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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।१७।।

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नाम से कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर सब का भरणपोषण करता है।

व्याख्या—
पुरुषोत्तमको ‘अन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो लौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम्को ‘अन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो अलौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम दोनोंसे विलक्षण अर्थात्‌ अलौकिक हैं । अतः परमात्मा विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्‍वास्के विषय हैं । परमात्माके होनेमें भक्त, सन्त-महात्मा, वेद और शास्त्र ही प्रमाण हैं । ‘अन्य’ का स्पष्टीकरण भगवान्‌ ने अगले श्लोक में किया है ।
भगवान्‌ मात्र प्राणियों का पालन-पोषण करते हैं । पालन-पोषण करने में भगवान्‌ किसी के साथ कोई पक्षपात (विषमता) नहीं करते । वे भक्त-अभक्त, पापी-पुण्यात्मा, आस्तिक-नास्तिक आदि सब का समानरूप से पालन-पोषण करते हैं । प्रत्यक्ष देखने में भी आता है कि भगवान्‌ द्वारा रचित सृष्टि में सूर्य सब को समानरूप से प्रकाश देता है, पृथ्वी सब को समानरूप से धारण करती है, वायु श्‍वास लेने के लिये सब को समानरूप से प्राप्त होती है, अन्न-जल सबको समानरूप से तृप्त करते हैं, इत्यादि । जब भगवान्‌ के द्वारा रचित सृष्टि भी इतनी निष्पक्ष, उदार है तो फिर भगवान्‌ स्वयं कितने निष्पक्ष, उदार होंगे !
आधुनिक वेदान्तियों ने ईश्‍वर को कल्पित बताकर साधक-जगत्‌ की बड़ी हानि की है ! उन्हें इस बात का भय है कि ईश्‍वर को मानने से अपने अद्वैत सिद्धान्त में कमी आ जायगी ! परन्तु ईश्‍वर किस की कल्पना है--इसका उत्तर उनके पास नहीं है । वास्तव में सत्ता एक ही है । दूसरी सत्ता का तात्पर्य संसार से है, ईश्‍वर से नहीं; क्योंकि संसार ‘पर’ है और ईश्‍वर ‘स्व’ (स्वकीय) है । अपना राग मिटाये बिना दूसरी सत्ता नहीं मिटेगी । राग तो अपना है, पर मान लिया ईश्‍वरको कल्पित ! अतः ईश्‍वरको कल्पित न मानकर अपना राग मिटाना चाहिये । ईश्‍वर कल्पित नहीं है, प्रत्युत अलौकिक है । वह मायारूपी धेनुका बछड़ा नहीं है, प्रत्युत साँड़ है ! उपनिषद्‌में भी आया है-मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तो महेश्‍वरम्‌’ (श्वेताश्वतर० ४ । १०) ‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और मायापति महेश्वरको समझना चाहिये । आजतक जिस ईश्‍वरके असंख्य भक्त हो चुके हैं, वह कल्पित कैसे हो सकता है ?’

ॐ तत्सत् !

Thursday, 11 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सत्त्वातसंजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । 

प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१७॥ 
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: । 
जघन्यगुणवृत्तिस्थाअधो गच्छन्ति तामसा: ॥१८॥

सत्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं। तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं। 
 सत्वगुण में स्थित मनुष्य ऊध्र्वलोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं और निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।

 व्याख्या- ज्ञान (विवेक) सत्वगुण से प्रकट होता है और संग न करने पर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वज्ञान में परिणत हो जाता है। परन्तु रजोगुण-तमोगुण से होने वाले लोभ, प्रमाद, मोह, अज्ञान बढ़ते है। तो कोई नुकसान बाकी नहीं रहता, कोई दुःख बाकी नहीं रहता, कोई मूढ़योनि बाकी नहीं रहती, कोई नरक बाकी नहीं रहता। 

 सात्विक, राजस अथवा तामस मनुष्य की गति तो अन्तिम चिन्तन के अनुसार होगी, पर सुख-दुःख का भोग उनके कर्मों के अनुसार ही होगा। उदाहरणार्थ, किसी के कर्म तो अच्छे हैं, पर अन्तिम चिन्तन पशु का हो गया तो अन्तिम चिन्तन के अनुसार वह पशु बन जायगा, परन्तु उस पशुयोनि में भी उसे कर्मों के अनुसार बहुत सुख-आराम मिलेगा। इसी प्रकार किसी के कर्म तो बुरे हैं, पर अन्तिम चिन्तन के अनुसार वह मनुष्य बन गया तो उस मनुष्य योनि में भी उसे कर्मों के अनुसार दुःख, शोक, रोग आदि मिलेंगे। आधुनिक वेदान्त में आया है कि सत्वगुण से पुण्य तथा रजोगुण से पाप उत्पन्न होता है; किन्तु तमोगुण से आयु वृथा होती है- 
सात्विकैः पुण्यनिष्पत्तिः पापोत्पत्तिश्च राजसैः। 
तामसैर्नोभयं किन्तु वृथायुःक्षपणं भवेत्।। 
परन्तु यह बात गीता से विरुद्ध पड़ती है। भगवान यहाँ कहते हैं कि तमोगुण से मनुष्य को अधोगति की प्राप्ति होती है- ‘अधो गच्छन्ति तामसाः’। पहले भी भगवान ने कहा है- ‘तथा प्रजीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते’। 

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।।२२।।

जो ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, बारह साध्यगण, दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार, उनचास मरुद्गण, सात पितृगण तथा गन्धर्व, यक्ष,असुर और सिद्धों के समुदाय हैं, वे सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।।२१।। 

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।२२।। 


मैं अदिति के पुत्रों में विष्णु (वामन) और प्रकाशमान वस्तुओं में किरणोंवाला सूर्य हूँ। मैं मरुतों का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चन्द्रमा हूँ।
मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, देवताओंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं- क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना- गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१॥

वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं।

व्याख्या—

सकाम अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य्के जब स्वर्गके प्रतिबन्धक पाप नष्ट हो जाते हैं, तब वे स्वर्गमें चले जाते हैं । स्वर्गका सुख भोगते-भोगते जब उनके स्वर्गके प्रापक पुण्य नष्ट हो जाते हैं, तब वे पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं । इस प्रकार कामनाके कारण मनुष्य आवागमनको प्राप्त होता रहता है, संसार-चक्रमें घूमता रहता है ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अग्निर्ज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना:॥ २४॥

जिस मार्ग में प्रकाशस्वरूप अग्नि का अधिपति देवता, दिन का अधिपति देवता,शुक्लपक्ष का अधिपति देवता और छ: महीनोंवाले उत्तरायण का अधिपति देवता है, उस मार्ग से शरीर छोड़कर गये हुए ब्रह्मवेत्ता पुरुष (पहले ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माके साथ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं।

व्याख्या—

पहले साधनावस्था में जिनके भीतर ब्रह्मलोक की वासना अथवा अपने मत का आग्रह रहा है, वे क्रममुक्ति से पहले ब्रह्मलोक में जाते हैं और फिर महाप्रलय आने पर ब्रह्माजी के साथ मुक्त हो जाते हैं ।
क्रममुक्ति में ब्रह्मलोक मार्ग में आनेवाले एक स्टेशन की तरह है, जहाँ भोगों की वासना वाले मनुष्य उतरते हैं । परन्तु जिनमें भोगों की वासना नहीं है, वे वहाँ नहीं उतरते । हमारा कोई प्रयोजन न हो तो मार्ग में स्टेशन आये या जंगल, क्या फर्क पड़ता है !

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥ १९॥

बहुत जन्मों के अन्तिम जन्म में अर्थात् मनुष्य जन्म में सब कुछ परमात्मा ही हैं—इस प्रकार जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा * अत्यन्त दुर्लभ है ।

व्याख्या—

साधक पहले परमात्मा को दूर देखता है, फिर समीप देखता है, फिर अपने में देखता है, और फिर केवल परमात्माको ही देखता है । कर्मयोगी परमात्माको समीप देखता है, ज्ञानयोगी परमात्माको अपनेमें देखता है और भक्तियोगी सब जगह परमात्माको ही देखता है । ‘सब कुछ परमात्म ही हैं’-ऐसा अनुभव करना ही असली शरणागति है अर्थात्‌ केवल शरण्य ही रह जाय, शरणागत कोई रहे ही नहीं !

‘वासुदेवः सर्वम्‌’-यह गीताका सर्वोत्तम सिद्धान्त है । हमारी दृष्टिमें ‘सर्वम्‌’ (संसार)-की सत्ता है, इसलिये भगवान्‌ने हमें समझानेके लिये ‘वासुदेवः सर्वम्‌’ कहा है । वास्तवमें केवल वासुदेव-ही-वासुदेव है, ‘सर्वम्‌’ है ही नहीं ! कारणकि असत्‌ होनेसे ‘सर्वम्‌’ की सत्ता विद्यमान ही नहीं है-‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २ । १६) ।

जैसे, खेत में पहले भी गेहूँ बोया गया था और अन्तमें भी गेहूँ ही निकलेगा, पर बीचमें हरी-हरी घास दीखनेपर भी वह ‘गेहूँकी खेती’ कहलाती है । उसे गाय खा जाय तो किसान कहता है कि गाय हमारा गेहूँ खा गयी, जबकि गायने एक दाना भी नहीं खाया । इसी प्रकार सृष्टिके पहले भी परमात्मा थे और अन्तमें भी परमात्मा ही रहेंगे, पर बीचमें परमात्मा न दीखनेपर भी सब कुछ परमात्मा ही हैं । जैसे गेहूँसे उत्पन्न खेती भी गेहूँ ही है, ऐसे ही परमात्मासे उत्पन्न सृष्टि भी परमात्मा ही हैं । परमात्माने कहींसे सामान मँगवाकर सृष्टि नहीं बनायी, प्रत्युत वे खुद ही सृष्टिरूप बन गये । अतः सृष्टि भगवान्‌का प्रथम अवतार है-‘आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते’ (श्रीमद्भा० ३ । ६ । ८) ।

जैसे जिसके भीतर प्यास होती है, उसे ही जल दीखता है । प्यास न हो तो जल सामने रहते हुए भी दीखता नहीं । ऐसे ही जिसके भीतर परमात्मकी प्यास (लालसा) है, उसे परमात्मा दीखते हैं और जिसके भीतर संसारकी प्यास है, उसे संसार दीखता है । परमात्माकी प्यास हो तो संसार लुप्त हो जाता है और संसारकी प्यास हो तो परमात्मा लुप्त हो जाते हैं ।

तात्पर्य है कि संसार की प्यास होनेसे संसार न होते हुए भी मृगमरीचिकाकी तरह दीखने लग जाता है और परमात्माकी प्यास होनेसे परमात्मा न दीखनेपर भी दीखने लग जाते हैं । परमात्माकी प्यास जाग्रत होने पर भक्तको भूतकालका चिन्तन नहीम होता , भविषकी आशा नहिं रहती और वर्तमानमें उसे प्राप्त किये बिना चैन नहीं पड़ता ।

सब कुछ (समग्ररूपमें) एक भगवान्‌ ही हैं-‘आसुदेवः सर्वम्‌’, सदसच्चाहम्‌’ (गीता ९ । १९) । एक भगवान्‌के सिवाय कुछ भी न होनेसे भगवान्‌ अकेले हैं, उनके पास (उनसे भी भिन्न) कुछ भी नहीं है । भगवान्‌का अंश होनेसे जीवके पास भी भगवान्‌के सिवाय कुछ नहीं है; अतः वह भी वास्तवमें अकेला है । जीव भगवान्‌ के सिवाय भूलसे जिसको भी अपना मानता है, वह सब असत्‌ है, त्याज्य है, मिलने और बिछुड़नेवाला है । तात्पर्य है कि भगवान्‌ भी अकिंचन हैं और उनका अंश जीव भी ! इसलिये भगवान्‌ने रुक्मणीजीसे कहा है-‘निष्किञ्चना वयं शश्वन्निष्किञ्चनजनप्रियाः’ (श्रीमद्भा० १० । ६० । १४ ) ‘हम सदाके अकिंचन हैं और अकिंचन भक्तोंसे ही हम प्रेम करते हैं तथा वे हमीसे प्रेम करते हैं ।’ जब साधक संसारमें शरीरादि किसी भी वस्तु-व्यक्तिको अपना तथा अपने लिये नहीं मानता, प्रत्युत एकमात्र भगवान्‌को ही अपना तथा अपने लिये मानता है, तब वह अकिंचन होकर भगवान्‌का प्रेमी हो जाता है-‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ (७ । १७), ‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌’ (७ । १८), ‘मयी ते तेषु चाप्यहम्‌’ (९ । २९) ।

.........................................
* गीतामें ‘महात्मा’ शब्द केवल भक्तके लिये ही आया है । इसी तरह ‘उदार’, ‘युक्ततम’, ‘सर्ववित्‌’ आदि शब्द भी भक्तके लिये ही आये हैं ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 5 April 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.१६)

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥ २०॥

योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आपसे अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है।

व्याख्या—

दूसरे अध्यायके पचपनवें श्लोकमें जिस तत्त्वकी प्राप्ति कर्मयॊगसे बतायी थी, उसी तत्त्वकी प्राप्ति यहाँ ध्यानयोगसे बतायि गयी है । दोनों साधनोंका प्रापणीय तत्त्व एक होनेपर भी ध्यानयोगमें तत्त्वकी प्राप्ति कठिनतासे तथा विलम्बसे होती है और इसमें योगभ्रष्ट होनेकी भी सम्भावना रहती है (गीता ६ । ४१-४४) । कारण कि ध्यानयोग करणसापेक्ष साधन है ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 9 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.१६)

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदृशन:॥ १८॥

ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय, हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।

व्याख्या—

बेसमझ लोगोंके द्वारा यह श्लोक प्रायः सम-व्यवहारके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया जाता है । परन्तु इस श्लोकमें ‘समवर्तिनः’ न कहकर ‘समदर्शिनः’ कहा गया है, जिसका अर्थ है-समदृष्टि, न कि सम-व्यवहार । यदि स्थूलरूपसे भी देखें तो ब्राह्मण, चाण्डाल, गाय, हाथी,और कुत्तेके प्रति सम-व्यवहार असम्भव है । इनमें विषमता अनिवार्य है । जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मणका ही हो सकता है, न कि चाण्डालका; दूध गायका ही पिया जाता है, न कि कुतिया का; सवारी हाथीपर ही की जा सकती है, न कि कुत्तेपर । जैसे शरीरके प्रत्येक अंगके व्यवहारमें विषमता अनिवार्य है, पर सुख-दुःखमें समता होती है अर्थात्‌ शरीरके किसी भी अंगका सुख हमारा सुख होता है और दुःख हमारा दुःख । हमें किसी भी अंगकी पीड़ा सह्य नहीं होती । ऐसे ही प्राणियोंसे विषम (यथायोग्य) व्यवहार करते हुए भी उनके सुख-दुःखमें समभाव होना चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 4 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.१६)


गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस:।
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते॥ २३॥

जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं।

व्याख्या—

निष्कामभाव पूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना ‘यज्ञार्थ कर्म’ है । यज्ञार्थ कर्म करनेवाले कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं और उसे अपने स्वतःस्वाभाविक असंग स्वरूपका अनुभव हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 30 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.१६)

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ २२॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित:।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:॥ २३॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा:॥ २४॥

हे पार्थ! मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्तव्यकर्ममें ही लगा रहता हूँ।
क्योंकि हे पार्थ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरता को करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ।

व्याख्या—

भगवान्‌ भी अवतारकाल में सदा कर्तव्य-कर्ममें लगे रहते हैं, इसलिये जो साधक फलेच्छा व आसक्ति-रहित होकर सदा कर्तव्य-कर्म में लगा रहता है, वह सुगमतापूर्वक भगवान को प्राप्त हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 29 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.१६)


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥ २३॥

शस्त्र इस शरीरी को काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती।

व्याख्या—

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार-यह अपरा प्रकृति (जड़-विभाग) है और स्वरूप परा प्रकृति (चेतन-विभाग) है (गीता ७।४-५) । अपरा प्रकृति परा प्रकृति तक पहुँच ही नहीं सकती । जड़ पदार्थ चेतन-तत्त्व तक कैसे पहुँच सकता है ? इसलिये जड़ वस्तु चेतनमें शरीरी में किन्चिन्मात्र कोई विकार उत्पन्न नहीं कर सकती ।

ॐ तत्सत् !