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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२ )


॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: ॥१३॥

मैं ही पृथ्वी में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ और (मैं ही) रसस्वरूप चन्द्रमा होकर समस्त ओषधियों (वनस्पतियों)-को पुष्ट करता हूँ।

व्याख्या-
पृथ्वी, चन्द्रमा आदि सब भगवान की अपरा प्रकृति है। अतः इसके उत्पादक, धारक, पालक, संरक्षक, प्रकाशक आदि सब कुछ भगवान ही हैं। भगवान की शक्ति होने से अपरा प्रकृति भगवान से अभिन्न है।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 11 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।१२।।

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

व्याख्या—

जब रजोगुण बढ़ता है तब लोभ, प्रवृत्ति आदि वृत्तियाँ बढ़ती हैं । अतः ऐसे समय साधक को यह विचार करना चाहिये कि जब अनन्त ब्रह्माण्डों में लेशमात्र भी कोई वस्तु अपनी नहीं है, सब वस्तुएँ मिलने-बिछुड़नेवाली हैं, फिर अपने लिये क्या करना चाहिये ? ऐसा विचार करके रजोगुणमयी वृत्तियों को मिटा दे, उनसे उदासीन हो जाय ।
रजोगुण असंगतक विरोधी है-‘रजो रागात्मकं विद्धि’ (गीत १४ । ७) । मनुष्य क्रिया और पदार्थसे असंग होनेपर ही योगारूढ़ होता है (गीता ६ । ४) । परन्तु क्रिया और पदार्थक संग करनेके कारण रजोगुण मनुष्यको योगारूढ़ नहीं होने देता ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१७।।

वह परमात्मा सम्पूर्ण ज्योतियों का भी ज्योति और अज्ञान से अत्यन्त परे कहा गया है । वह ज्ञानस्वरूप, जाननेयोग्य, ज्ञान (साधनसमुदाय) से प्राप्त करने योग्य और सबके हृदय में विराजमान है ।

व्याख्या—

बारहवें से सत्रहवें श्लोक तक जिस ज्ञेय-तत्त्व का वर्णन हुआ है, वह भगवान्‌ का समग्ररूप ही है । कारण कि इसमें निर्गुण-निराकार (बारहवाँ श्लोक), सगुण-निराकार (तेरहवाँ श्लोक) और सगुण-साकार (सोलहवाँ श्लोक)-तीनों ही रूपोंका वर्णन हुआ है ।

‘ज्योति’ नाम प्रकाश (ज्ञान)-का है । शब्दका प्रकाशक कान है । स्पर्शका प्रकाशक त्वचा है । रूपका प्रकाशक नेत्र है । रसका प्रकाशक जिह्वा है । गन्धका प्रकाशक नासिका है । इन पाँचों इन्द्रियोंका प्रकाशक मन है । मनका प्रकाशक बुद्धि है । बुद्धिका प्रकाशक स्वयं है । स्वयंका प्रकाशक परमात्मा है । स्वयंप्रकाश परमात्माका कोई भी प्रकाशक नहीं है । जैसे सूर्यमें अन्धकार कभी आता नहीं, ऐसे ही परम-प्रकाशक परमात्मामें अज्ञान कभी आता ही नहीं, आ सकता ही नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।१७।।

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभ अशुभ कर्मों में रागद्वेष का त्यागी है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

व्याख्या—

हर्ष और शोक, राग और द्वेष- ये द्वन्द्व हैं । भक्त में कोई भी द्वन्द्व नहीं रहता, वह निर्द्वन्द्व हो जाता है । उसके सम्पूर्ण कर्म राग-द्वेष से रहित होते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।।१८।।

आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं, आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं, आप ही सनातनधर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं -- ऐसा मैं मानता हूँ।

व्याख्या—

यहाँ ‘त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्‌’ पदोंसे निर्गुण-निराकार का, ‘त्वमस्य विश्‍वस्य परं निधानम्‌’ पदों से सगुण-निराकार का और ‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ पदों से सगुण-साकारका वर्णन हुआ है । ये सब मिलकर भगवान्‌का समग्ररूप है, जिसे जान लेने पर फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता (गीता ७ । २) ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


स्वयमेवात्मनाऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।।१५।। वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।।१६।।

हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपनेआप से अपने आपको जानते हैं। जिन विभूतियों से आप इन सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं, उन सभी अपनी दिव्य विभूतियों का सम्पूर्णता से वर्णन करने में आप ही समर्थ हैं।

व्याख्या—

आप स्वयं ही स्वयंके ज्ञाता हैं-ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जाननेवाले भी आप हैं, जाननेमें आनेवाले भी आप ही हैं अर्थात्‌ सब कुछ आप ही हैं । जब आपके सिवाय और कोई है ही नहीं तो फिर कौन किसको जाने ? और क्या जाने ?
अर्जुन भगवान्‌से कहते हैं कि आप स्वयं ही अपने-आपको जानते हैं, इसलिये अपनी सम्पूर्ण विभूतियोंका वर्णन आप ही कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं । अतः आप अपनी विलक्षण विभूतियोंको विस्तारपूर्वक सम्पूर्णतासे कहिये, जिससे मेरी आपमें अविचल भक्ति हो जाय ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥ १५॥

दूसरे साधक ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे (अभेदभावसे) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे भी कई साधक (अपनेको) पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट्-रूप की अर्थात् संसारको मेरा विराट्-रूप मानकर सेव्य-सेवक भावसे मेरी अनेक प्रकारसे उपासना करते हैं।

व्याख्या—

साधकोंकी रुचि, योग्यता और श्रद्धा-विश्वास अलग-अलग होनेके कारण उनके साधन भी अलग-अलग होते हैं । अलग-अलग साधनोंसे वे जिसकी भी उपासना करते हैं, वह भगवान्‌के समग्ररूपकी ही उपासना होती है । आगे सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक इसी समग्ररूपका वर्णन हुआ है ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी- आठवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)


अव्यक्ताद्-व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥ १८॥
भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥ १९॥

ब्रह्मा के दिन के आरम्भकाल में अव्यक्त (ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर)-से सम्पूर्ण शरीर पैदा होते हैं और ब्रह्मा की रात के आरम्भकाल में उस अव्यक्त नाम वाले (ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर)-में ही सम्पूर्ण शरीर लीन हो जाते हैं।
हे पार्थ ! वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति के परवश हुआ ब्रह्मा के दिन के समय उत्पन्न होता है और ब्रह्माकी रात्रिके समय लीन होता है।

व्याख्या—
बदलनेवाले शरीर-संसार का विभाग अलग है और न बदलनेवाले आत्मा-परमात्मा का विभाग अलग है । शरीर-संसार तो बार-बार उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं, पर आत्मा-परमात्मा वे-के-वे ही रहते हैं । कितने ही प्रलय-महाप्रलय और सर्ग-महासर्ग क्यों न हो जाँय, जीवात्मा स्वयं वही-का-वही रहता है । इसलिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति आदि के अभाव का अनुभव तो सब को होता है, पर स्वयं के अभाव का अनुभव कभी किसी को नहीं होता । परन्तु शरीर को मैं, मेरा तथा मेरे लिये मान लेने के कारण शरीर के परिवर्तन को जीवात्मा अपना परिवर्तन मान लेता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है ।
जैसे रेलगाड़ी पर चढ़ने से मनुष्य रेलगाड़ी के परवश हो जाता है, जहाँ रेलगाड़ी जायगी, वहाँ उसे जाना ही पड़ता है, ऐसे ही शरीर के साथ सम्बन्ध जोड़ने से मनुष्य प्रकृति के परवश हो जाता है और उसे जन्म-मरण के चक्र में जाना ही पड़ता है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:॥ १५॥

परन्तु माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा गया है, वे आसुर भाव का आश्रय लेने वाले और मनुष्यों में महान् नीच तथा पाप-कर्म करने वाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते।

व्याख्या—

यद्यपि भगवान्‌ ने सभी को अपनी शरणमें ले रखा है; परन्तु भोग तथा संग्रह की आसक्ति में रचे-पचे मनुष्य भगवान्‌ की शरण न लेकर संसार की शरण लेते हैं और परिणाम में दुःख पाते हैं |

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 March 2017

गीता प्रबोधनी- छठा अध्याय (पोस्ट.१२)

\समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर:।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥ १३॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित:।
मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर:॥ १४॥

काया, सिर और गलेको सीधे अचल धारण करके तथा दिशाओंको न देखकर केवल अपनी नासिकाके अग्रभागको देखते हुए स्थिर होकर बैठे।
जिसका अन्त:करण शान्त है, जो भयरहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है, ऐसा सावधान ध्यानयोगी मनका संयम करके मुझमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे।

व्याख्या—

जिसका अन्तःकरण राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से रहित है, जो शरीर में मैं-मेरापन न होने से भयरहित है और जो ब्रह्मचारी के नियमों का पालन करता है, वही ध्यानयोग का अधिकारी है । ध्यानयोगी सावधानी पूर्वक मन को संसार से हटाकर भगवान्‌ में लगाये । वह भगवान्‌ के ही परायण हो अर्थात्‌ भगवत्प्राप्ति के सिवाय उसका अन्य कोई उद्देश्य नहीं हो ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 4 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१२)

सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥ १३॥

जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले (शरीररूपी) पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका (विवेकपूर्वक) मनसे त्याग करके नि:सन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है।

प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़नेसे जीव प्रकृतिजन्य गुणोंके अधीन हो जाता है-‘अवशः’ (गीता ३ । ५) और प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता बन जाता है । परन्तु जब जीव प्रकृतिके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटा देता है, तब वह स्वाधीन हो जाता है-‘वशी’ । स्वाधीन होनेपर वह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं बनता । प्रकृतिमें क्रियता और स्वरूपमें अक्रियता स्वतःसिद्ध है । चेतन तत्त्व (स्वरूप) न तो कर्म करता है और न कर्म करनेकी प्रेरणा ही करता है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 27 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१२)


यस्य सर्वे समारम्भा: कामसङ्कल्पवर्जिता:।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:॥ १९॥

जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं, उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं।

व्याख्या—

जो कर्मयोगी कर्म करते हुए निर्लिप्त (संकल्प और कामनासे रहित) रहता है और निर्लिप्त रहते हुए सब कर्म करता है, वह सम्पूर्ण ज्ञानियोंमें श्रेष्ट है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 27 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१२)

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ १७॥
परन्तु जो मनुष्य अपने-आप में ही रमण करनेवाला और अपने-आप में ही तृप्त तथा अपने-आप में ही सन्तुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।
व्याख्या—
जबतक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति नहीं हो जाती, तभी तक मनुष्यपर कर्तव्य-पालनकी जिम्मेदारी रहती है । परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर महापुरुष के लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता । उसके संसारमें रहनेमात्रसे संसारका हित होता है ।
ॐ तत्सत् !

Wednesday, 26 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.१२)

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥ १९॥

जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है।

व्याख्या—

शरीरीमें कर्तापन नहीं है और मृत्युरूप विकार भी नहीं है । कर्तापन आदि सभी विकार प्रकृतिसे मानेहुए सम्बन्ध (मैं-पन)- में ही हैं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 14 October 2016

गीता प्रबोधनी - पहला अध्याय (पोस्ट.१२)


अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर:॥ ४१॥
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया:॥ ४२॥
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै:।
उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता:॥ ४३॥ 
हे कृष्ण ! अधर्म के अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाते हैं। वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरकमें ले जानेवाला ही होता है। श्राद्ध और तर्पण न मिलनेसे इन कुलघातियों के पितर भी (अपने स्थानसे) गिर जाते हैं। इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषों से कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जातिधर्म नष्ट हो जाते हैं। 
ॐ तत्सत् !