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Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।३०।।

जिस कालमें साधक प्राणियों के अलगअलग भावों को एक प्रकृति में ही स्थित देखता है और उस प्रकृति से ही उन सब का विस्तार देखता है, उस काल में वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।

व्याख्या—

सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणियों के स्थूल-सूक्ष्म तथा कारणशरीर एक प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृतिमें ही स्थित रहते हैं और प्रकृतिमें ही लीन होते हैं-इस प्रकार देखनेवाला ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है अर्थात्‌ प्रकृतिसे अतीत स्वतःसिद्ध अपने स्वरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - गयारहवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


सञ्जय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।।३५।।

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।।३६।।

सञ्जय बोले –

भगवान् केशव का यह वचन सुनकर (भय से) कम्पित हुए किरीटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके और अत्यन्त भयभीत होते हुए भी फिर प्रणाम करके गद्गद वाणी से भगवान् कृष्ण से बोले।

अर्जुन बोले –

हे अन्तर्यामी भगवन् आपके नाम, गुण, लीला का कीर्तन करने से यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(प्रेम) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम, गुण आदि के कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओं में भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं । यह सब होना उचित ही है।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।।३७।।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।।३८।।

वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें शुक्राचार्य भी मैं हूँ।
दमन करनेवालोंमें दण्डनीति और विजय चाहनेवालोंमें नीति मैं हूँ। गोपनीय भावोंमें मौन और ज्ञानवानोंमें ज्ञान मैं हूँ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥ ३०॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥ ३१॥

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभक्त होकर मेरा भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।
वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहने वाली शान्ति को प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! मेरे भक्त का पतन नहीं होता—ऐसी तुम प्रतिज्ञा करो।

व्याख्या—

ज्ञानयोग और कर्मयोगमें बुद्धिकी प्रधानत रहती है, इसलिये उनमें पहले बुद्धिमें समता आती है-‘एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु’ (गीता २ । ५४-६८) । ज्ञानयोग और कर्मयोगमें बुद्धि व्यवसित (एक निश्चय्वाली) होती है- ‘बुद्धया विशुद्धया युक्तः’ (गीता १८ । ५१), ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह’ (२ । ४१), ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिः’ (२ । ४४)। बुद्धि व्यवसित होनेसे अहम्‌का सर्वथा नाश नहीं होता; क्योंकि अहम्‌ बुद्धिसे परे है-‘भूमिरापो$नलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं... (गीत ७ । ४) । अतः मुक्त होनेपर भी अहम्‌की सूक्ष्म गन्ध रह जाती है, जो बन्धनकारक तो नहीं होती, पर दार्शनिक मतभेद पैदा करनेवाली होती है । परन्तु भक्तियोगमें स्वयं (भगवान्‌के अंश) की प्रधानता रहती है, इसलिये भक्त स्वयं व्यवसित होता है-‘सम्यग्व्यवसितो हि सः’ । स्वयं व्यवसित होनेसे अहम्‌ सर्वथा नहीं रहता; क्योंकि स्वयं अहम्‌से परे है । मन-बुद्धिमें बैठी हुई बातकी विस्मृति हो सकती है, पर स्वयंमें बैठी हुई बातकी विस्मृतिकभी नहीं हो सकती । स्वयंमें जो बात होती है, वह अखण्ड रहती है । इसलिये ‘मैं भगवान्‌का ही हूँ और भगवान्‌ ही मेरे अपने हैं’-य्ह स्वीकृति स्वयंमें होती है, मन-बुद्धिमें नहीं । कारण यह है कि मूलमें भगवान्‌का ही अंश होनेसे स्वयं भगवान्‌से अभिन्न है । भगवान्‌के सिवाय दूसरेके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही भूल है, मोह है, बन्धन है ।

जबतक मनुष्यको अपनेमें बल, योग्यता, विशेषता दीखती है, तबतक वह ‘अनन्यभाक्‌’ नहीं होता । अनन्यभाक्‌ तभी होता है, जब एक भगवान्‌ के सिवाय अन्य किसी का आश्रय नहीं रहता ।

व्याख्या—

जब मनुष्य सांसारिक दुःखोंसे घबरा जाता है और उन्हें मिटानेमें अपनी निर्बलताका अनुभव करता है, पर साथ-ही-साथ उसमें यह विश्‍वास रहता है कि सर्वसमर्थ भगवान्‌की कृपासे मेरी यह निर्बलता दूर हो सकती है और मैं सांसारिक दुःखोंसे छूट सकता हूँ, तब वह तत्काल भक्त हो जाता है ।

भक्त का पतन नहीं होता; क्योंकि उसमें अपने बल का आश्रय नहीं होता, प्रत्युत भगवान्‌ के ही बल का आश्रय होता है । वह साधननिष्ठ न होकर भगवन्निष्ठ होता है । इसलिये एक बार भक्त होने के बाद फिर उसका पतन नहीं होता अर्थात्‌ वह पुनः दुराचारी नहीं बनता ।

भगवान्‌ अर्जुनको प्रतिज्ञा करनेके लिये कहते हैं; क्योंकि भक्तकी प्रतिज्ञा भगवान्‌ भी टाल नहीं सकते । भक्ति भगवान्‌की कमजोरी है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ २७॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता:॥ २८॥

कारण कि हे भरतवंशमें उत्पन्न शत्रुतापन अर्जुन! इच्छा (राग) और द्वेषसे उत्पन्न होनेवाले द्वन्द्व-मोहसे मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसारमें (अनादिकालसे) मूढ़ताको अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त हो रहे हैं।
परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्योंके पाप नष्ट हो गये हैं, वे द्वन्द्वमोहसे रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं।

व्याख्या—

राग-द्वेषरूप द्वन्द्व से ही संसार का संबंध दृढ़ होता है और मनुष्य परमात्मा से विमुख हो जाता है । अतः मनुष्य की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति राग-द्वेषपूर्वक नहीं होनी चाहिये ।
राग-द्वेषसे रहित मनुष्य परमात्माके सम्मुख हो जाता है । परमात्माके सम्मुख होनेपर सब पाप नष्ट हो जाते हैं । जबतक मनुष्यके भीतर राग-द्वेष रहते हैं, तबतक वह सव्रथा परमात्माके सम्मुख नहीं हो सकता । उसका जितने अंशमें संसारसे राग (सम्मुखता) रहता है, उतने अंशमें परमात्मासे द्वेष (विमुखता) रहता है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 14 April 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.२४)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ ३१॥

मुझमें एकीभावसे स्थित हुआ जो भक्तियोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ बर्ताव करता हुआ भी मुझमें ही बर्ताव कर रहा है अर्थात् वह नित्य-निरन्तर मुझमें ही स्थित है।

व्याख्या—

भगवान्‌का भक्त अपने शरीरके सहित सम्पूर्ण संसारको भगवान्‌का ही स्वरूप समझता है । इसलिये वह नित्य-निरन्तर भगवान्‌में ही रहता है और भगवान्‌में ही सब बर्ताव करता है । उसके भवमें ये पाँच बातें रहती हैं- (१) मैं भगवान्‌का ही हूँ, (२) मैं जहाँ भी रहता हूँ, भगवान्‌के दरबारमें ही रहता हूँ, (३) मैं जो भी शुभ कार्य करता हूँ, भगवान्‌का ही कार्य करता हूँ, (४) मैं शुद्ध-सात्त्विक जो भी पाता हूँ, भगवान्‌का ही प्रसाद पाता हूँ, और (५) भगवान्‌के दिये प्रसादसे भगवान्‌के ही जनोंकी सेवा करता हूँ । जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन किया जाय, ऐसे ही उस भक्तका बर्ताव भगवान्‌में ही होता है । जैसे शरीर से सम्बन्ध माननेवाल मनुष्य सब क्रियाएं करते हुए भी निरन्तर शरीरमें ही रहता है, ऐसे ही भक्त सब क्रियाएं करते हुए भी निरन्तर भगवान्‌में ही रहता है ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 16 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.२४)

स्पर्शान्कृत्वा वहिर्वाह्रांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥२७॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: ।
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: ॥२८॥

बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के बीच में (स्थित करके) तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वश में हैं, जो केवल मोक्ष- परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

व्याख्या-
बाहर के पदार्थों को बाहर ही छोड़ने का तात्पर्य है कि साधक की वृत्ति में एक परमात्मतत्त्व के सिवाय अन्य कोई भी सत्ता न रहे। मुक्ति स्वतःसिद्ध है, पर मिलने और बिछुड़ने वाले प्राणी- पदार्थों की सत्ता, महत्ता और अपनापन होने के कारण उसका अनुभव नहीं होता।

ॐ तत्सत् !  

Saturday, 11 February 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.२४)

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥ ३३॥

हे परन्तप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान (तत्त्वज्ञान)-में समाप्त (लीन) हो जाते हैं।

व्याख्या—

पहले कहे गये बारह यज्ञ ‘द्रव्यमय यज्ञ’ हैं । उन सबकी अपेक्षा आगे कहा जानेवाला ‘ज्ञानयज्ञ’ श्रेष्ट है; क्योंकि ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है । द्रव्यमय यज्ञमें क्रिया तथा पदार्थकी मुख्यता है और ज्ञानयज्ञमें विवेक-विचारकी मुख्यता है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 11 January 2017

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.२४)


श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:॥ ३५॥

अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

व्याख्या—

वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार निष्कामभावसे अपने-अपने कर्तव्यका पालन करना मनुष्यका ‘स्वधर्म’ है और जो उसके लिये निषिद्ध है, वह ‘परधर्म’ है । जिनमें दूसरेके अहितका भाव होता है, वे चोरी, हिंसा आदि किसीके भी स्वधर्म नहीं हैं, प्रत्युत कुधर्म अथवा अधर्म हैं ।
प्रत्येक धर्ममें कुधर्म, अधर्म और परधर्म-ये तीनों रहते हैं; जैसे- दूसरेके अनिष्टका भाव, कूटनीति आदि ‘धर्ममें कुधर्म’ है । यज्ञमें पशुबलि देना आदि ‘धर्ममें अधर्म’ है । जो अपनेलिये निषिद्ध है, ऐसा दूसरे वर्ण, आश्रम आदिका ‘धर्ममें परधर्म’ है । कुधर्म, अधर्म और परधर्मसे कल्याण नहीं होता । कल्याण उस धर्मसे होता है, जिसमें अपने स्वार्थ तथा अभिमानका त्याग और दूसरेका वर्तमानमें और भविष्यमें हित होता हो ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 9 November 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.२४)

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥ ३२॥
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥ ३३॥
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
तत: स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥ ३३॥
अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥ ३४॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा:।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥ ३५॥
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता:।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दु:खतरं नु किम्॥ ३६॥

अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध खुला हुआ स्वर्ग का दरवाजा भी है। हे पृथानन्दन ! वे क्षत्रिय बड़े सुखी (भाग्यशाली) हैं, जिनको ऐसा युद्ध प्राप्त होता है। अब अगर तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करेगा तो अपने धर्म और कीर्ति का त्याग करके पापको प्राप्त होगा । और सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्ति का कथन अर्थात् निन्दा करेंगे । वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दु:खदायी होती है। तथा महारथी लोग तुझे भयके कारण युद्धसे हटा हुआ मानेंगे। जिनकी धारणा में तू बहुमान्य हो चुका है, (उनकी दृष्टिमें) तू लघुता को प्राप्त हो जायगा। तेरे शत्रुलोग तेरी सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत-से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे । उससे बढ़कर और दु:खकी बात क्या होगी ?

ॐ तत्सत् !