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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।३।। 
ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।४।।

इस संसारवृक्ष का जैसा रूप देखने में आता है, वैसा यहाँ (विचार करनेपर) मिलता नहीं क्योंकि इसका न तो आदि है, न अन्त है और न स्थिति ही है । इसलिये इस दृढ़ मूलों वाले संसाररूप अश्वत्थवृक्ष को दृढ़ असङ्गतारूप शस्त्र के द्वारा काटकर –
उसके बाद उस परमपद (परमात्मा) की खोज करनी चाहिये जिसको प्राप्त होने पर मनुष्य फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिससे अनादिकाल से चली आनेवाली यह सृष्टि विस्तार को प्राप्त हुई है, उस आदिपुरुष परमात्मा के ही मैं शरण हूँ।

व्याख्या—

भगवान्‌ आदिमें भी हैं, अन्तमें भी हैं और मध्यमें भी हैं (गीता १० । २०, ३२); परन्तु संसार न आदिमें है, न अन्तमें है और न मध्यमें ही है अर्थात्‌ संसारकी सत्ता ही नहीं है-‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २ । १६) । अतः एक भगवान्‌के सिवाय कुछ भी नहीं है ।
इस श्लोकमें आये ‘छित्त्वा’ पदका तात्पर्य काटना अथवा नाश (अभाव) करना नहीं है, प्रत्युत सम्बन्ध-विच्छेद करना है । कारण कि यह संसार-वृक्ष भगवान्‌की अपरा प्रकृति होनेसे अव्यय है ।
संसार रागके कारण ही दीखता है । जिस वस्तुमें राग होता है, उसी वस्तुकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता दीखती है । यदि राग न रहे तो नेत्रोंसे संसारकी सत्ता दीखते हुए भी महत्ता नहीं रहती । अतः ‘असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ पदोंका तात्पर्य है- संसारके रागको सर्वथा मिटा देना अर्थात्‌ अपने अन्तःकरणमें एक परमात्माके सिवाय अन्य किसीसे सम्बन्ध न मानना, सृष्टिमात्रकी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानना । वास्तवमें संसारकी सत्ता बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत उससे रागपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनकारक है । सत्ता बाधक नहीं है, महत्ता बाधक है । हम जिस वस्तुको महत्ता देते हैं, वही बाँधनेवाली हो जाती है । महत्ता हमारी दी हुई है, उसमें है नहीं । संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर संसारका संसाररूपसे अभाव हो जाता है और वह भगवद्‌रूपसे दीखने लगता है-‘वासुदेवः सर्वम्‌’ ।
संसार नित्यनिवृत्त है, इसलिये उसका त्याग होता है-‘असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ और परमात्मा नित्यप्राप्त हैं, इसलिये उनकी खोज होती है-‘ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्‌’ । निर्माण और खोज-दोनोंमें बहुत अन्तर है । निर्माण उस वस्तुका होता है, जिसका पहलेसे अभाव है और खोज उस वस्तुकी होती है, जो पहलेसे ही विद्यमान है । परमात्मा नित्यप्राप्त और स्वतःसिद्ध हैं, इसलिये उनकी खोज होती है, निर्माण नहीं होता । जब साधक परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करता है, तब खोज होती है । खोज करनेके दो प्रकार हैं-एक तो कण्ठी कहीं रखकर भूल जाय तो हम जगह-जगह उसकी खोज करते हैं और दूसरा, कण्ठी गलेमें ही हो पर न दीखनेसे बहम हो जाय कि कण्ठी खो गयी तो हम उसकी खोज करते हैं । परमात्मा गलेमें पड़ी कण्ठीकी खोजके समान हैं । तात्पर्य है कि वास्तवमें परमात्मा खोये नहीं हैं, पर संसारकी ओर दृष्टि (सम्मुखता) रहनेसे हमारी दृष्टि परमात्माकी ओर नहीं जाती । उधर दृष्टि न जाना ही उसका खोना है ।
परमात्मा कभी अप्राप्त हुए नहीं, अप्राप्त हैं नहीं, अप्राप्त हो सकते ही नहीं । उनकी अप्राप्ति नहीं हुई है, प्रत्युत विस्मृति हुई है, उनसे विमुखता हुई है, उनकी अप्राप्तिका वहम हुआ है । परमात्माकी खोज करनेका उपाय है-अप्राप्त संसारका त्याग करना अर्थात्‌ उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना, उसे अस्वीकार करना । अतः संसारके त्यागमें ही परमात्माकी खोज निहित है-‘अतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः’ (श्रीमद्भा० १० । १४ । २८) ।
संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर साधक मुक्त हो जाता है । मुक्त होने पर संसार की कामना तो मिट जाती है, पर प्रेम की भूख नहीं मिटती । ब्रह्मसूत्र में आया है-‘मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्‌ (१।३।२) ‘उस प्रेमस्वरूप भगवान्‌को मुक्त पुरुषों के लिये भी प्राप्तव्य बताया गया है’ । तात्पर्य है कि स्वरूप जिसका अंश है, उस अंशी (परमात्मा)-के प्रेमकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है । अंश (स्वरूप)-में निजानन्द (अखण्ड आनन्द) है और अंशीमें परमानन्द (अनन्त आनन्द) है । जो मुक्ति में नहीं अटकता, उसमें सन्तोष नहीं करता, उसे प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम (अनन्त आनन्द)-की प्राप्ति होती है-‘मद्भक्तिं लभते पराम्‌’ (गीता १८ । ५४) । इसलिये प्रस्तुत श्लोकमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करने अर्थात्‌ मुक्त होनेके बाद परमात्मा की खोज करके उनकी शरण ग्रहण करने की बात कही गयी है ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।३।।

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्तिस्थान है और मैं उसमें जीवरूप गर्भ का स्थापन करता हूँ । उससे सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है ।

व्याख्या—

जीव जब तक मुक्त नहीं होता, तब तक प्रकृति के अंश कारणशरीर से उसका सम्बन्ध बना रहता है और वह महाप्रलय में कारणशरीर सहित ही प्रकृति में लीन होता है । जब उस जीवके कर्म परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख होते हैं, तब महासर्ग के आदि में भगवान्‌ उसका प्रकृति के साथ पुनः विशेष सम्बन्ध स्थापित कर देते हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु ।।३।।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ।।४।।

वह क्षेत्र जो है, जैसा है, जिन विकारों वाला है और जिससे जो पैदा हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।

यह क्षेत्रक्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियों के द्वारा बहुत विस्तार से कहा गया है तथा वेदों की ऋचाओं द्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और युक्तियुक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।५।।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।६।।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।७।।

अव्यक्तमें आसक्त चित्तवाले उन साधकों को (अपने साधनमें) कष्ट अधिक होता है क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति कठिनतासे प्राप्त की जाती है।
परन्तु जो सम्पूर्ण कर्मों को मेरे अर्पण करके और मेरे परायण होकर अनन्ययोग (सम्बन्ध) -से मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं।
हे पार्थ ! मुझमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसारसमुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।

व्याख्या—

निर्गुणोपासना में जो देहसहित है, वह उपासक (जीव) है और जो देहरहित है, वह उपास्य (ब्रह्म) है । देह के साथ माना हुआ सम्बन्ध ही जीव और ब्रह्म की एकता में मुख्य बाधक है । इसलिये देहाभिमानी के लिये निर्गुणोपासना की सिद्धि कठिनता से और देरी से होती है । परन्तु सगुणोपासना में भगवान्‌ की विमुखता ही बाधक है, देहाभिमान नहीं । इसलिये सगुणोपासक संसार से विमुख होकर भगवान्‌ के सम्मुख हो जाता है और साधन के आश्रित न होकर भगवान्‌ के आश्रित हो जाता है । अतः भगवान्‌ कृपा करके शीघ्र ही उद्धार कर देते हैं (गीता ८ । १४, १२ । ७) । यह सगुणोपासना की विलक्षणता है ।

जैसे ज्ञानयोगी क्रियाओं को प्रकृति के द्वारा होनेवाली समझकर तथा अपने को उनसे सर्वथा असंग अनुभव करके कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है, ऐसे ही भक्तियोगी अपनी क्रियाओं को भगवान्‌ के अर्पण करके कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है ।
‘मैं केवल भगवान्‌ का ही हूँ, और किसी का नहीं हूँ तथा केवल भगवान्‌ ही मेरे अपने हैं, और कोई भी मेरा अपना नहीं है’- ऐसा मानना ही अनन्ययोग से भगवान्‌ की उपासना करना है ।

छठे अध्याय के पाँचवें श्लोक में भगवान्‌ ने सामान्य साधकों के लिये अपने द्वारा अपना उद्धार करनेकी बात कही थी-- ‘उद्धरेदात्मनात्मानम्‌’ और यहाँ कहते हैं कि भक्तों का उद्धार मैं करता हूँ । इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक साधक आरम्भ में स्वयं ही साधन में लगता है । परन्तु जो साधक भगवान्‌ के आश्रित होता है, उसका उद्धार भगवान्‌ करते हैं । वह तो अपने उद्धार की चिन्ता न करके केवल भगवान्‌ के भजनमें ही लगा रहता है । उसका साधन और साध्य भगवान्‌ ही होते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।।५।।

श्रीभगवान् बोले –
हे पृथानन्दन ! अब मेरे अनेक तरह के, अनेक वर्णों और आकृतियों वाले सैकड़ों हजारों अलौकिक रूपों को तू देख।

व्याख्या—

उपदेश दो प्रकार से दिया जाता है- कहकर और दिखाकर । पहले दसवें अध्याय में भगवान्‌ ने अपने समग्ररूप का वर्णन किया कि मैं अपने एक अंश से सम्पूर्ण जगत्‌ को व्याप्त करके स्थित हूँ । अब इस अध्याय में भगवान्‌ अर्जुन के द्वारा प्रार्थना करने पर उसी रूप को प्रत्यक्ष दिखाते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।।४।।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः।।५।।

बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, उत्पत्ति , विनाश , भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलगअलग (बीस) भाव मुझसे ही होते हैं।

व्याख्या—

ज्ञानकी दृष्टिसे तो सभी भाव प्रकृतिसे होते हैं, पर भक्तिकी दृष्टिसे भी सभी भाव भगवान्‌से तथा भगवत्स्वरूप होते हैं । अगर इन भावोंको जीव का मानें तो जीव भी भगवान्‌की ही परा प्रकृति होनेसे भगवान्‌से अभिन्न है । अतः ये भाव भगवान के ही हुए। भगवान् में ये भाव निरन्तर रहते हैं पर जीवमें अपरा प्रकृतिके संगसे आते-जाते रहते हैं । भगवान्‌से उत्पन्न होनेके कारण सभी भाव भगवत्स्वरूप ही हैं ।

जैसे हाथ एक ही होता है, पर उसमें अँगुलियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, ऐसे ही भगवान्‌ एक ही हैं, पर उनसे प्रकट होनेवाले भाव भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥ ३॥

हे परन्तप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखने-वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

व्याख्या—

पूर्वश्लोकमें कथित विज्ञानसहित ज्ञानकी की महिमा पर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य इससे लाभ नहीं उठाते, प्रत्युत नाशवान्‌ शरीर-संसारको महत्त्व देकर बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं । ऐसे अश्रद्धालु मनुष्य स्वतःप्राप्त अमरताका मार्ग छोड़कर मृत्युके मार्गपर चलते रहते हैं, जिसमें केवल मृत्यु-ही-मत्यु है । मनुष्यशरीरमें भगवत्प्राप्तिका बहुत श्रेष्ठ अवसर था, पर वे उस मार्गकॊ पकड़ लेते हैं, जिस मार्गमें कभी भगवत्प्राप्ति न हो सके । उनकी ऐसी दशाको देखकर भगवान्‌ मानो दुःखके साथ कहते हैं-‘ अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि’ ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥ ५॥

जो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरूपको ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।

व्याख्या—

भगवान्‌ ने मनुष्य पर विशेष कृपा करके उसे यह छूट दी है कि उसका जीवन कैसा ही रहा हो, यदि अन्तसमय में भी वह मुझे याद कर ले तो मैं उसका कल्याण कर दूँगा । कारण कि भगवान्‌ ने अहैतुकी कृपासे जीव को अपना कल्याण करनेके लिये ही मनुष्य शरीर दिया है ।

वास्तव में सब समय अन्तसमय ही है; क्योंकि अन्तसमय किसी भी समय आ सकता है । ऐसा कोई क्षण नहीं है, जिस क्षण में अन्तसमय न आता हो । इसलिये मनुष्य को हर समय भगवान्‌ को याद रखना चाहिये ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 30 April 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ ४॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ ५॥

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश (—ये पंचमहाभूत) और मन, बुद्धि तथा अहंकार—इस प्रकार यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी यह अपरा प्रकृति है;और हे महाबाहो ! इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी परा प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

व्याख्या—

जब चेतन-तत्त्व अपरा प्रकृतिके अहंकारके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब वह ‘परा प्रकृति’ कहलाता है । अपरा (जगत्‌) और परा (जीव)-दोनों ही भगवान्‌की प्रकृतियाँ अर्थात्‌ शक्तियाँ हैं, स्वभाव हैं । शक्तिमान्‌के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती । जैसे नख और केश निष्प्राण होते हुए भी प्राणयुक्त शरीरसे भिन्न नहीं होते, ऐसे ही अपरा प्रकृति जड़ होते हुए भी चेतन परमात्मासे भिन्न नहीं होती । अतः अपरा और परा-दोनों प्रकृतियाँ भगवान्‌का स्वरूप होनेसे भगवान्‌के सिवाय कुछ भी शेष नहीं रहा !

इस जगत्‌ को जीव ने ही धारण कर रखा है । तात्पर्य है कि जगत्‌ न तो परमात्माकी दृष्टिमें है, न महात्मा की दृष्टि में है, प्रत्युत जीवकी दृष्टिमें है । जीव ने जगत्‌ को सत्ता और महत्ता देकर उसमें अपनापन कर लिया और जन्म-मरण्रूप बन्धनमें पड़ गया ।

पृथ्वीसे लेकर अहंकार्तक सब जड़ अपरा प्रकृति है । अतः जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि आदि जाननेमें आनेवाले हैं, ऐसे ही अहंकार भी जाननेमें आनेवाला है । उस अहंकारसे तादात्म्य करके जीव अपनेको ‘मैं हूँ’-ऐसा मान लेता है । इसमें ‘मैं’ तो अपरा प्रकृति है और ‘हूँ’ परा प्रकृति है । अहंकार्से सम्बन्ध-विच्छेद होने पर ‘मैं’ का तो अभाव हो जाता है और ‘हूँ’ चिन्मय सत्तामात्र ‘है’ में परिणत हो जाता है-यही मोक्ष है ।

अहम्‌ को धारण करनेसे जीवने सम्पूर्ण अपरा प्रकृति को धारण कर लिया है । ‘मैं’ हूँ’-इस अभिमानको रखना ही अपरा प्रकृतिको धारण करना है । यदि अहम्‌ अभिमानशून्य हो जाय अर्थात्‌ अभिमान न रहकर अपरा प्रकृतिका शुद्ध अहम्‌ रह जाय तो वह बन्धनकारक नहीं होता; जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, आदि कभी बन्धनकारक नहीं होते ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 21 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०३)

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते॥ ३॥

जो योग (समता)-में आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये कर्तव्य-कर्म करना कारण कहा गया है और उसी योगारूढ़ मनुष्यका शम (शान्ति) परमात्मप्राप्तिमें कारण कहा गया है।

व्याख्या—

निष्कामभाव से केवल दूसरे के लिये कर्म करने से करने का वेग मिट जाता है । कर्म करने का वेग मिटने से साधक योगारूढ़ अर्थात्‌ समता में स्थित हो जाता है । योगारूढ़ होने पर एक शान्ति प्राप्त होती है । उस शान्तिका उपभोग न करनेसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है ।
शम (शान्ति)- का अर्थ है-शान्त होना, चुप होना, कुछ न करना । जबतक हमारा सम्बन्ध ‘करने’ (क्रिया)-के साथ है, तबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है । जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, तबतक अशान्ति है, दुःख है, जन्म-मरणरूप बन्धन है । प्रकृतिके साथ सम्बन्ध ‘न करने’ से मिटेगा । कारण कि क्रिया और पदार्थ-दोनों प्रकृतिमें हैं । चेतन-तत्त्वमें न क्रिया है, न पदार्थ । इसलिये परमात्मप्राप्तिके लिये ‘शम’ अर्थात्‌ कुछ न करना ही कारण है । हाँ, अगर हम इस शान्तिका उप्भोग करेंगे तो परमात्मा की प्राप्ति नहीं होगी । ‘मैं शान्त हूँ’- इस प्रकार शान्तिमें अहंकार लगानेसे और ‘बड़ी शान्ति है’- इस प्रकार शान्तिमें संतुष्ट होनेसे शान्तिका उपभोग हो जाता है । इसलिये शान्तिमें व्यक्तित्व न मिलाये, प्रत्युत ऐसा समझॆ कि शान्ति स्वतः है । शान्तिका उपभोग करनेसे शान्ति नहीं रहेगी, प्रत्युत चंचलता अथवा निद्रा आ जायगी । उपभोग न करनेसे शान्ति स्वतः रहेगी । क्रिया और अभिमानके बिना जो स्वतः शान्ति होती है, वह ‘योग’ है । कारण कि उस शान्तिका कोई कर्ता अथवा भोक्ता नहीं है । जहाँ कर्ता अथवा भोक्ता होता है, वहाँ भोग होता है । भोग होनेपर संसारमें स्थिति होती है ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 February 2017

गीता प्रबोधनी- पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०३)

ज्ञेय: स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥ ३॥

हे महाबाहो! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकांक्षा करता है, वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

व्याख्या—

जिसने बाहरसे संन्यास-आश्रम ग्रहण कर लिया है, वह वास्तवमें संन्यासी नहीं है । संन्यासी वास्तवमें वह है, जिसने भीतरसे राग-द्वेषका त्याग कर दिया है । राग-द्वेषके रहते हुए मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता । परन्तु जिसने राग-द्वेषका त्याग कर दिया है, वह सुखपूर्वक संसारसे मुक्त हो जाता है ।
जिसके भीतर राग-द्वेष नहीं है, वह कर्मयोगी शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए बी सदा संन्यासी ही है । उसने अपने कल्याणके लिये बाहरसे संन्यास-आश्रम ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं है ।
ज्ञानयोगमें अपने स्वरूपको जाननेकी मुख्यता रहनेसे ज्ञानयोगीमें उदासीनता रहती है । परन्तु कर्मयोगीमें दूसरेके हितकी मुख्यता रहती है । इसलिये अहंवृत्तिका त्याग कर्मयोगमें सुगम है, ज्ञानयोगमें नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 20 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.०३)


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ७॥
\
हे भरतवंशी अर्जुन ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आप को (साकाररूप से) प्रकट करता हूँ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 15 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.०३)


न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:॥ ५॥

कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था में क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृति के परवश हुए सब प्राणियों से प्रकृतिजन्य गुण कर्म करवा लेते हैं ।

व्याख्या—

प्रकृति का विभाग अलग है और स्वरूप का विभाग अलग है । क्रियामात्र प्रकृति-विभाग में है । स्वरूप अक्रिय है । प्रकृति में श्रम है और स्वरूपमें विश्राम है । अतः जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, तबतक मनुष्य किसी भी अवस्था में क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता ।

ॐ तत्सत् !

Monday, 17 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.०३)

कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७॥
कायरतारूप दोष से तिरस्कृत स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित अन्त:करणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो,वह बात मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।
व्याख्या—
प्रत्येक मनुष्य वास्तव में साधक है । कारण कि चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए जीव को भगवान्‌ यह मनुष्य शरीर केवल अपना कल्याण करने के लिए ही प्रदान करते हैं । इसलिये किसी भी मनुष्य को अपने कल्याण से निराश नहीं होना चाहिये । मनुष्यमात्र को परमात्मप्राप्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है । साधक होने के नाते मनुष्यमात्र अपने साध्य को प्राप्त करने में स्वतन्त्र, समर्थ, योग्य और अधिकारी है । सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि मनुष्य अपने उद्देश्य को पहचानकर दृढ़तापूर्वक यह स्वीकार कर ले कि मैं संसारी नहीं हूँ, प्रत्युत साधक हूँ ।
मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं वैश्य हूँ, मैं शूद्र हूँ, मैं ब्रह्मचारी हूँ, मैं गृहस्थ हूँ, मैं वानप्रस्थ हूँ, मैं सन्यासी हूँ आदि मान्यताएँ केवल सांसारिक व्यवहार (मर्यादा)- के लिये तो ठीक हैं, पर परमात्म प्राप्तिमें ये बाधक है। ये मान्यताएँ शरीर को लेकर हैं । परमात्मप्राप्ति शरीर को नहीं होती, प्रत्युत स्वयं साधक को होती है । साधक स्वयं अशरीरी ही होता है ।
अर्जुन ने अपने वास्तविक उद्देश्य को पहचान लिया है कि मुझे अपना कल्याण करना है । इसलिये वे युद्ध करने अथवा न करनेकी बात न पूछकर अपने कल्याणका निश्चित उपाय पूछते हैं ।
ॐ तत्सत् !

Tuesday, 4 October 2016

गीता प्रबोधनी - पहला अध्याय (पोस्ट.०३)

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥ १०॥

(द्रोणाचार्यको चुप देखकर दुर्योधनके मनमें विचार हुआ कि वास्तवमें) हमारी वह सेना (पाण्डवोंपर विजय करनेमें) अपर्याप्त है, असमर्थ है; क्योंकि उसके संरक्षक (उभय-पक्षपाती) भीष्म हैं । परन्तु इन पाण्डवोंकी यह सेना (हमपर विजय करनेमें) पर्याप्त है, समर्थ है; क्योंकि इसके संरक्षक (निजसेना-पक्षपाती) भीमसेन हैं।

व्याख्या—

इस श्लोक से ऐसा प्रतीत है कि दुर्योधन पांडवों से संधि करना चाहता है | परन्तु वास्तव में ऐसी बात है नहीं | दुर्योधन ने कहा है—

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जनाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः |
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ||
....................(गर्गसंहिता, अश्वमेध०५० | ३६)

‘मैं धर्म को जानता हूँ, पर उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म को भी जानता हूँ, पर उसमें मेरी निवृत्ति नहीं होती | मेरे हृदय में स्थित कोई देव है, जो मुझसे जैसा करवाता है, वैसा ही मैं करता हूँ |’

दुर्योधन हृदय में स्थित जिस देव की बात कहता है, वह वास्तव में ‘कामना’ ही है | जब वह कामना के वशीभूत होकर उसके अनुसार चलता है तो फिर वह पाण्डवों से संधि कैसे कर सकता है ? पाण्डव मन के अनुसार नहीं चलते थे, प्रत्युत धर्म के तथा भगवान् की आज्ञा के अनुसार चलते थे | इसलिए जब गन्धर्वों ने दुर्योधन को बन्दी बना लिया था, तब युधिष्ठिर ने ही उसे छुड़वाया | वहाँ युधिष्ठिर के वचन हैं—

परै: परिभावे प्राप्ते वयं पञ्चोतरं शतम् |
परस्परविरोधे तु वयं पञ्च शतं तु ते ||
...................(महाभारत, वन० २४३)

‘दूसरों के द्वारा पराभव प्राप्त होनेपर उसका सामना करने के लिए हमलोग एक सौ पाँच भाई हैं | आपस में विरोध होनेपर ही हम पाँच भाई अलग हैं और वे सौ भाई अलग हैं |’

कामना मनुष्यों को पापों में लगाती है (गीता ३ | ३६-३७); परन्तु धर्म मनुष्यों को पुण्यकर्मों में लगाता है |

ॐ तत्सत् !