Showing posts with label पोस्ट.२६. Show all posts
Showing posts with label पोस्ट.२६. Show all posts

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।३२।।

जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होने से कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देह में लिप्त नहीं होता ।

व्याख्या—

चिन्मय सत्ता एक ही है, पर अहंता के कारण वह अलग-अलग दीखती है । अपरा प्रकृति के अंश ‘अहम्‌’ को पकड़ने के कारण यह जीव ‘अंश’ कहलाता है (गीता १५ । ७) । अगर यह अहम्‌ को न पकड़े तो एक सत्ता-ही-सत्ता है । सत्ता के सिवाय सब कल्पना है । वह चिन्मय सत्ता सब कल्पनाओं का आधार, अधिष्ठान, प्रकाशक और आश्रय है । उस सत्तामें एकदेशीयपना नहीं है । वह चिन्मय सत्ता सर्वव्यापक है । सम्पूर्ण सृष्टि (क्रियाएँ और पदार्थ) उन सत्ताके अन्तर्गत है । सृष्टि तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती है, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है । तात्पर्य है कि चिन्मय सत्ता न शरीरस्थ है और न प्रकृतिस्थ है, प्रत्युत आकाशकी तरह सर्वत्र स्थित (सर्वगत) है-‘नित्यः सर्वगतः’ (गीता २ । २४) । वह सम्पूर्ण शरीरोंके बाहर-भीतर सर्वत्र परिपूर्ण है । वह सर्वव्यापी सत्ता ही हमारा स्वरूप है और वही परमात्मतत्त्व है ।

सत्ता में एकदेशीयता अहम्‌ के कारण दीखती है । वह अहम्‌ सुखलोलुपता पर टिका हुआ है । साधन करते हुए भी साधक जहाँ है, वहीं सुख भोगने लग जाता है-‘सुखसङ्गेन बध्नाति’ (गीता १४ । ६) । यह सुखलोलुपता गुणातीत होने तक रहती है । अतः इसमें साधक को बहुत सावधान रहना चाहिये और सावधानीपूर्वक सुखलोलुपता से बचना चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.२६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।।३८।।

आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसार के परम आश्रय हैं । आप ही सबको जाननेवाले, जाननेयोग्य और परमधाम हैं । हे अनन्तरूप ! आप से ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.२६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।।४०।।

हे परंतप अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है। मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है? यह तो केवल संक्षेपसे कहा है।

व्याख्या—

सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार तथा मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, भूत, प्रेत, पिशाच आदि जो कुछ भी है, वह सब मिलकर भगवान्‌का ही समग्ररूप है अर्थात्‌ सब भगवान्‌की ही विभूतियाँ हैं, उनका ही ऐश्‍वर्य है । तात्पर्य है कि एक भगवान्‌के सिवाय कुछ नहीं है । परिवर्तनशील असत्‌ और अपरिवर्तनशील सत्‌-दोनों ही भगवान्‌की विभूतियाँ हैं-‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९ । १९) । अनः जिसमें हमारा आकर्षण होता है, वह वास्तवमें भगवान्‌का ही आकर्षण है । परन्तु भोगबुद्धिके कारण वह आकर्षण भगवत्प्रेममें परिणत न होकर काम, आसक्ति, मोहमें परिणत हो जत है, जो संसारमें बाँधनेवाला है ।

पूर्वपक्ष-

जब सब कुछ भगवान्‌ ही हैं, तो फिर विभूति-वर्णन का क्या प्रयोजन है ?

उत्तरपक्ष-

अर्जुन का प्रश्न ही यही था कि मैं कहाँ-कहाँ आपका चिन्तन करूँ ? यद्यपि सब कुछ भगवान्‌ ही हैं, तथापि मनुष्यको जिस वस्तु-व्यक्तिमें विशेषता दीखती है, उसे वस्तु-व्यक्तिमें भगवान्‌ को देखना, उनका चिन्तन करना सुगम पड़ता है । कारण कि मन में उसकी विशेषता अंकित हो जाने से मन स्वतः वहाँ जाता है । इसीलिये भगवान्‌ ने अपनी मुख्य-मुख्य विभूतियों का वर्णन किया है । इस कारण साधक का कहीं भी राग-द्वेष न होकर भगवान्‌ की तरफ ही दृष्टि रहनी चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.२६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥ ३३॥

जो पवित्र आचरण करनेवाले ब्राह्मण और ऋषि-स्वरूप क्षत्रिय भगवान्के भक्त हों, (वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ) इसमें तो कहना ही क्या है! इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।

व्याख्या—

तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक भगवान्‌ने भक्तिके तथा भगवत्प्राप्तिके सात अधिकारियोंके नाम लिये हैं- दुराचारी, पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण और क्षत्रीय । इन सातोंसे बाहर कोई भी प्राणी नहीं है । तात्पर्य है कि मनुष्यका कैसा ही जन्म हो, कैसी ही जाति हो और पूर्वजन्मके तथा इस जन्मके कितने ही पाप हों, पर वे सब-के-सब भगवान्‌ और उनकी भक्तिके अधिकारी हैं । कारण कि जीवमात्र भगवान्‌का अंश होनेसे भगवान्‌की तरफ चलनेमें स्वतन्त्र है । भगवान्‍ की ओरसे किसीके लिये भी मनाही नहीं है ।

अनित्य और सुखरहित इस शरीरको पाकर अर्थात्‌ हम जीते रहें और सुख भोगते रहें-ऐसी कामनाको छोड़कर भगवान्‌का भजन करना चाहिये । कारण कि संसारमें सुख है ही नहीं, केवल सुखका भ्रम है । ऐसे ही जीनेका भी भ्रम है । हम जी नहीं रहे हैं, प्रत्युत प्रतिक्षण मर रहे हैं !

ॐ तत्सत् !

Friday, 14 April 2017

गीता प्रबोधनी- छठा अध्याय (पोस्ट.२६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥ ३३॥
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥ ३४॥

अर्जुन बोले—
हे मधुसूदन! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मनकी चंचलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ।
कारण कि हे कृष्ण! मन (बड़ा ही) चंचल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसको रोकना मैं (आकाशमें स्थित) वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 15 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२६)

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥ ३५॥

जिस (तत्त्वज्ञान)-का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा और हे अर्जुन! जिस (तत्त्वज्ञान)-से तू सम्पूर्ण प्राणियोंको नि:शेष भावसे पहले अपनेमें और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखेगा।

व्याख्या—

तत्त्वज्ञान होनेपर फिर मोह नहीं होता; क्योंकि वास्तवमें मोहकी सत्ता है ही नहीं-‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २ । १६) । इसलिये तत्त्वज्ञान एक ही बार होता है और सदाके लिये होता है । जैसे, पृथ्वीपर दिनके बाद रात होती है, रातके बाद दिन होता है; परन्तु सूर्यमें रात आती ही नहीं । वहाँ नित्य-निरन्तर दिनसे भी विलक्षण प्रकाश रहता है । ऐसे ही तत्त्वज्ञानरूप सूर्यमें मोहरूप अन्धकारका प्रवेश कभी हुआ ही नहीं, है ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं । मोहकी सत्ता जीवकी दृष्टिमें है ।

परमात्माके अन्तर्गत जीव है-‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५ । ७) और जीवके अन्तर्गत जगत्‌ है-‘ययेदं धार्यते जगत्‌’ (गीता ७ । ५) । इसलिये साधक पहले जगत्‌को अपनेमें देखता है-‘द्रक्ष्यस्यात्मनि’, फिर अपनेको परमात्मामें देखता है-‘अथो मयि’ । जगत्‌को अपनेमें देखनेसे अहम्‌ की सूक्ष्म सत्ता रहती है । यह सूक्ष्म अहम्‌ जन्म-मरण देने वाला तो नहीं होता, पर दार्शनिक मतभेद करानेवाला होता है । अपनेको परमात्मामें देखनेसे अहम्‌का सर्वथा नाश हो जाता है और एक चिन्मय सत्तामात्रके सिवाय कुछ नहीं रहता ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 13 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२६)


धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥ ३८॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥ ३९॥

जैसे धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जैसे जेर से गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामना के द्वारा यह (ज्ञान अर्थात् विवेक) ढका हुआ है।
हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्नि के समान कभी तृप्त न होने वाले और विवेकियों के कामनारूप नित्य वैरी के द्वारा मनुष्यका विवेक ढका हुआ है।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 13 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.२६)


एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥ ३९॥
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥ ४०॥

हे पार्थ ! यह समबुद्धि तेरे लिये (पहले) सांख्य-योगमें कही गयी और अब तू इसको कर्मयोग के विषय में सुन; जिस समबुद्धि से युक्त हुआ तू कर्म-बन्धन का त्याग कर देगा।

मनुष्यलोक में इस समबुद्धिरूप धर्म के आरम्भ का नाश नहीं होता तथा (इसके अनुष्ठान का) उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।

व्याख्या—

भगवान्‌ ने इकतीसवें से सैंतीसवें श्लोक तक कर्तव्य विज्ञान (धर्मशास्त्र) अर्थात्‌ ‘कर्म’ का वर्णन किया, अब इस उन्तालीसवें श्लोक से तिरपनवें श्लोकतक योग-विज्ञान (मोक्षशास्त्र) अर्थात्‌ ‘कर्मयोग’ का वर्णन करते हैं ।

भगवान्‌ ने चार प्रकार से समताकी महिमा कही है- (१) समतासे मनुष्य कर्म-बन्धनसे छूट जाता है, (२) समताके आरम्भ अर्थात्‌ उद्देश्यका भी कभी नाश नहीं होता, (३) समताके अनुष्ठानमें यदि कोई भूल हो जाय तो उसक उल्टा फल नहीं होता, और (४) समता का थोड़ा-सा भी भाव हो जाय तो वह कल्याण कर देता है । जीवनमें थोड़ी भी समता आ जाय तो उसका नाश नहीं होता । भय कितना ही महान्‌ हो, उसका नाश हो जाता है ।

असत्‌को सत्ता तथा महत्ता देनेसे महान्‌ समता भी स्वल्प हो जाती है और स्वल्प भय भी महान्‌ हो जाता है । यदि हम असत्‌को सत्ता तथा महत्ता न दें तो समता महान्‌ और भय स्वल्प (नष्ट) हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !