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Saturday, 13 May 2017

गीता प्रबोधनी पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥
 शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।८।।

जैसे वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादि का स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीर को छोड़ता है, वहाँ से मनसहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है ।

व्याख्या—
वास्तव में शुद्ध चेतन (आत्मा)-का किसी शरीर को प्राप्त करना उसका त्याग करके दूसरे शरीर में जाना हो नहीं सकता; क्योंकि आत्मा अचल और समानरूप से सर्वत्र व्याप्त है (गीता २ । १७,२४) । शरीरों का ग्रहण और त्याग परिच्छिन्न (एकदेशीय) तत्त्व के द्वारा ही होना सम्भव है, जबकि आत्मा कभी भी देश-कालादि में परिच्छिन्न नहीं हो सकती । परन्तु जब यह आत्मा प्रकृतिके कार्य शरीरसे तदात्म्य कर लेती है अर्थात्‌ शरीर को ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान लेती है, तब सूक्ष्म शरीर के आने-जाने को उसका आना-जाना कहा जाता है ।
वायु का दृष्टान्त देने का तात्पर्य है कि जीव वायु की तरह निर्लिप्त रहता है । शरीर से लिप्त होने पर भी वास्तव में इसकी निर्लिप्तता ज्यों-की-त्यों रहती है-‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३ । ३१) ।

ॐ तत्सत् !

Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।।७।।

हे कुन्तीनन्दन ! तृष्णा और आसक्ति को पैदा करनेवाले रजोगुण को तुम रागस्वरूप समझो । वह कर्मों की आसक्ति से शरीरधारी को बाँधता है ।

व्याख्या—
रजोगुण रागस्वरूप है अर्थात्‌ किसी वस्तु, व्यक्ति आदि में प्रियता उत्पन्न होती है, वह प्रियता रजोगुण है । रजोगुण कर्मोंके संग (आसक्ति)-से मनुष्यको बाँधता है । अतः सात्त्विक कर्म भी संग होनेसे बाँधनेवाले हो जाते हैं । यदि संग न हो तो कर्म बन्धनकारक नहीं होते । इसलिये कर्मयोगसे मुक्ति हो जाती है; क्योंकि कर्मोंका और उनके फलोंका संग न होनेसे ही कर्मयोग होता है (गीता ६ । ४) ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।१२।।

जो ज्ञेय (पूर्वोक्त ज्ञान से जानने योग्य) है, उस(परमात्मतत्त्व) को मैं अच्छी तरह से कहूँगा? जिस को जानकर मनुष्य अमरता का अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेयतत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।

व्याख्या—

गीतामें एक ही समय परमात्मा का तीन प्रकारसे वर्णन हुआ है-
(१) परमात्मा सत्‌ भी हैं और असत्‌ भी हैं-‘सदसच्चाहम्‌’ (९ । १९) ।
(२) परमात्मा सत्‌ भी हैं, असत्‌ भी हैं और सत्‌-असत्‌से पर भी हैं-‘सद्सत्तत्परं यत्‌’ (११ । ३७)
(३) परमात्मा न सत्‌ हैं और न असत्‌ ही हैं-‘न सत्तन्नासदुच्यते’ (१३ । १२) ।
---इसका तात्पर्य यह हुआ कि एक अनिर्वचनीय परमात्मतत्त्वके सिवाय कुछ नहीं है । वह मन, बुद्धि, वाणीसे सर्वथा अतीत है, इसलिये उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, पर उसे प्राप्त किया जा सकता है ।

परमात्मतत्त्व को असत्‌ की अपेक्षा से सत्‌, जड़ की अपेक्षा से चेतन, विकार की अपेक्षा से निर्विकार, एकदेशीय की अपेक्षा से सर्वदेशीय, ‘नहीं’ की अपेक्षा से ‘है’, गुणों की सगुण-निर्गुण, आकार की अपेक्षा से साकार-निराकार, अनेक की अपेक्षा से एक, प्रकाश्य की अपेक्षा से प्रकाशक, नाशवान्‌ की अपेक्षा से अविनाशी आदि कह देते हैं, पर वास्तव में उस तत्त्वमें कोई शब्द लागू होता ही नहीं ! कारण कि सभी शब्दोंका प्रयोग सापेक्षतासे और प्रकृतिके सम्बन्धसे होता है, पर तत्त्व निरपेक्ष और प्रकृतिसे अतीत है । देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, गुण आदिको लेकर ही संज्ञा बनती है । परमात्मामें देश, काल आदि हैं ही नहीं, फिर उनकी संज्ञा कैसी ? इसलिये यहाँ आया है कि उस तत्त्वको सत्‌ अथवा असत्‌ कुछ भी कहा नहीं जा सकता ।

परमात्मतत्त्वका आदि (आरम्भ) नहीं है । जो सदासे है, उसका आदि कैसे ? सब अपर हैं, वह पर है । आदि-अनादि, पर-अपर आदिका भेद प्रकृतिके सम्बन्धसे है । वह तत्त्व तो आदि-अनादि, पर-अपर, सत्‌-असत्‌ आदिसे विलक्षण है । इस प्रकार भगवान्‌ने ज्ञेयतत्त्वका वर्णन करनेकी बात कही है, वह वास्तवमें वर्णन नहीं है, प्रत्युत लक्षक अर्थात्‌ लक्ष्यकी तरफ दृष्टि करानेवाली है । इसका तात्पर्य ज्ञेय-तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है, कोरा वर्णन करनेमें नहीं । इसलिये साधक को भी लक्षक की दृष्टि से विचार करना चाहिये, केवल सीखने की दृष्टि से नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।११।।

अगर मेरे योग(समता) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में असमर्थ है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्याग कर।

व्याख्या—

यदि साधक सम्पूर्ण कर्मों को भगवान्‌ के अर्पण न कर सके अर्थात्‌ भगवान्‌ के लिए सभी कर्म न कर सके तो उसे फलेच्छा का त्याग करके कर्तव्य-कर्म करने चाहिये; क्योंकि फलेच्छा ही बाँधनेवाली है--‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५ । १२) । फल की इच्छा का त्याग करके कर्तव्यकर्म करने से उसका संसार से सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)


सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।।९।।
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्।।१०।।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।।११।।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।।१२।।

सञ्जय बोले –

हे राजन् ! ऐसा कहकर फिर महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुनको परम ऐश्वर विराट् रूप दिखाया।
‘जिनके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक तरह के अद्भुत दर्शन हैं, अनेक दिव्य आभूषण हैं और हाथों में उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिन के गले में दिव्य मालाएँ हैं, जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं, जिनके ललाट तथा शरीर पर दिव्य चन्दन आदि लगा हुआ है, ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय,अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखों वाले देव (अपने दिव्य स्वरूप) --को भगवान् ने दिखाया।‘
अगर आकाश में एक साथ हजारों सूर्यों का उदय हो जाय, तो भी उन सब का प्रकाश मिलकर उस महात्मा (विराट् रूप परमात्मा) के प्रकाश के समान शायद ही हो अर्थात् नहीं हो सकता ।

व्याख्या—

भगवान्‌ को ‘महायोगेश्‍वर’ कहने का तात्पर्य है कि भगवान्‌ सम्पूर्ण योगों के ईश्‍वर हैं । ऐसा कोई भी योग नहीं है, जिसके ईश्‍वर (स्वामी) भगवान्‌ न हों । सब योग भगवान्‌ के ही अन्तर्गत हैं ।
यदि हजारों सूर्यों का प्रकाश हो जाय तो भी वह है तो भौतिक ही ! परन्तु भगवान्‌ का प्रकाश दिव्य है, भौतिक नहीं । सूर्य में जो तेज है, वह भी भगवान्‌ से ही आया है (गीता १५ । १२) ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ।।९।।

मुझ में चित्तवाले, मुझ में प्राणों को अर्पण करनेवाले भक्तजन आपस में (मेरे गुण, प्रभाव आदिको) जनाते हुए और उनका कथन करते हुए ही नित्यनिरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं और मुझमें प्रेम करते हैं।

व्याख्या—

भक्तोंका चित्त भगवान्‌को छोडकर कहीं जाता ही नहीं । उनकी दृष्टिमें जब एक भगवान्‌ के सिवाय और कुछ है ही नहीं तो फिर उनका चित्त कहाँ जाय, कैसे जाय और क्यों जाय ? वे भगवान्‌ के लिये ही जीते हैं । उनकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ भगवान्‌ के लिये ही होती हैं । कोई सुननेवाला आ जाय तो वे भगवान्‌ के गुण, प्रभाव आदि की विलक्षण बातों का ज्ञान कराते हैं, भगवान्‌ की लीला-कथाका वर्णन करते हैं, और कोई सुनानेवाला आ जाय तो प्रेमपूर्वक सुनते हैं । न तो कहनेवाला तृप्त होता है, न सुननेवाला । तृप्ति नहीं होती-यह वियोग है और नित्य नया रस मिलता है- यह योग है । इस वियोग और योगके कारण प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन:।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥ ८॥
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥ ९ ॥

प्रकृतिके वशमें होनेसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायकी (कल्पोंके आदिमें) मैं अपनी प्रकृतिको वशमें करके बार-बार रचना करता हूँ।

हे धनंजय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मोंमें अनासक्त और उदासीनकी तरह रहते हुए मुझे वे कर्म नहीं बाँधते।

व्याख्या—

प्रकृति परमात्माकी एक अनिवर्चनीय अलौकिक विलक्षण शक्ति है । ऐसी अपनी प्रकृतिको स्वीकार करके ही भगवान्‌ सृष्टिकी रचना करते हैं । कारण कि सृष्टिमें जो परिवर्तन, उत्पत्ति-विनाश, आदि-अन्त होता है, वह सब प्रकृतिमें ही होता है, भगवान्‌में नहीं । इसलिये भगवान्‌ क्रियाशील प्रकृतिको लेकर ही सृष्टिकी रचना करते हैं । इसमें भगवान्‌की कोई असमर्थता, पराधीनता, कमजोरी आदि नहीं है । भगवान्‌का प्रकृतिपर आधिपत्य होनेपर भी उनमें लिप्तता, कर्तृत्व आदि नहीं होते ।

भगवान्‌ उन्हीं प्राणियोंकी रचना करते हैं, जो प्रकृतिके परवश हैं अर्थात्‌ जिन्होंने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ रखा है ।

कर्मासक्ति, फलासक्ति और कर्तृत्वाभिमानके कारण मनुष्य कर्मोंसे बँध जाता है । परन्तु भगवान्‌ में न तो कर्मासक्ति है, न फलासक्ति है और न कर्तृत्वाभिमान ही है, इसलिये वे सृष्टि-रचना आदि कर्मोंसे नहीं बँधते ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥ 

   प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥१०॥  
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागा: ।
यदिच्छन्तो ब्रह्राचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥११॥ 

वह भक्ति युक्त मनुष्य अन्तसमय में अचल मन से और योग बल के द्वारा भृकुटी के मध्य में प्राणों को अच्छी तरह से प्रविष्ट करके (शरीर छोड़ने पर) उस परम दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है। 
वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यदि जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिये संक्षेप से कहूँगा। 

व्याख्या- इस श्लोक में संकेत रूप से चारों आश्रमों का वर्णन ले सकते हैं; जैसे- ‘यदक्षरं वेदविदो वदन्ति’ पदों से गृहस्थाश्रम, ‘विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः’ पदों से संन्यास और वानप्रस्थ-आश्रम तथा ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति’ पदों से ब्रह्मचर्याश्रम ले सकते हैं। तात्पर्य है कि चारों आश्रमों का एकमात्र उद्देश्य परमात्मतत्त्व को प्राप्त करना है।

ॐ तत्सत् ! 

Wednesday, 3 May 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ ९॥

पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ और अग्निमें तेज मैं हूँ तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ।

व्याख्या—
गन्ध और पृथ्वी, तेज और अग्नि, जीवनीशक्ति और प्राणी, तप और तपस्वी-ये सब-के-सब (कारण तथा कार्य) एक भगवान्‌ ही हैं ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०७)


जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।
शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो:॥ ७॥

जिसने अपनेपर विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता),सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में निर्विकार मनुष्य को परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 25 February 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०७)


योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय:।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ७॥

जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हैं, जिसका अन्त:करण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वश में है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।

व्याख्या—

शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर कर्मयोगीको प्राणीमात्रके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है । एकदेशीयता मिटने पर जब कर्मयोगीमें कर्तापन नहीं रहता, तब उसके द्वारा होनेवाले सब कर्म अकर्म हो जाते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 24 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.०७)


ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:॥ ११॥

हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं।

व्याख्या—

यद्यपि सब कुछ परमात्मा ही हैं-‘वासुदेवः सर्वम्‌’ (गीता ७ । १९), तथापि मनुष्य जिस भावसे देखता है, भगवान्‌ भी उसके सामने उसी रूपसे प्रकट हो जाते हैं-
जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥
...............(मानस, बाल० २४१ । २).

जीव जगत्‌को धारण करता है-‘ययेदं धार्यते जगत्‌’ (गीता ७ । ५) तो भगवान्‌ जगद्‌रूपसे प्रकट हो जाते हैं । नास्तिक भगवान्‌को नहीं मानता तो भगवान्‌ उसके सामने ‘नहीं’- रूपसे प्रकट हो जाते हैं । चोर भगवान्‌ की मूर्तिमें भगवान्‌को न देखकर पत्थर, स्वर्ण आदिको देखता है तो भगवान्‌ उसके लिये पत्थर, स्वर्ण आदिके रूपमें प्रकट हो जाते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 22 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.०७)

सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ १०॥
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:।
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ॥ ११॥
प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा (मनुष्य आदि)-की रचना करके (उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और यह (कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ) तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। इस (अपने कर्तव्य-कर्म)-के द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग (अपने कर्तव्यके द्वारा) तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।
व्याख्या—
अपने कर्तव्य का पालन करने से अर्थात्‌ दूसरों के लिये निष्कामभाव से कर्म करने से अपना तथा प्राणी मात्र का हित होता है । परन्तु अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे अपना तथा प्राणी मात्रका अहित होता है । कारण कि शरीरों की दृष्टि से तथा आत्मा की दृष्टिसे भी मात्र प्राणी एक हैं, अलग-अलग नहीं ।
मनुष्यशरीर केवल कल्याण-प्राप्तिके लिये ही मिला है । अतः अपना कल्याण करनेके लिये कोई नया काम करना आवश्यक नहीं है, प्रत्युत जो काम करते हैं, उसे ही फलेच्छा और आसक्ति का त्याग करके दूसरोंके हितके लिये करनेसे हमारा कल्याण हो जायगा ।
ॐ तत्सत् !

Saturday, 22 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.०७)

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ १४॥

हे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके विषय (जड़ पदार्थ) तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता)-के द्वारा सुख और दु:ख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।

व्याख्या—

संसारकी समस्त परिस्थितियाँ आने-जानेवाली, मिलने-बिछुड़नेवाली हैं । मनुष्य यह चाहता है कि सुखदायी परिस्थितिबनी रहे और दुःखदायी परिस्थिति न आये । परन्तु सुखदायी परिस्थिति जाती ही है और दःखदायी परिस्थिति आती ही है- यह प्राकृतिक नियम है अथवा प्रभुका मंगलमय विधान है । अतः साधकको प्रत्येक परिस्थिति प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करनी चाहिये । निरन्तर परिवर्तनशील वस्तुओंमें स्थिरता देखना भूल है । इस भूलसे ही ममता और कामनाकी उत्पत्ति होती है । देखनेमें वस्तु मुख्य दीखती है, क्रिया गौण । पर वास्तवमें क्रिया-ही-क्रिया है, वस्तु है ही नहीं ।

ॐ तत्सत् !

Sunday, 9 October 2016

गीता प्रबोधनी - पहला अध्याय (पोस्ट.०७)

तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥ २७॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।

अर्जुन उवाच

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥ २८॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥ २९॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन:॥ ३०॥

अपनी-अपनी जगहपर स्थित उन सम्पूर्ण बान्धवोंको देखकर वे कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरतासे युक्त होकर विषाद करते हुए ऐसा बोले ।

अर्जुन बोले—

हे कृष्ण! युद्धकी इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदायको अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीरमें कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथसे गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहनेमें भी असमर्थ हो रहा हूँ।

ॐ तत्सत् !