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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ॥१०॥

शरीर को छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीर में स्थित हुए अथवा विषयों को भोगते हुए भी गुणों से युक्त जीवात्मा के स्वरूप को मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रों वाले (ज्ञानी मनुष्य ही) जानते हैं।

व्याख्या-
शरीर को छोड़कर जाना, दूसरे शरीर में स्थित होना और विषयों को भोगना-तीनों क्रियाएँ अलग-अलग हैं, पर उनमें रहने वाला जीवात्म एक ही है-यह बात प्रत्यक्ष होते हुए भी अविवेकी मनुष्य इसको नहीं जानता अर्थात अपने अनुभव को महत्व नहीं देता। कारण कि तीनों गुणों से मोहित होने के कारण वह बेहोश-सा रहता है।
 भगवान ने पिछले श्लोक में पाँच क्रियाएँ बतायी थीं-सुनना, देखना, स्पर्श करना, स्वाद लेना तथा सूँघना, और इस श्लोक में तीन क्रियाएँ बतायी हैं- शरीर को छोड़कर जाना, दूसरे शरीर में स्थित होना तथा विषयों को भोगना। इन आठों में कोई भी क्रिया निरन्तर नहीं रहती, पर स्वयं निरन्तर रहता है। क्रियाएं तो आठ हैं, पर इन सब में स्वयं एक ही रहता है। इसलिये इनके भाव और अभाव का, आरम्भ और अन्त का ज्ञान सब को होता है। जिसे आरम्भ और अन्त का ज्ञान होता है, वह स्वयं नित्य होता है- यह नियम है।
अनेक अवस्थाओं में स्वयं एक रहता है और एक रहते हुए अनेक अवस्थाओं में जाता है। यदि स्वयं एक न रहता तो सब अवस्थाओं का अलग-अलग अनुभव कौन करता? परन्तु ऐसी बात प्रत्यक्ष होते हुए भी विमूढ़ मनुष्य इस तरफ नहीं देखते, प्रत्युत ज्ञानरूपी नेत्रों वाले योग मनुष्य ही देखते हैं। 

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।।९।।

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में और रजोगुण कर्म में लगाकर मनुष्य पर विजय करता है तथा तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में भी लगाकर मनुष्य पर विजय करता है ।

व्याख्या—

सत्त्वगुण केवल सुख होनेपर विजय नहीं करता, प्रत्युत सुख का संग होने पर विजय करता है-‘सुखसङ्गेन बध्नाति’ (गीता १४ । ६) । इसी तरह रजोगूण भी कर्म का संग होने पर विजय करता है-‘तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्‌’ (गीता १४ । ७) । परन्तु तमोगुण स्वरूप से ही विजय करता है । इसलिये तमोगुणमें ‘संग’ शब्द नहीं आया है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरणपोषण करनेवाले हैं तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं।

व्याख्या—

एक परमात्माके सिवाय और किसीकी भी सत्ता नहीं है ? हम जो कुछ भी कहते, सुनते, पढ़ते, सोचते हैं, वह परमात्मा से भिन्न नहीं है । सब से रहित भी वही है और सब के सहित भी वही है ।

इस प्रकरणमें ब्रह्मकी मुख्यता होने पर भी प्रस्तुत श्लोक में समग्र परमात्मा का ज्ञेय-तत्त्व के रूप में वर्णन हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि समग्र की मुख्यता ज्ञान और भक्ति दोनों में है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।१३।।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।१४।।

सब प्राणियों में द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःख की प्राप्ति में सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीर को वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मुझ में अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है ।

व्याख्या—

गीतामें मित्रता और करुणा न कर्मयोगी के लक्षणों में आयी है, न ज्ञानयोगी के लक्षणों में, प्रत्युत केवल भक्त के लक्षणोंमें आयी है । कर्मयोगी और ज्ञानयोगी में समता तो होती है, पर मित्रता और करुणा नहीं होती । परन्तु भक्त में आरम्भ से ही मित्रता और करुणा होती है ।

भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान्‌ के सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं, फिर कौन वैर करे, किससे करे और क्यों करे ? ‘निज प्रभुमय देखहिं जगत्‌ केहि सन करहिं विरोध’ (मानस, उत्तर० ११२ ख) । यद्यपि ज्ञानयोगी का भी किसी से किंचिन्मात्र भी वैर नहीं होता, तथापि उसमें स्वाभाविक उदासीनता, तटस्थता रहती है । ज्ञानमार्ग में वैराग्य की मुख्यता रहती है और वैराग्य रूखा होता है इसलिये ज्ञानयोगी के भीतर कठोरता न होने पर भी वैराग्य, उदासीनता के कारण बाहर से कठोरता प्रतीत होती है ।

प्रत्येक साधक के लिये निर्मम और निरहंकार होना बहुत आवश्यक है । इसलिये गीता में भगवान्‌ ने कर्मयोग (२ । ७१), ज्ञानयोग (१८ । ५३) और भक्तियोग (१२ । १३)--- तीनों ही योगमार्गों में निर्मम और निरहंकार होने की बात कही है । कारण कि वास्तव में हमारा स्वरूप निर्मम-निरहंकार है ।

भगवान्‌ में ज्ञान की भूख तो नहीं है, पर प्रेम की भूख अवश्य है । कारण कि प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान है, ज्ञान नहीं । इसलिये भगवान्‌ कहते हैं कि मुझमें अर्पित मन-बुद्धिवाला भक्त मुझे प्रिय है ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।।१४।।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्।।१५।।

भगवान् के विश्वरूप को देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्य के कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। वे हाथ जोड़कर विश्वरूप देव को मस्तक से प्रणाम करके बोले।

अर्जुन बोले –

हे देव ! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवताओं को, प्राणियों के विशेषविशेष समुदायों को, कमलासन पर बैठे हुए ब्रह्माजी को, शङ्करजी को, सम्पूर्ण ऋषियों को और सम्पूर्ण दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।११।।

उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।

व्याख्या—

यद्यपि कर्मयोग तथा ज्ञानयोग-दोनों साधन हैं और भक्तियोग साध्य है, तथापि भगवान्‌ अपने भक्तों को कर्मयोग भी दे देते हैं-‘ददामि बुद्धियोगं तम्‌’ और ज्ञानयोग भी दे देते हैं-‘ज्ञानदीपेन भास्वता’ । अपरा और परा-दोनों प्रकृतियाँ भगवान्‌की ही हैं । इसलिये भगवान्‌ कृपा करके अपने भक्तको अपरा की प्रधानता से होने वाल कर्मयोग और पराकी प्रधानतासे होनेवाला ज्ञानायोग-दोनों प्रदान करते हैं । अतः भक्तको कर्मयोगका प्रापणीय तत्त्व ‘निष्काम भाव’ और ज्ञानयोगका प्रापणीय तत्त्व ‘स्वरूपबोध’- दोनों ही सुगमतासे प्राप्त हो जाते हैं । कर्मयोग प्राप्त होनेपर भक्तके द्वारा संसारका उपकार होता है और ज्ञानयोग प्राप्त होनेपर भक्तका देहाभिमान दूर हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 5 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥ ११॥

मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियोंके महान् ईश्वररूप श्रेष्ठभावको न जानते हुए मुझे मनुष्यशरीरके आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं।

व्याख्या—

भगवान्‌से बड़ा कोई ईश्वर नहीं है । वे सर्वोपरि हैं । परन्तु अज्ञानी मनुष्य उन्हें स्वरूपसे नहीं जानते । वे अलौकिक भगवान्‌को भी अपनी तरह लौकिक मानकर उनकी अवहेलना करते हैं और नाशवान्‌ शरीर-संसारकी ही सत्ता मानकर भोग तथा संग्रहमें लगे रहते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता:॥ १५॥

महात्मा लोग मुझे प्राप्त करके दु:खालय अर्थात् दु:खोंके घर और अशाश्वत अर्थात् निरन्तर बदलने वाले पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेम की प्राप्ति हो गयी है।

व्याख्या—

भोग और संग्रहमें लगे हुए सकाम मनुष्यके लिये तो यह संसार दुःखालय है, पर सेवा और भगवद्भजन में लगे हुए निष्काम मनुष्य के लिये यह संसार भगवत्स्वरूप है ।

परमात्मतत्त्व की प्राप्ति एक बार होती है और सदा के लिये होती है, इसलिये परमात्मा को प्राप्त हुए मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता, वह सदा-सदा के लिये जन्म-मरण से छूट जाता है । यदि उसमें भक्ति के संस्कार हों तो वह जन्म-मरण से मुक्ति के साथ-साथ प्रतिक्षण वर्धमान परम प्रेम को भी प्राप्र कर लेता है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ ११॥

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! बलवानोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ और प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ।

व्याख्या—

सात्त्विक बल और बलवान्‌, धर्मयुक्त काम और प्राणी-ये-सब-के-सब एक भगवान्‌ ही हैं ।

पूर्वपक्ष-तामसी बल और धर्मविरुद्ध काम क्या भगवान्‌ नहीं हैं ?

उत्तरपक्ष-भगवान्‌ होते हुए भी ये त्याज्य हैं, ग्राह्य नहीं । कारण कि तामसी बल और धर्मविरुद्ध कामके परिणामस्वरूप दुःख, पीड़ा, सन्ताप, नरक आदिके रूपमें भगवान्‌ मिलते हैं, जो किसीके भी अभीष्ट नहीं हैं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०९ )

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद् वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥

सुहृद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियों में तथा साधु-आचरण करनेवालों में और पाप-आचरण करने वालों में भी समबुद्धि वाला मनुष्य श्रेष्ठ है।

व्याख्या- 
 
जिन से व्यवहार में एकता नहीं करनी चाहिये और एकता कर भी नहीं सकते, उन मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण में और सुहृद, मि, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बन्धु, साधु तथा पापी व्यक्तियों में भी कर्मयोगी महापुरूष की समबुद्धि रहती है। तात्पर्य है कि उसकी दृष्टि सब प्राणी-पदार्थों में समरूप से परिपूर्ण परमात्मतत्त्व पर ही रहती है। जैसे सोने से बने गहनों को देखें तो उन में बहुत अन्तर दीखता है, पर सोने को देखें तो कोई अन्तर नहीं, एक सोना-ही-सोना है। इसी प्रकार सांसारिक प्राणी पदार्थों को देखें तो उनमें बहुत बड़ा अन्तर है, पर तत्त्व से देखें तो एक परमात्मा-ही-परमात्मा हैं।
 
ॐ तत्सत् ! 

Saturday, 4 March 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०९)

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य:।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ १०॥

जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको परमात्मामें अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।

व्याख्या—

कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंको संसारके अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृतिके अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान्‌के अर्पण करता है । तीनोंका परिणाम एक ही होता है । तीनों योगोंमें ‘अपने लिये कुछ न करना’ आवश्यक है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 24 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.०९)


चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ १३॥
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥ १४॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्॥ १५॥

मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस (सृष्टि-रचना आदि)-का कर्ता होनेपर भी मुझ अविनाशी परमेश्वरको तू अकर्ता जान! कारण कि कर्मों के फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
पूर्वकालके मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं, इसलिये तू भी पूर्वजों के द्वारा सदा से किये जानेवाले कर्मों को ही (उन्हीं की तरह) कर।

व्याख्या—

चारों वर्णोंकी रचना मेरे द्वारा की गयी है- इस भगवद्वचन से सिद्ध होता है कि वर्ण जन्मसे होता है, कर्मसे नहीं । कर्मसे तो वर्णकी रक्षा होती है ।

जैसे सृष्टि-रचनारूप कर्म करने पर भी भगवान्‌ अकर्ता ही रहते हैं, ऐसे ही भगवान्‌का अंश जीव भी कर्म करते हुए अकर्ता ही रहता है-‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३ । ३१) । परन्तु जीव अहम्‌ से सम्बन्ध जोड़कर अज्ञानवश अपने को कर्ता मान लेता है-‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३ । २७) ।

भगवान्‌ का मत है कि मुमुक्षा जाग्रत होनेपर भी कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान तथा फलासक्ति का त्याग करके कर्तव्यकर्म करते रहना चाहिये । कर्म करने से बन्धन होता है, पर कर्मयोगसे मोक्ष (विश्राम) प्राप्त होता है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 23 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.०९)

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥ १३॥

यज्ञशेष (योग)- का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं । परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पाप का ही भक्षण करते हैं ।

व्याख्या—

सम्पूर्ण पापोंका कारण है-कामना । अतः कामनापूर्वक अपने लिये कोई भी कर्म करना पाप (बन्धन) है और निष्कामभावसे दूसरोंके लिये कर्म करना पुण्य है । पापका फल दुःख और पुण्यका फल सुख है । इसलिये स्वार्थभावसे अपने लिये कर्म करनेवाले दुःख पाते हैं और निःस्वार्थभावसे दूसरोंके लिये कर्म करनेवाले सुख पाते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 23 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.०९)

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:॥ १६॥

असत् का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है। तत्त्वदर्शी महापुरुषों ने इन दोनों का ही तत्त्व देखा अर्थात् अनुभव किया है।

व्याख्या—

दो विभाग हैं- चेतन-विभाग (‘है’) और जड़-विभाग (नहीं) । परमात्मा तथा सम्पूर्ण जीव चेतन-विभागमें है और संसार-शरीर जड़-विभागमें हैं । जड़ और चेतन – दोनों का स्वभाव परस्पर विरुद्ध है । यह नियम है कि परस्परविरुद्ध विश्वास एक साथ नहीं रह सकते । इसलिये ‘है’ पर विश्वास होते ही ‘नहीं’ का विश्वास निर्जीव हो जाता है और ‘नहीं’ से विश्वास उठते ही ‘है’ का विश्वास सजीव हो जाता है । सच्चा साधक एक ‘है’ (सत्‌-तत्त्व) के सिवाय अन्य (असत्‌) की सत्ता स्वीकार ही नहीं करता । अन्यकी सत्ता स्वीकार न करने पर साधकमें स्वतः ‘है’ की स्मृति जाग्रत्‌ हो जाती है । ‘है’ की स्मृतिसे साधककी साध्यके साथ अभिन्नता हो जाती है ।

कोई मनुष्य ‘नहीं’ को कितनी ही दृढतासे स्वीकार करे, उसकी निवृत्ति होती ही है, प्राप्ति होती ही नहीं । परन्तु ‘है’ को कितना ही अस्वीकार करे, उसकी प्राप्ति होती ही है । उसकी विस्मृति तो हो सकती है, पर निवृत्ति होती ही नहीं । अतः एक सत्तामात्र ‘है’ के सिवाय कुछ नहीं है- यह सार बात है, जिसका महापुरुषों ने अनुभव किया है ।

संसारमें अभाव ही मुख्य है । इसके भावमें भी अभाव है, अभावमें भी अभाव है । परन्तु परमात्मामें भाव ही मुख्य है । उनके अभावमें में भी भाव है, भावमें भी भाव है । संसार दीखे या न दीखे, मिले या न मिले, उसका ‘वियोग’ ही मुख्य है । परमात्मा दीखें या न दीखें, मिलें या न मिलें, उनका ‘योग’ ही मुख्य है। संसारका नित्यवियोग है । परमात्माका नित्ययोग है ।

ॐ तत्सत् !

Monday, 10 October 2016

गीता प्रबोधनी - पहला अध्याय (पोस्ट.०९)

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥ ३३॥
आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा:।
मातुला: श्वशुरा: पौत्रा: श्याला: सम्बन्धिनस्तथा॥ ३४॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते॥ ३५॥

जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये सब अपने प्राणोंकी और धनकी आशाका त्याग करके युद्धमें खड़े हैं। आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझ पर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो मैं इनको मारूँ ही क्या?

ॐ तत्सत् !