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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।७।।

इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

व्याख्या—
प्रस्तुत श्लोकमें ‘ममैवांशः’ पद में ‘एव’ कहनेका तात्पर्य है कि जीव केवल भगवान्‌ का ही अंश है, इसमें प्रकृतिका अंश किंचिन्मात्र भी नहीं है । जैसे शरीरमें माता और पिता- दोनोंके अंशका मिश्रण होता है, ऐसे जीवमें भगवान्‌ और प्रकृति के अंशका मिश्रण (संयोग) नहीं है, प्रत्युत यह केवल भगवान्‌ का ही अंश है । अतः इसका सम्बन्ध केवल भगवान्‌ का ही अंश है । अतः इसका सम्बन्ध केवल भगवान्‌ के साथ है, प्रकृतिके साथ नहीं । प्रकृतिके साथ सम्बन्ध तो यह खुद जोड़ता है ।
प्रकृतिके कार्य स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही अनर्थका कारण है । जीव शरीरको अपनी तरफ खींचता है (कर्षति) अर्थात्‌ उसे अपना मानता है, पर जो वास्तवमें अपना है, उस परमात्माको अपना मानता ही नहीं ! यही जीवकी मूल भूल है ।
हमारा सम्बन्ध परमात्मा के साथ है-‘ममैवांशो जीवलोके’, इसलिये हम परमात्मा में ही स्थित हैं । परन्तु शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिका सम्बन्ध अपरा प्रकृति के साथ है, इसलिये वे प्रकृति में ही स्थित हैं-‘प्रकृतिस्थानि’ । शरीर के साथ हमारा मिलन कभी हुआ ही नहीं, है ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं और परमात्मा से अलग हम कभी हुए नहीं, होंगे ही नहीं, हो सकते ही नहीं । हमसे दूर-से-दूर कोई वस्तु है तो वह शरीर है और समीप-से-समीप कोई वस्तु है तो वह परमात्मा है । परन्तु शरीर को मैं, मेरा और मेरे लिये मानने के कारण मनुष्यको उलटा दीखता है अर्थात्‌ शरीर तो समीप दीखता है, परमात्मा दूर ! शरीर तो प्राप्त दीखता है, परमात्मा अप्राप्त !

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।६।।

हे पापरहित अर्जुन ! उन गुणों में सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होने के कारण प्रकाशक और निर्विकार है । वह सुख और ज्ञान की आसक्ति से (देहीको) बाँधता है ।

व्याख्या—

गुणातीत होने के बहुत समीप होने के कारण सत्त्वगुण को अनामय (निर्विकार) कहा गया है । परन्तु सुख और ज्ञान के संग के कारण वह विकारी हो जाता है; क्योंकि संग रजोगुण का स्वरूप है । सुख और ज्ञान बाधक नहीं हैं, प्रत्युत उनका संग बाधक है । संग है-उनको अपना मान लेना । वास्तव में सत्त्वगुण अपना है ही नहीं, वह तो प्रकृति का है । अतः जब तक संग रहता है, तब तक मुक्ति नहीं होती; क्योंकि स्वरूप असंग है ।

सात्त्विक ज्ञान में तो ‘मैं ज्ञानी हूँ’-यह संग रहता है, पर तत्त्वज्ञान सर्वथा असंग है अर्थात्‌ तत्त्वज्ञान होनेपर ‘मैं ज्ञानी हूँ’- यह संग नहीं रहता । सात्त्विक ज्ञान में द्रष्टा रहता है और अपने में विशेषता का भान होता है, परन्तु तत्त्वज्ञान में कोई द्रष्टा नहीं रहता और अपने में कोई कमी भी नहीं रहती तथा (व्यक्तित्व न रहनेसे) विशेषता का भान भी नहीं होता ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।७।।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।८।।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।९।।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।१०।।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।११।।

मानित्व(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव) का न होना, दम्भित्व(दिखावटीपन) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहरभीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना।
इन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना, अहंकारका भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको बारबार देखना।

आसक्तिरहित होना पुत्र, स्त्री, घर आदिमें एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होना और अनुकूलताप्रतिकूलताकी प्राप्तिमें चित्तका नित्य सम रहना।

मुझमें अनन्ययोगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्तिका होना, एकान्त स्थानमें रहनेका स्वभाव होना और जनसमुदायमें प्रीतिका न होना।

अध्यात्मज्ञानमें नित्यनिरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्मा को सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधनसमुदाय) तो ज्ञान है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है।

व्याख्या—

अब भगवान्‌ क्षेत्रके साथ माने हुए सम्बन्ध (तादात्म्य)---को तोड़नेके लिये ज्ञानके साधन बताते हैं ।

एक ‘दुःखका भोग’ होता है और एक दुःखका प्रभाव’ होता है । दुःखसे दुःखी होना और सुखकी इच्छा करना ‘दुःखका भोग’ है । दुःखके कारण की खोज करके उस को मिटाना ‘दुःखका प्रभाव’ है । यहाँ दुःखके प्रभावको ‘दुःखदोषानुदर्शनम्‌’ पदसे कहा गया है ।

दुःखका भोग करनेसे अर्थात्‌ दुःखी होनेसे विवेक लुप्त हो जाता है । परन्तु दुःखका प्रभाव होनेसे विवेक लुप्त नहीं होता, प्रत्युत मनुष्य विवेक-दृष्टिसे दुःखके कारणकी खोज करता है और खोज करके उसे मिटाता है । सुखकी इच्छा ही सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है । कारणके मिटनेपर कार्य अपने-आप मिट जाता है । अतः सुखकी इच्छा मिटनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है ।

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विभाग का ज्ञान कराने वाला होने से इन बीस साधनों को भी ‘ज्ञान’ नाम से कहा गया है । इससे जो विपरीत है, वह ‘अज्ञान’ है । साधन न करनेसे मनुष्य ज्ञानकी बातें तो सीख लेता है, पर अनुभव नहीं करता । अतः साधन न करनेसे अज्ञान (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञमें एकताका भाव) रहता है और अज्ञानके रहते हुए अगर कोई सीखकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका विवेचन करता है तो वह वास्तवमें अपने देहाभिमानको ही पुष्ट करता है । परन्तु जो ये साधन करता है, उसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विभागका अनुभव हो जाता है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।

अगर तू अभ्यास(योग) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा । मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी तू सिद्धि को प्राप्त हो जायगा ।

व्याख्या—

अभ्यासकी अपेक्षा भी क्रियाओं को भगवान्‌ के अर्पण करना सुगम है । कारण कि अभ्यास तो नया काम है, जो करना पड़ता है, पर कर्म करने का स्वभाव पड़ा हुआ होने से कर्म स्वतः होते हैं । उन लौकिक-पारमार्थिक सभी कर्मों को भगवान्‌ के अर्पण करने से मनुष्य सुगमतापूर्वक भगवान्‌ को प्राप्त हो जाता है (गीता ९ । २७-२८) ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।८।।

तू अपनी इस आँख से अर्थात् चर्मचक्षु से मुझे देख ही नहीं सकता। इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरी ईश्वरसम्बन्धी सामर्थ्य को देख ।

व्याख्या—

‘पश्य’ क्रियाके दो अर्थ होते हैं-जानना और देखना । पहले (गीता ९ । ५ में) ‘पश्य मे योगमैश्‍वरम्‌’ पदोंसे भगवान्‌ को जानने की बात आयी है और यहाँ इस पदों से देखने की बात आयी है । तात्पर्य यह हुआ कि जो जानने में आता है, वह भी भगवान्‌ हैं और जो देखने में आता है, वह भी भगवान्‌ हैं । इतना ही नहीं, जानने और देखने के सिवाय भी जो कुछ है, वह भगवान्‌ ही हैं- ‘सद्सत्तत्परं यत्‌’ (गीता ११ । ३७)।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।।८।।

मैं संसारमात्र का प्रभव (मूलकारण) हूँ, और मेरेसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है -- ऐसा मानकर मुझ में ही श्रद्धा-प्रेम रखते हुए बुद्धिमान् भक्त मेरा ही भजन करते हैं -- सब प्रकारसे मेरे ही शरण होते हैं ।

व्याख्या—

पदार्थ और व्यक्ति भी भगवान्‌से ही होते हैं (अहं सर्वस्य प्रभवः) और क्रियाएँ भी भगवान्‌ से ही होती हैं (मत्त: सर्व प्रवर्तते) । परन्तु जीव पदार्थों, व्यक्तियों और क्रियाओंसे सम्बन्ध जोड़कर, उनको अपना मानकर, उनक भोक्ता और कर्ता बनकर बनधनमें पड़ जाता है । जो मनुष्य पदार्थों, व्यक्तियों और क्रियाओंसे सम्बन्ध न जोड़कर भगवान्‌के महत्त्व (प्रभाव)-को मान लेते हैं, वे संसारमें न फँसकर भगवान्‌के ही भजनमें लग जाते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥ ७॥

हे कुन्तीनन्दन! कल्पोंका क्षय होनेपर (महाप्रलयके समय) सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं और कल्पोंके आदिमें (महासर्गके समय) मैं फिर उनकी रचना करता हूँ ।

व्याख्या—

पूर्व श्लोकमें वर्णित स्थिति न होनेपर मनुष्यकी क्या दशा होती है- इसे भगवान्‌ इस श्लोकमें बताते हैं । महाप्रलयके समय प्रकृतिके परवश हुए सम्पूर्ण प्राणी अपने-अपने कर्मों को लेकर भगवान्‌ की प्रकृति में लीन हो जाते हैं । प्रकृति में लीन हुए उन प्राणियों के कर्म जब परिपक्व होकर फल देनेके लिये उन्मुख हो जाते हैं, तब भगवान्‌में ‘बहु स्यां प्रजायेय’ ‘मैं अनेक रूपों में प्रकट हो जाउँ’ (छान्दोग्य० ६ । २ । ३)--ऐसा संकल्प हो जाता है और महासर्ग का आरम्भ हो जाता है । महासर्ग के आदि में भगवान्‌ उन प्राणियों के परिपक्व कर्मों का फल देकर शुद्ध करने के लिये उनके शरीरों की रचना करते हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 

 अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८॥ 
कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्य: ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमस: परस्तात् ॥९॥ 

हे पृथानन्दन! अभ्यास योग से युक्त और अन्य का चिन्तन न करने वाले चित्त से परम दिव्य पुरुष का चिन्तन करता हुआ (शरीर छोड़ने वाला मनुष्य) उसी को प्राप्त हो जाता है। 
जो सर्वज्ञ, अनादि, सब पर शासन करने वाला सूक्ष्म से अत्यन्त सूक्ष्म, सब का धारण-पोषण करने वाला, अज्ञान से अत्यन्त परे, सूर्य की तरह प्रकाश-स्वरूप अर्थात ज्ञानस्वरूप- ऐसे अचिन्त्य स्वरूप का चिन्तन करता है।

ॐ तत्सत् ! 

Sunday, 30 April 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो:।
प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु॥ ८॥

हे कुन्तीनन्दन! जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ,सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार), आकाशमें शब्द और मनुष्योंमें पुरुषत्व मैं हूँ।

व्याख्या—

सृष्टिकी रचनामें भगवान्‌ ही कर्ता होते हैं, भगवान्‌ ही कारण होते हैं और भगवान्‌ ही कार्य होते हैं । इस दृष्टिसे रस-तन्मात्रा और जल, प्रभा और चन्द्र-सूर्य, ओंकार और वेद, शब्द-तन्मात्रा और आकाश, पुरुषत्व और मनुष्य-ये सब-के-सब (कारण तथा कार्य) एक भगवान्‌ ही हैं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०६)


बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥ ६॥

जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है।

व्याख्या—

शरीरको मैं, मेरा और मेरे लिये न मानना अपने साथ मित्रता करना है । शरीरको मैं, मेरा और मेरे लिये मानना अपने साथ शत्रुता करना है । आप ही अपना मित्र बनकर मनुष्य अपना जितना भला कर सकता है, उतना दूसरा कोई मित्र नहीं कर सकता । इसी प्रकार आपही अपना शत्रु बनकर मनुष्य अपना जितना नुकासान कर सकता है, उतान दूसरा कोई शत्रु नहीं कर सकता ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 25 February 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०६)


सन्न्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत:।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥ ६॥

परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोग के बिना सांख्ययोग सिद्ध होना कठिन है । मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—

कर्मयोगमें साधक सभी कर्म निष्कामभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये ही करता है, इसलिये उसका राग सुगमतापूर्वक मिट जाता है । कर्मयोगके द्वारा अपना राग मिटाकर सांख्ययोगका साधन करनेसे शीघ्र सिद्धि होती है । भगवान्‌ने भी इसी कारण कर्मयोगीके ‘सर्वभूतहिते रताः’ भावको ज्ञानयोगके अन्तर्गत लिया है अर्थात्‌ इस भावको ज्ञानयोगीके लिये भी आवश्यक बताया है (गीता ५ । २५, १२ । ४) । यदि ज्ञानयोगीमें यह भाव नहीं होगा तो उसमें ज्ञानका अभिमान अधिक होगा ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 24 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.०६)


वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:॥ १०॥

राग, भय और क्रोध से सर्वथा रहित, मुझ में तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए बहुत-से भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 17 December 2016

गीता प्रबोधनी- तीसरा अध्याय (पोस्ट.०६)


नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण:॥ ८॥
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर॥ ९॥

तू शास्त्रविधि से नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
यज्ञ (कर्तव्य-पालन)-के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है; इसलिये हे कुन्तीनन्दन! तू आसक्तिरहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर।

व्याख्या—

जो कर्म दूसरोंके लिये नहीं किये जाते, प्रत्युत अपने लिये किये जाते हैं, उन कर्मोंसे मनुष्य बँध जाता है । अतः साधकको ये तीन बातें स्वीकार कर लेनी चाहिये- (१) शरीरसहित कुछ भी मेरा नहीं है, (२) मुझे कुछ भी नहीं चाहिये, और (३) मुझे अपने लिये कुछ भी नहीं करना है । पहली बात स्वीकार करनेसे दूसरी बात सुगम हो जायगी और दूसरी बात स्वीकार करनेसे तीसरी बात सुगम हो जायगी ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 20 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.०६)

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा:।
न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम्॥ १२॥
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥ १३॥
किसी काल में मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजा लोग नहीं थे, यह बात भी नहीं है; और इसके बाद (भविष्य में मैं, तू और राजालोग) हम सभी नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है। देहधारी के इस मनुष्यशरीर में जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।
व्याख्या—
मनुष्यमात्र को ‘मैं हूँ’- इस रूप में अपनी एक सत्ता का अनुभव होता है । इस सत्ता में अहम्‌ (‘मैं’) मिला हुआ होनेसे ही ‘हूँ’ के रूपमें अपनी अलग एकदेशीय सत्ता अनुभवमें आती है । यदि अहम्‌ न रहे तो ‘है’ के रूपमें एक सर्वदेशीय सत्ता ही अनुभवमें आयेगी । वह सर्वदेशीय सत्ता ही प्राणीमात्रका वास्तविक स्वरूप है । उस सत्तामें जड़ताका मिश्रण नहीं है अर्थात्‌ उसमें मैं, तु, यह और वह- ये चारों ही नहीं हैं । सार बात यह है कि एक चिन्मय सत्तामात्रके सिवाय कुछ नहीं है ।
जीव स्वयं तो निरन्तर अमरत्त्वमें ही रहता है, पर शरीर निरन्तर मृत्युमें जा रहा है । जीवके गर्भ में आते ही मृत्यु का यह क्रम आरम्भ हो जाता है । गर्भावस्था मरती है तो बाल्यावस्था आती है । बाल्यावस्था मरती है तो युवावस्था आती है । युवावस्था मरती है तो वृद्धावस्था आती है । वृद्धावस्था मरती है तो देहान्तर-अवस्था आती है अर्थात्‌ दूसरे जन्म की प्राप्ति होती है । इस प्रकार शरीर की अवस्थाएँ बदलती हैं, पर उसमें रहनेवाला शरीरी ज्यों-का-त्यों रहता है । कारण यह है कि शरीर और शरीरी- दोनोंके विभाग ही अलग-अलग हैं । अतः साधक अपनेको कभी शरीर न माने । बन्धन-मुक्ति स्वयं की होती है, शरीर की नहीं ।
ॐ तत्सत् !

Friday, 7 October 2016

गीता प्रबोधनी - पहला अध्याय (पोस्ट.०६)

सञ्जय उवाच

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥ २४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखत: सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान्कुरूनिति॥ २५॥
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थ: पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ २६॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।

संजय बोले—

हे भरतवंशी राजन्! निद्रा-विजयी अर्जुनके द्वारा इस तरह कहनेपर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने दोनों सेनाओं के मध्यभाग में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने श्रेष्ठ रथको खड़ा करके इस प्रकार कहा कि 'हे पार्थ ! इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख। उसके बाद पृथानन्दन अर्जुनने उन दोनों ही सेनाओंमें स्थित पिताओं को, पितामहों को, आचार्यों को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों को भी देखा।

व्याख्या—

‘युद्ध के लिए एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देख’—ऐसा कहने में भगवान् की यह गूढ़ाभिसंधि थी कि इन कुरुवंशियों को देखकर अर्जुन के भीतर छिपा कौटुम्बिक ममतायुक्त मोह जाग्रत हो जाय और मोह जाग्रत होनेसे अर्जुन जिज्ञासु बन जाय, जिससे अर्जुन का तथा उनके निमित्त से भावी मनुष्यों का भी मोहनाश करने के लिए गीता का महान उपदेश दिया जा सके |

ॐ तत्सत् !