध आदि सभी भगवान्‌ के ही विराट्‌रूप के अंग हैं । अतः प्रविष्ट होने वाले, भयभीत होने वाले, भगवान्‌ के नामों और गुणों का कीर्तन करने वाले और स्तुति करने वाले भी भगवान्‌ हैं और जिनमें प्रविष्ट हो रहे हैं, जिनसे भयभीत हो रहे हैं, जिनके नामों और गुणों का कीर्तन कर रहे हैं तथा जिनकी स्तुति कर रहे हैं, वे भी भगवान्‌ हैं ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।२०।।

हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ।

व्याख्या—

सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भगवान्‌ ही हैं-इसका तात्पर्य यह है कि एक भगवान्‌के सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात्‌ सब कुछ भगवान्‌ही हैं । भगवान्‌ श्रीकृष्ण समग्र हैं और आत्मा उनकी विभूति है । आत्मा भगवान्‌की परा प्रकृति है और अन्तःकरण अपरा प्रकृति है (गीता ७ । ४-५} । पर और अपरा-दोनों ही भगवान्‌से अभिन्न हैं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा-
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ २०॥

तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम अनुष्ठानको करनेवाले और सोमरसको पीनेवाले जो पापरहित मनुष्य यज्ञोंके द्वारा (इन्द्ररूपसे) मेरा पूजन करके स्वर्गप्राप्तिकी प्रार्थना करते हैं, वे (पुण्योंके फलस्वरूप) पवित्र इन्द्रलोकको प्राप्त करके वहाँ स्वर्गके देवताओंके दिव्य भोगोंको भोगते हैं।

व्याख्या—

यहाँ ऐसे मनुष्योंका वर्णन है, जिनके भीतर संसारकी सत्ता और महत्ता बैठी हुई है और जो भगवान्‌की अविधिपूर्वक उपासन करते हैं (गीता ९ । २३ ) । ऐसे मनुष्योंकी उपासनाका फल नाशवान्‌ ही होता है (गीता ७ । २३) ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)


यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिन:।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ २३॥

परन्तु हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! जिस काल अर्थात् मार्ग में शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और जिस मार्गमें गये हुए आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गों को मैं कहूँगा।

व्याख्या—

जैसे किसी स्थानपर हमारी कोई वस्तु (कपड़ा, थैला, रुपये आदि) छूट जाती है तो उसे लनेके लिये हम वापिस उस स्थानपर जाते हैं, ऐसे ही संसार में किसी वस्तु-व्यक्ति में मनुष्यकी आसक्ति रहती है तो उसे पुनः लौटकर संसार में आना पड़ता है । तात्पर्य है कि परिवर्तनशील शरीर-संसार के साथ सम्बन्ध रखने से पीछे लौटकर आना पड़ता है और शरीर-संसार के साथ सम्बन्ध न रखने से पीछे लौटकर नहीं आना पड़ता ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.१५)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥ १८॥

पहले कहे हुए सब-के-सब (चारों) ही भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है—ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह मुझसे अभिन्न है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मुझमें ही दृढ़ स्थित है।

व्याख्या—

अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु भक्तको उदार कहना वस्तवमें भगवान्‌की अपनी उदारता है ! उनको उदार कहनेका तात्पर्य है कि वे संसारसे विमुख होकर भगवान्‌के सम्मुख हो गये ।

तत्त्वज्ञानीकी भगवान्‌के साथ सधर्मता होती है-‘मम साधर्म्यमागताः’ (गीता १४ । २), पर भक्तकी भगवान्‌के साथ आत्मीयता होती है-‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌’ । साधर्म्यमें जीव और ब्रह्ममें भेद होता है । आत्मीयतामें भक्त और भगवान्‌में अभिन्नता होती है । अभेदमें जीव और ब्रह्म दोसे एक हो जाते हैं । अभिन्नतामेंभक्त और भगवान्‌ प्रेम-लीलाके लिये एकसे दो हो जाते हैं । तत्त्वज्ञानी में तो सूक्ष्म अहम्‌ रहता है, पर भक्तमें अहम्‌ का सर्वथा नाश हो जाता है, इसलिये भगवान्‌ कहते हैं-‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌ ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 5 April 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.१५)

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
नि:स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ १८॥
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मन:॥ १९॥

वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे नि:स्पृह हो जाता है, उस कालमें वह योगी है—ऐसा कहा जाता है।
जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है,योगका अभ्यास करते हुए वशमें किये हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 4 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१५)


यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर:।
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥ २२॥

(जो कर्मयोगी फलकी इच्छाके बिना) अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे रहित तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

ॐ तत्सत् !

Friday, 30 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१५)

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २१॥

श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

व्याख्या—

समाजमें जिस मनुष्यको लोग श्रेष्ट मानते हैं, उसपर विशेष जिम्मेदारी रहती है कि वह ऐसा कोई आचरण न करे तथा ऐसी कोई बात न कहे, जो लोक-मर्यादा तथा शास्त्र-मर्यादाके विरुद्ध हो ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 29 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.१५)

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ २२॥

मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है।

व्याख्या—

जैसे कपड़े बदलनेसे मनुष्य बदल नहीं जाता, ऐसे ही अनेक शरीरोंको धारण करने और छोड़नेपर भी शरीरी वही-का-वही रहता है, बदलता नहीं । तात्पर्य है कि शरीरके परिवर्तन तथा नाशसे स्वयंका परिवर्तन तथा नाश नहीं होता । यह सबका अनुभव है कि हम रहते हैं, बचपन आता और चला जाता है । हम रहते हैं, जवानी आती और चली जाती है । हम रहते हैं, बुढ़ापा आता और चला जाता है । वास्तवमें न बचपन है, न जवानी है, न बुढ़ापा है, न मृत्यु है, प्रत्युत केवल हमारी सत्ता ही है ।

ॐ तत्सत् !