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Saturday, 10 December 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४७)

एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥ ७२॥

हे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।
व्याख्या—
अहंतारहित होनेपर मनुष्य ब्राह्मी स्थितिको प्राप्त हो जाता है । उसकी अपनी कोई स्वतन्त्र स्थिति नहीं रहती । इस ब्राह्मी स्थितिकी प्राप्ति एक बार और सदाके लिये होती है । कारणकि ब्रह्ममें हमारी स्वतः-स्वाभाविक स्थिति है, पर अहंताके कारण इसका अनुभव नहीं होता । ‘मैं हूँ’ मिट जाय और ‘है’ रह जाय- यही ब्राह्मी स्थिति है । ‘है’ (सत्तामात्र) हमारा स्वरूप है । अतः ‘मैं’-पनको मिटाना नहीं है, प्रत्युत उसे अपनेमें स्वीकार नहीं करना है । जिसकी सत्ता विद्यमान ही नहीं है, उसे मिटानेका प्रयत्न करना उल्टे उसे सत्ता देना है ।
यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु मिलने और बिछुड़नेवाली तथ उत्पन्न और नष्ट होनेवाली होती है, वह हमारी तथा हमारे लिये नहीं हो सकती । शरीर तो मिलने-बिछुड़नेवाल तथा उत्पन्न-नष्ट होनेवाल है, पर स्वयं मिलने-बिछुड़नेवाला तथा उत्पन्न-नष्ट होनेवाला नहीं है । अतः साधक दृढतापूर्वक इस सत्यको स्वीकार कर ले कि मैं (स्वयं) त्रिकालमें भी शरीर नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं है तथा मेरे लिये भी नहीं है ।
‘निर्वाण’ शब्दके तो अर्थ होते हैं- लुप्त (खोया हुआ) और विश्राम (शान्त) । अतः खोये हुए ब्रह्मको पा लेना अथवा परम विश्रामको प्राप्त कर लेना ही निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति है । ‘निर्वाण’ शब्दका एक अर्थ शून्य भी होता है । शून्यका तात्पर्य है- जो न सत्‌ हो, न असत्‌ हो, न सदसत्‌हो और न सदसत्‌से भिन्न हो अर्थात्‌ जो अनिवर्चनीय तत्त्व हो- ‘अतस्तत्त्वं सदसदुभयानुभयात्मक चतुष्कोटि विनिर्मुक्तं शून्यमेव’ (सर्वदर्शनसंग्रह) ।
क्रियामात्रका सम्बन्ध संसारके साथ है । हमारा स्वरूप अक्रिय है । इसलिये शरीरके द्वारा हम अपने (स्वरूपके) लिये कुछ नहीं कर सकते । शरीरके द्वारा हम कोई भी क्रिया करेंगे तो वह संसारके ही होगी, अपने लिये नहीं ।
पूर्वपक्ष- तो फिर हम अपने लिये क्या कर सकते हैं ?
उत्तरपक्ष- हम अपने लिये अपने द्वारा निष्काम, निःस्पृह, निर्मम और निरहंकार हो सकते हैं । क्यों हो सकते हैं ? क्योंकि हम वास्तवमें स्वरूपसे निष्काम, निर्मम और निरहंकार हैं ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम
द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥

Friday, 9 December 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४६)

विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह:।
निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति॥ ७१॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंतारहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।

व्याख्या—

जब मनुष्य कामना, स्पृहा, ममता और अहंतासे छूूट जाता है, तब उसे अपने भीतर नित्य-निरन्तर स्थित रहनेवाली शान्तिका अनुभव होता हो जाता है । मूलमें अहंता ही मुख्य है । सबका त्याग करनेपर भी अहंता शेष रह जाती है, पर अहंताका त्याग होनेपर सबका त्याग हो जाता है । अहंतासे राग, रागसे आसक्ति, आसक्तिसे ममता और ममतासे कामना तथा कामनासे फिर अनेक प्रकारके विकारोंकी उत्पत्ति होती है । साधकके लिये पहले ममताका त्याग करना सुगम पड़ता है । ममताका त्याग होनेपर कामना, स्पृहा और अहंताका त्याग करनेकी सामर्थ्य आ जाती है । वास्तवमें हम, स्पृहा और अहंतासे रहित हैं । यदि हम इनसे रहित न होते तो कभी इनका त्याग न कर पाते और भगवान्‌ भी इनके त्यागकी बात नहीं कहते । सुषुप्तिमें अहंता आदिके अभावका अनुभव सबको होता है, पर अपने अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता ।

मूलमें कामना, स्पृहा, ममता और अहंताकी सत्ता है ही नहीं- ‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २ । १६) । हमारा स्वरूप चिन्मय सत्ता मात्र है । चिन्मय सत्तामात्रमें कामना, स्पृहा, और अहंता होनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता । ये कामना आदि जड़में ही रहते हैं, चेतनतक पहुँचते ही नहीं । चिन्मय सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है । कामना, स्पृहा आदि निरन्तर नहीं रहते, प्रत्युत बदलते रहते हैं-यह सबका अनुभव है । प्रत्येक जन्ममें कामना, स्पृहा आदि अलग-अलग थे । इस जन्ममें भी बचपनमें कामना, स्पृहा आदि अलग थे, अब अलग हैं । हम इन्हें छोड़ते और पकड़ते रहते हैं । पहले खिलौनोंकी कामना थी फिर रुपयोंकी कामना हो गयी । पहले माँमें ममता थी, फिर पत्नीमें ममता हो गयी । इस प्रकार कामना, स्पृहा, ममता आदिका आना-जाना, उत्पत्ति-विनाश, संयोग-वियोग, आरम्भ-अन्त आदि होता रहता है, पर सत्तामात्र स्वरूपका आना-जान आदि होता ही नहीं । जो वस्तु है ही नहीं, उसे हमने पकड़ लिय अर्थात्‌ उसे सत्ता और महत्त दे दी- यही हमारी सबसे बड़ी भूल है । इस भूलको मिटानेकी जिम्मेदारी हमपर ही है, तभी भगवान्‌ इनका त्याग करनेकी बात कहते हैं, अन्य्था जो है ही नहीं, उसका त्याग स्वतःसिद्ध है । जो स्वतः-सिद्ध है, उसे ही प्राप्त करना है । नया निर्माण कुछ नहीं करना है । नया निर्माण ही हमारे बन्धनका, दुःखोंका कारण बनता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४५)

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं- समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७०॥

जैसे (सम्पूर्ण नदियोंका) जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है,
पर (समुद्र अपनी मर्यादामें) अचल स्थित रहता है,
 ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्यको (विकार उत्पन्न किये बिना ही) प्राप्त होते हैं,
वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं।

ॐ तत्सत् ! 

Thursday, 8 December 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४४)


या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:॥ ६९॥

सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मा से विमुखता) है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (भोग और संग्रह में लगे रहते हैं),वह तत्त्वको जानने वाले मुनि की दृष्टि में रात है।

व्याख्या—

अब भगवान्‌ सांख्ययोगकी दृष्टिसे कहते हैं; क्योंकि परिणाममें कर्मयोग तथा सांख्ययोग एक ही हैं (गीता ५ । ४-५) । लोग जिस परमात्माकी तरफ से सोये हुए हैं, वह तत्त्वज्ञ महापुरुष और सच्चे साधकोंकी दृष्टिमें दिन के प्रकाश के समान है । सांसारिक लोगों का तो पारमार्थिक साधक के साथ विरोध होता है, पर पारमार्थिक साधक का सांसारिक लोगों के साथ विरोध नहीं होता- ‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥’ (मानस, उत्तर० ११२ ख) । सांसारिक लोगों ने तो केवल संसार को ही देखा है, पर पारमार्थिक साधक संसार को भी जानता है और परमात्मा को भी । संसार में रचे-पचे लोग सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति में ही अपनी उन्नति मानते हैं; परन्तु तत्त्वज्ञ महापुरुष और सच्चे साधकों की दृष्टिमें वह रातके अन्धकार की तरह है, उसका किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं है ।

ॐ तत्सत् !

Monday, 5 December 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४३)


नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम्॥ ६६॥
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥ ६७॥
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश:।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ६८॥

जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और (व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे) उस अयुक्त मनुष्यमें निष्कामभाव अथवा कर्तव्यपरायणताका भाव नहीं होता। निष्कामभाव न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?
कारण कि (अपने-अपने विषयों में) विचरती हुई इन्द्रियों में से (एक ही इन्द्रिय) जिस मन को अपना अनुगामी बना लेती है, वह (अकेला मन) जल में नौका को वायु की तरह इसकी बुद्धि को हर लेता है।
इसलिये हे महाबाहो! जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा वशमें की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

व्याख्या—

कर्मयोगमें निष्कामभावकी मुख्यता है । निष्कामभावके लिये मन और इन्द्रियोंका संयम तथा एक निश्चेयवाली बुद्धिका होना आवश्यक है । अशान्तिका मूल कारण कामना है । जबतक मनुष्यके भीतर किसी प्रकारकी कामना है, तबतक उसे शान्ति नहीं मिल सकती । कामनायुक्त चित्त सदा अशान्त ही रहता है ।

जब तक साधक की बुद्धि एक उद्देश्य में दृढ़ नहीं होती, तबतक सम्पूर्ण इन्द्रियोंका तो कहना ही क्या है, एक ही इन्द्रिय मन को हर लेती है और मन बुद्धि को हरकर उसे भोगों में लगा देता है ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 3 December 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४२)

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैॢवधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥ ६४॥
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते॥ ६५॥

परन्तु वशीभूत अन्त:करणवाला (कर्मयोगी साधक) राग-द्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ (अन्त:करणकी) निर्मलताको प्राप्त हो जाता है। (अन्त:करणकी) निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दु:खोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि नि:सन्देह बहुत जल्दी (परमात्मामें) स्थिर हो जाती है।

व्याख्या—

यदि विषयोंमें रागबुद्धि न हो तो शास्त्रविहित भोगोंका सेवन करते हुए भी पतन नहीं होता, प्रत्युत उत्थान ही होता है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 2 December 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४१)

ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ ६२॥
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ ६३॥

विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे (बाधा लगनेपर) क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धि (विवेक)-का नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

व्याख्या—

विषयभोगों को भोगना तो दूर रहा, उनका रागपूर्वक चिन्तन करनेमात्र से साधक पतन की ओर चला जाता है; कारण कि भोगों का चिन्तन भी भोग भोगने से कम नहीं है ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 27 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.४०)

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ६१॥

कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण होकर बैठे;क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

व्याख्या—

साधनकी पूर्णताके लिये भगवान्‌की परायणता आवश्यक है । भगवान्‌के परायण होनेसे इन्द्रियाँ सुगमतापूर्वक वशमें हो जाती हैं । अपने पुरुषार्थसे इन्द्रियोंको सर्वथा वशमें करना कठिन है । इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें होनेसे ही बुद्धि स्थिर होती है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३९)


विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥ ५९॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित:।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन:॥ ६०॥

निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्य-के भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका रस भी निवृत्त हो जाता है अर्थात् उसकी संसारमें रसबुद्धि नहीं रहती।
कारण कि हे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

व्याख्या—

भोगोंके प्रति सूक्ष्म आसक्तिका नाम ‘रस’ है । यह रस साधककी अहंतामें रहता है । जबतक यह रस रहता है, तबतक परमात्माका अलौकिक रस (प्रेम) प्रकट नहीं होता । इस रसबुद्धिके कारणही भोगोंकी पराधीनता रहती है । साधकके द्वारा भोगोंका त्याग करनेपर भी रसबुद्धि बनी रहती है, जिसके कारण भोगोंके त्यागका बड़ा महत्त्व दीखता है और अभिमान भी होता है कि मैंने भोगोंका त्याग कर दिया है ।
यद्यपि यह रस तत्त्वप्राप्तिके पहले भी नष्ट हो सकता है, तथापि तत्त्वप्राप्तिके बाद यह सर्वथा नष्ट हो ही जाता है ।
बुद्धिमान्‌ साधकको अपनी इन्द्रियोंपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये । कारण कि जबतक अहंतामें रसबुद्धि पड़ी है, तबतक साधकका पतन होनेकी सम्भावना रहती है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 25 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३८)

दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ ५६॥
य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ५७॥
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश:।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ५८॥

दु:खोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

सब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य उस-उस शुभ-अशुभको प्राप्त करके न तो प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।

जिस तरह कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह (कर्मयोगी) इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।

व्याख्या—

स्वयं नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है और शरीर नित्य-निरन्तर बदलता रहता है; अतः दोनोंके स्वभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ता । परन्तु जब स्वयं शरीरके साथ मैं-मेरेका सम्बन्ध मान लेता है तब बुद्धिमें (शरीर-संसारका असर पड़नेसे) अन्तर पड़ने लगता है । मैं-मेरापन मिटनेसे बुद्धिमें जो अन्तर पड़ता था, वह मिट जाता है और बुद्धि स्थिर हॊ जाती है । बुद्धि स्थिर होनेसे स्वयं अपने-आपमें ही स्थिर हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 24 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३७)

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥ ५४॥

श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ ५५॥

अर्जुन बोले—

हे केशव ! परमात्मा में स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है अर्थात् व्यवहार करता है?

श्रीभगवान् बोले—

हे पृथानन्दन! जिस कालमें साधक मनमें आयी सम्पूर्ण कामनाओंका भलीभाँति त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

व्याख्या—

मनकी स्थिरताकी अपेक्षा बुद्धिकी स्थिरता श्रेष्ट है; क्योंकि मनकी स्थिरतासे तो लौकिक सिद्धियां प्रकट होती हैं, पर बुद्धिकी स्थिरतासे कल्याण हो जाता है । मनकी स्थिरता है- वृत्तियोंका निरोध और बुद्धिकी स्थिरता है-उद्देश्यकी दृढता ।
त्याग उसीका होता है जो वास्तवमें सदासे ही त्यक्त है । कामना स्वयंगत न होकर मनोगत है । परन्तु मनके साथ तादात्म्य होनेके कारण कामना स्वयंमें दीखने लगती है । जब साधकको स्वयंमें सम्पूर्ण कामनाओंके अभावका अनुभव हो जाता है, तब उसकी बुद्धि स्वतः स्थिर हो जाती है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 23 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३६)


श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ ५३॥

जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मा में अचल हो जायगी, उस काल में तू योगको प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या—

पूर्वश्लोकमें सांसारिक मोहके त्यागकी बात कहकर भगवान्‌ प्रस्तुत श्लोकमें शास्त्रीय मोह अर्थात्‌ सीखे हुए (अनुभवहीन) ज्ञानके त्यागकी बात कहते हैं । ये दोनों ही प्रकारके मोह साधकके लिये बाधक हैं । शास्त्रीय मोहके कारण साधक द्वैत, अद्वैत, आदि मतभेदोमें उलझकर खण्ड न-मण्डनमें लग जाता है । केवल अपने कल्याणका ही दृढ़ उद्देश्य होने पर साधक सुगमतापूर्वक इस (दोनों प्रकारके) मोहसे तर जाता है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 22 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३५)

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ ५२॥

जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको भलीभाँति तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या—

मिलने और बिछुड़नेवाले पदार्थों और व्याक्तियोंको अपना तथा अपने लिये मानना मोह है । इस मोहरूपी दलदलसे निकलनेपर साधकको संसारसे वैराग्य हो जाता है । संसारसे वैराग्य होने पर अर्थात्‌ रागका नाश होनेपर योग की प्राप्ति हो जाती है ।

ॐ तत्सत् !

Monday, 21 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३४)

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्॥ ५०॥
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण:।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम्॥ ५१॥

बुद्धि (समता)-से युक्त मनुष्य यहाँ (जीवित अवस्थामें ही) पुण्य और पाप—दोनोंका त्याग कर देता है। अत: तू योग (समता)-में लग जा; क्योंकि कर्मोंमें योग ही कुशलता है।
कारण कि समतायुक्त बुद्धिमान् साधक कर्मजन्य फलका अर्थात् संसारमात्र का त्याग करके जन्मरूप बन्धनसे मुक्त होकर निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं।

व्याख्या—

समता में स्थित मनुष्य जल में कमल की भाँति संसार में रहते हुए भी पाप-पुण्य दोनों से नहीं बँधता अर्थात्‌ मुक्त हो जाता है । यही जीवन्मुक्ति है ।
पूर्वश्लोक में आया है कि योग की अपेक्षा कर्म दूरसे ही निकृष्ट हैं, इसलिये मनुष्य को समता में स्थित होकर कर्म करने चाहिये अर्थात्‌ कर्मयोग का आचरण करना चाहिये । महत्त्व योग (समता)- का है, कर्मों का नहीं । कल्याण करने की शक्ति योग (कर्मयोग)- में है, कर्मों में नहीं ।
[ बुद्धि, योग और बुद्धियोग-ये तीनों ही शब्द गीतामें ‘कर्मयोग’ के लिये आये हैं । ]
समता में स्थित होकर कर्म करनेवाले अर्थात्‌ कर्मयोगी साधक जन्म-मरण से रहित होकर परमात्मतत्त्व को प्राप्त हो जाते हैं । अतः कर्मयोग मुक्ति का स्वतन्त्र साधन है ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 19 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३३)


दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव:॥ ४९॥

बुद्धियोग (समता)-की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे (अत्यन्त) ही निकृष्ट हैं। अत: हे धनंजय ! तू बुद्धि (समता)-का आश्रय ले; क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं ।

व्याख्या—

योगकी अपेक्षा कर्म दूरसे ही निकृष्ट हैं, उनकी परस्पर तुलना नहीं हो सकती । योग नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला (अविनाशी) है और कर्म आदि-अन्तवाला (नाशवान्‌) है, फिर उनकी तुलना हो ही कैसे सकती है ? इसलिये कर्मोंका आश्रय न लेकर योगका ही आश्रय लेना चाहिये । योगकी प्राप्ति कर्मॊंके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत कर्म तथा कर्मफलके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर होती है । कर्मोंका आश्रय जन्म-मरण देनेवाला और योगका आश्रय मुक्त करनेवाला है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३२)


योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ ४८॥

हे धनंजय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

व्याख्या—

एक वस्तु या व्यक्तिमें राग होगा तो दूसरी वस्तु या व्यक्तिमें द्वेष होना स्वाभाविक है । राग-द्वेषके न रहते हुए कर्मकी सिद्धि-असिद्धिमें समताका आना असम्भव है । राग-द्वेषके न रहनेपर जो समता आती है, उस समतामें स्थित रहकर कर्तव्य-कर्मोंको करना चाहिये । समता को ही ‘योग’ कहा जाता है । कर्म तो करणसापेक्ष होते हैं, पर योग करणनिरपेक्ष है । इस समतारूपी योगमें स्थित साधक कभी विचलित (योगभ्रष्ट) नहीं होता ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 18 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३१)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ ४७॥

कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अत: तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो।

व्याख्या—

एक कर्म-विभाग (करना) है और एक फल-विभाग (होना) है । ‘करना’ मनुष्यके अधीन है और ‘होना’ प्रारब्ध अथवा परमात्माके अधीन है । प्रारब्धसे अथवा परमात्माके विधानसे मनुष्यको जो कुछ मिला है, उसे अपने भोगमें न लगाकर दूसरोंकी सेवामें लगाना मनुष्यका कर्तव्य है ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 17 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.३०)

यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत:॥ ४६॥

सब तरफसे परिपूर्ण महान् जलाशयके प्राप्त होनेपर छोटे गड्ढोंमें भरे जलमें मनुष्यका जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, (वेदों और शास्त्रोंको) तत्त्वसे जाननेवाले ब्रह्मज्ञानीका सम्पूर्ण वेदोंमें उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।

व्याख्या—

इस श्लोकमें ऐसे महापुरुषका वर्णन हुआ है, जिसे परमविश्रामकी प्राप्ति हो गयी है । परमविश्रामकी प्राप्ति होनेपर फिर किसी क्रिया तथा पदार्थकी आवश्यकता नहीं रहती । वह पूर्णताको प्राप्त हो जाता है । ऐसे महापुरुषको ‘ब्राह्मण’ कहनेका तात्पर्य है कि जिसने पूर्णताको प्राप्त कर लिया है, वही वास्तविक ‘ब्राह्मण’ है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 16 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.२९)


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥ ४५॥

वेद तीनों गुणोंके कार्यका ही वर्णन करनेवाले हैं; हे अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा, राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जा, निरन्तर नित्यवस्तु परमात्मामें स्थित हो जा, योगक्षेमकी चाहना भी मत रख और परमात्मपरायण हो जा।

व्याख्या—

भगवान्‌ अर्जुनको आज्ञा देते हैं कि वेदोंके जिस अंशमें सकामभावका वर्णन है, उसका त्याग करके तू निष्कामभावको ग्रहण कर । मिलने और बिछुड़नेवाले संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके तू नित्यरहनेवाली चिन्मय सत्तामें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव कर । योग (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा)- की कामनाका भी त्याग कर दे; क्योंकि कामनामात्र बन्धनकारक है ।

पहले बयालीसवें श्लोकमें भगवान्‌ने बताया कि जो मनुष्य ‘वेदवादरताः’ (वेदोक्त सकाम कर्मोंमें रुचि रखनेवाले) होते हैं, उनकी बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं होती, कारणकि व्यवसायात्मिका बुद्धिके लिये निष्काम होना आवश्यक है । वेद तीनों गुणोंके कार्यका वर्णन करनेवाले हैं, इसलिये भगवान्‌ अर्जुन्‌को तीनोंके गुणोंसे रहित होनेकी आज्ञा देते हैं- ‘निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन’ ।

वेदोक्त सकाम अनुष्ठानोंको करनेवाले मनुष्योंको योगक्षेमकी प्राप्ति नहीं होती और वे संसार-चक्रमें पड़े रहते हैं- ‘एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९ । २१) । संसार-चक्रमें पड़नेका कारण वेद नहीं हैं, प्रत्युत कामना है ।

भगवत्परायण साधक को भोग व संग्रह की कामना तो दूर रही, योगक्षेम की भी कामना नहीं करनी चाहिये । इसलिये भगवान्‌ अर्जुनसे कहते हैं कि तू मेरे परायण होकर योगक्षेम की भी कामना का त्याग कर दे अर्थात्‌ सांसारिक अथवा पारमार्थिक कोई भी कामना न रखकर सर्वथा निष्काम हो जा ।

भगवान्‌ के समान दयालु कोई नहीं है । वे कहते हैं कि भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ-‘योगक्षेमं वहाम्यहम्‌’ (गीता ९ । २२) मैं उनके साधन की सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओं को भी दूर कर देता हूँ--‘मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि’ (१८ । ५८) और उनका उद्धार भी कर देता हूँ- तेषामहं समुद्धर्ता०’ (१२ । ७) अतः भगवान्‌ के भजन में लगे हुए साधक को अपने साधन तथा उद्धार के विषय में कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 15 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.२८)

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित:।
वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन:॥ ४२॥
कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥ ४३॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते॥ ४४॥

हे पृथानन्दन ! जो कामनाओं में तन्मय हो रहे हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों में प्रीति रखनेवाले हैं, (भोगोंके सिवाय) और कुछ है ही नहीं—ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुत-सी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है।
उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्त:करण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है, और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती।

व्याख्या—

भोग और ऐश्वर्य (संग्रह)-की आसक्ति कल्याणमें मुख्य बाधक है । सांसारिक भोगोंको भोगने तथा रुपयों आदिका संग्रह करनेवाला मनुष्य अपने कल्याणका निश्चाय भी नहीं कर सकता, फिर कल्याण करना तो दूर रहा ! इसलिये भगवान्‌ निष्कामभाव (योग)- का अन्वय-व्यतिरेक से वर्णन करते हैं ।

ॐ तत्सत् !