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Tuesday, 21 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.३२)


योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥ ४१॥
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मन:।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥ ४२॥

हे धनंजय ! योग (समता)-के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मों से सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है और विवेकज्ञान के द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयों का नाश हो गया है,ऐसे स्वरूप-परायण मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते ।
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय का ज्ञानरूप तलवार से छेदन करके योग (समता)-में स्थित हो जा और (युद्धके लिये) खड़ा हो जा।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसन्न्यासयोगो नाम
चतुर्थोऽध्याय:॥ ४॥

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.३१)


अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:॥ ४०॥

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न तो यह लोक (हितकारक) है, न परलोक (हितकारक) है और न सुख ही है।

व्याख्या—

विवेक और श्रद्धाकी आवश्यकता सभी साधनोंमें है । संशयात्मा मनुष्यमें विवेक और श्रद्धा नहीं होते अर्थात्‌ न तो वह खुद जानता है और न दूसरेकी बात मानता है । ऐसे मनुष्यका परमार्थिक मार्गसे पतन हो जाता है । उसका यह लोक भी बिगड़ जाता है और परलोक भी ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.३०)

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ ३९॥

जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—

जिसकी इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, वही साधन-परायण होता है । जो साधन-परायण होता है, वही पूर्ण श्रद्धावान्‌ होता है । ऐसे पूर्ण श्रद्धावान्‌ साधक को ज्ञान की प्राप्ति तत्काल हो जाती है । अतः ज्ञान की प्राप्ति में वक्तापर तथा सिद्धान्त पर श्रद्धा-विश्वास मुख्य कारण है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 15 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२९)


न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति॥ ३८॥

इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला नि:सन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है, (वह कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है।

व्याख्या—

जिस तत्त्वज्ञानको पानेके लिये कर्मोंका त्याग करके अनुभवी और शास्त्रज्ञ महापुरुषकी शरणमें जाना पड़ता है (गीता ४ । ३४), वही तत्त्वज्ञान कर्मयोगीको सब कर्म करते हुए अपने-आपमें ही प्राप्त हो जाता है । तत्त्वज्ञानके लिये उसे कहीं जाना नहीं पड़ता, कोई दूसरा साधन नहीं करना पड़ता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२७)

अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम:।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥ ३६॥

अगर तू सब पापियों से भी अधिक पापी है तो भी तू ज्ञानरूपी नौका के द्वारा नि:सन्देह सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा।

व्याख्या—

संसारमें जितने पापी हैं, उन सब पापियोंमें भी जो सबसे अधिक पापी हैं, ऐसे महापापीको भी ज्ञान प्राप्त हो सकता है । इसलिये किसी भी मनुष्यको अपने कल्याणके विषय में निराश नहीं होना चाहिये । मनुष्यमात्र ज्ञानप्राप्ति का अधिकारी है । ज्ञानकी प्राप्तिमें पाप बाधक नहीं हैं, प्रत्युत नाशवान्‌की कामना बाधक है (गीता ३ । ३७-४१) ।

दो विभाग हैं-जड़ और चेतन । ये दोनों विभाग अन्धकार और प्रकाशकी तरह परस्पर सर्वथा असम्बद्ध हैं । सम्पूर्ण क्रियाएँ जड़-विभाग में ही होती हैं । चेतन-विभाग में कभी किंचिन्मात्र भी कोई क्रिया नहीं होती । सम्पूर्ण पाप जड़-विभाग में ही हैं, चेतन-विभाग में नहीं । जड़ और चेतनके विभाग को अलग-अलग जानना ही ज्ञान है । इस ज्ञानरूपी अग्नि से सम्पूर्ण पाप सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२६)

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥ ३५॥

जिस (तत्त्वज्ञान)-का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा और हे अर्जुन! जिस (तत्त्वज्ञान)-से तू सम्पूर्ण प्राणियोंको नि:शेष भावसे पहले अपनेमें और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखेगा।

व्याख्या—

तत्त्वज्ञान होनेपर फिर मोह नहीं होता; क्योंकि वास्तवमें मोहकी सत्ता है ही नहीं-‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २ । १६) । इसलिये तत्त्वज्ञान एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है । जैसे, पृथ्वीपर दिनके बाद रात होती है, रातके बाद दिन होता है; परन्तु सूर्यमें रात आती ही नहीं । वहाँ नित्य-निरन्तर दिनसे भी विलक्षण प्रकाश रहता है । ऐसे ही तत्त्वज्ञानरूप सूर्यमें मोहरूप अन्धकारका प्रवेश कभी हुआ ही नहीं, है ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं । मोहकी सत्ता जीवकी दृष्टिमें है ।

परमात्माके अन्तर्गत जीव है-‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५ । ७) और जीवके अन्तर्गत जगत्‌ है-‘ययेदं धार्यते जगत्‌’ (गीता ७ । ५) । इसलिये साधक पहले जगत्‌को अपनेमें देखता है-‘द्रक्ष्यस्यात्मनि’, फिर अपनेको परमात्मामें देखता है-‘अथो मयि’ । जगत्‌को अपनेमें देखनेसे अहम्‌ की सूक्ष्म सत्ता रहती है । यह सूक्ष्म अहम्‌ जन्म-मरण देने वाला तो नहीं होता, पर दार्शनिक मतभेद करानेवाला होता है । अपनेको परमात्मामें देखनेसे अहम्‌का सर्वथा नाश हो जाता है और एक चिन्मय सत्तामात्रके सिवाय कुछ नहीं रहता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२५)


तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:॥ ३४॥

उस तत्त्वज्ञानको (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर) समझ। उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे तत्त्वदर्शी (अनुभवी) ज्ञानी (शास्त्रज्ञ) महापुरुष तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे।

व्याख्या—

तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीका वर्णन करते हुए भगवान्‌ मानो यह कहना चाहते हैं कि केवल गुरु बनानेसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती और केवल शिष्य बनानेसे गुरुका कर्तव्य पूरा नहीं होता । यदि कोई अनुभवी महापुरुषके पास जाकर उन्हें प्रणाम करे अर्थात्‌ अपने-आपको उनके समर्पित कर दे, उनकी आज्ञाके अनुसार काम करे और उनके सामने अपनी जिज~झासा प्रकट करे तो वे गुरु-शिष्यका सम्बन्ध जोड़े बिना तत्त्वज्ञानका उपदेश दे देंगे ।

जिससे तत्त्वज्ञानका उपदेश लिया जाय, उस महापुरुषका अनुभवी और शास्त्रज्ञ होना आवश्यक है । यदि वह अनुभवी तो हो पर शास्त्रज्ञ नहीं हो तो जिज्ञासुकी अनेक शंकाओंका समुचित समाधान नहीं कर पायेगा । यदि वह शास्त्रज्ञ तो हो, पर अनुभवी नहीं हो तो उसके वचन वैसे ठोस एवं प्रभावशाली नहीं होंगे, जिनसे जिज्ञासुको बोध हॊ जाय ।

अनुभवी और शास्त्रज्ञ-इन दोनोंमें भी महापुरुषका अनुभवी होना मुख्य है । अनुभवी महापुरुषके हृदयमें शास्त्र स्वतः प्रकट होते हैं । अनुभवी सन्तोंकी वाणीसे ही शास्त्र बनते हैं । उनकी वाणी स्वतः शास्त्रके अनुकूल होती है ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 11 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२४)

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥ ३३॥

हे परन्तप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान (तत्त्वज्ञान)-में समाप्त (लीन) हो जाते हैं।

व्याख्या—

पहले कहे गये बारह यज्ञ ‘द्रव्यमय यज्ञ’ हैं । उन सबकी अपेक्षा आगे कहा जानेवाला ‘ज्ञानयज्ञ’ श्रेष्ट है; क्योंकि ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है । द्रव्यमय यज्ञमें क्रिया तथा पदार्थकी मुख्यता है और ज्ञानयज्ञमें विवेक-विचारकी मुख्यता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२३)


यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम॥ ३१॥
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥ ३२॥

हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा?
इस प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं। उन सब यज्ञोंको तू कर्मजन्य जान। इस प्रकार जानकर (यज्ञ करनेसे) तू कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा।

व्याख्या—

जिसने कर्म करते हुए भी उससे निर्लिप्त (कर्तृत्व-फलेच्छारहित) रहनेकी विद्याको जान लिया है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२२)


अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा:॥ २९॥
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा:॥ ३०॥

दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका (पूरक करके) प्राण और अपानकी गति रोककर (कुम्भक करके), फिर प्राणमें अपानका हवन (रेचक) करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी (साधक) यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

व्याख्या—

पूरक, कूम्भक और रेचकपूर्वक प्राणायाम करना ‘प्राणायामरूप यज्ञ’ है । प्राण-अपान को अपने-अपने स्थान पर रोक देना ‘स्तम्भवृत्ति (चतुर्थ) प्राणायामरूप यज्ञ’ है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 8 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२१)


द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता:॥ २८॥

दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यमय यज्ञ करनेवाले हैं और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं और दूसरे कितने ही योगयज्ञ करनेवाले हैं तथा कितने ही स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं।

व्याख्या—

मिली हुई वस्तुओं को निष्कामभाव से दूसरों की सेवा में लगाना ‘द्रव्ययज्ञ’ है । स्वधर्मपालन में आनेवाली कठिनाईयों को प्रसन्नता से सह लेना ‘तपोयज्ञ’ है । कर्मों की सिद्धि-असिद्धि में तथा अनुकूल या प्रतिकूल फल की प्राप्ति में सम रहना ‘योगयज्ञ’ है । सत्‌-शास्त्रों का अध्ययन-मनन, नामजप आदि करना ‘स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ’ है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी चौथा अध्याय (पोस्ट.२०)



सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुहृति ज्ञानदीपिते ॥27

अन्य योगी लोग सम्पूर्ण इन्द्रियों की क्रियाओं को और प्राणों की क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयमयोग (समाधियोग) रूप में अग्नि में हवन किया करते हैं।

व्याख्या- मन-बुद्धि वाला सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणों की क्रियाओं को रोक कर समाधि में स्थित हो जाना समाधिरूप यज्ञहै।

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१९)

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥ २६॥

अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं।

व्याख्या—

एकान्तकाल में अपनी इन्द्रियों को भोग में न लगने देना ‘संयमरूप यज्ञ’ है । व्यवहारकाल में इन्द्रियों के अपने विषयों में प्रवृत्त होने पर उनमें राग-द्वेष न करना ‘विषयहवनरूप यज्ञ’ है ।
हवन तभी होगा, जब विषय नहीं रहेंगे । कारण कि हवन तभी होता है, जब हव्य पदार्थ नहीं रहता । जब तक हव्य पदार्थ की सत्ता रहती है, तब तक हवन नहीं होता ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 4 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१८)


दैवमेवापरे यज्ञं योगिन: पर्युपासते ।
ब्रह्राग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहृति ॥२५ ॥

अन्य योगी लोग दैव (भगवदर्पणरूप) यज्ञ का ही अनुष्ठान करते है और दूसरे योगी लोग ब्रह्म रूप अग्नि में (विचाररूप) यज्ञ के द्वारा ही (जीवात्मारूप) यज्ञ का हवन करते हैं। व्याख्या- सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थो। को अपना और अपने लिये न मान कर केवल भगवान का और भगवान के लिये ही मानना ‘भगवदर्पणरूप यज्ञ’ है। परमात्मा की सत्ता में अपनी सत्ता मिला देना अर्थात ‘मैं’- पन को मिटा देना ‘अभिन्नतारूप यज्ञ’ है।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१७)


ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ २४॥

जिस यज्ञमें अर्पण अर्थात् जिससे अर्पण किया जाय, वे स्रुक् आदि पात्र भी ब्रह्म है, हव्य पदार्थ (तिल, जौ, घी आदि) भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है, (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य (फल भी) ब्रह्म ही है।

व्याख्या—

अब भगवान अपनी प्राप्तिके लिये भिन्न-भिन्न साधनोंक ‘यज्ञ’ रूपसे वर्णन आरम्भ करते हैं । संसारकी सत्ता विद्यमान है ही नहीं (गीता २ । १६) । एक ब्रह्मके सिवाय कुछ नहीं है । संसारमें जो कर्ता, करण, कर्म और पदार्थ दिखायी देते हैं, वे सब ब्रह्मरूप ही हैं- ऐसा अनुभव करना ‘ब्रह्मयज्ञ’ है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१६)


गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस:।
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते॥ २३॥

जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं।

व्याख्या—

निष्कामभाव पूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना ‘यज्ञार्थ कर्म’ है । यज्ञार्थ कर्म करनेवाले कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं और उसे अपने स्वतःस्वाभाविक असंग स्वरूपका अनुभव हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१५)


यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर:।
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥ २२॥

(जो कर्मयोगी फलकी इच्छाके बिना) अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे रहित तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 31 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१४)


निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह:।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥ २१॥

जिसका शरीर और अन्त:करण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा इच्छारहित (कर्मयोगी) केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता।

व्याख्या—

केवल शरीर-निर्वाहके लिये जो कर्म किये जाँय, उनसे यदि कोई पाप बन भी जाय तो वह लगता नहीं । परन्तु जो मनुष्य भोग और संग्रहके लिये कर्म करता है, वह पापसे बच नहीं सकता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१३)


त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रय:।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति स:॥ २०॥

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके (संसारके) आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

व्याख्या—

जिसके भीतर कर्तृत्वाभिमान और फलासक्ति है, वह कर्म न करने पर भी बँधा हुआ है । परन्तु जिसके भीतर कर्तृत्वाभिमान और फलासक्ति नहीं है, वह कर्म करते हुए भी मुक्त है ।
ॐ तत्सत् !

Friday, 27 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१२)


यस्य सर्वे समारम्भा: कामसङ्कल्पवर्जिता:।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:॥ १९॥

जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं।

व्याख्या—

जो कर्मयोगी कर्म करते हुए निर्लिप्त (संकल्प और कामनासे रहित) रहता है और निर्लिप्त रहते हुए सब कर्म करता है, वह सम्पूर्ण ज्ञानियोंमें श्रेष्ट है ।

ॐ तत्सत् !