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Friday, 12 May 2017

गीता प्रबोधनी - पन्द्रहवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

श्री भगवानुवाच

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१।।

श्रीभगवान् बोले –

ऊपर की ओर मूलवाले तथा नीचे की ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्ष को अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्ष को जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जाननेवाला है ।

व्याख्या—

परिवर्तनशील होने पर भी संसारको ‘अव्यय’ कहने का तात्पर्य है कि संसार में निरन्तर परिवर्तन होने पर भी कुछ व्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात्‌ अन्त नहीं होता । जैसे समुद्रके ऊपर कितनी लहरें उठती दीखती हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर उसका जल उतना ही रहता है, घटता-बढ़ता नहीं । ऐसे ही निरन्तर परिवर्तन दीखने पर भी संसार अव्यय ही रहता है ।

परिवर्तनशील संसार भी परमात्मा की शक्ति ‘अपरा प्रकृति’ का कार्य होने से परमात्मा का ही स्वरूप है-‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९ । १९) । परिवर्तनरूप अपरा प्रकृति भी परमात्मा का स्वरूप है । यह संसार उस परमात्मा की ही लहरें हैं । जैसे ऊपरसे लहरें दीखनेपर भी समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं है, भीतर से समुद्र सम-शान्त है, ऐसे ही ऊपर से संसार परिवर्तनशील दीखते हुए भी भीतर से एक सम, शान्त परमात्मातत्त्व है (गीता १३ । २७) । तात्पर्य यह हुआ कि संसार संसाररूप से अव्यय नहीं है, प्रत्युत भगवद्‌रूप से अव्यय है ।

ॐ तत्सत् !



Wednesday, 10 May 2017

गीता प्रबोधनी - चौदहवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

श्री भगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।१।।

श्रीभगवान् बोले –

सम्पूर्ण ज्ञानों में उत्तम और श्रेष्ठ ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसार से मुक्त होकर परमसिद्धि को प्राप्त हो गये हैं ।

व्याख्या—

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विभाग का ज्ञान सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक ज्ञानों से उत्तम तथा सर्वोत्कृष्ट है । यह ज्ञान परमात्मतत्त्व की प्राप्ति का निश्‍चित उपाय है, इसलिये इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाते अर्थात्‌ मुक्त हो जाते हैं । मुक्त होनेपर क्रिया (परिश्रम) तथा पदार्थ (पराश्रय)- का अत्यन्त अभाव हो जाता है और एक चिन्मय सत्ता (विश्राम)- के सिवाय कोई जड़ वस्तु रहती ही नहीं, जो वास्तवमें है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

श्री भगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।१ ।।

श्रीभगवान् बोले –

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन यह – रूप से कहे जाने वाले शरीर को क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्र को जो जानता है ? उसको ज्ञानीलोग क्षेत्रज्ञ नाम से कहते हैं ।

व्याख्या—

अर्जुन के द्वारा बारहवें अध्याय के आरम्भ में किये गये प्रश्न के उत्तर में भगवान्‌ ने सगुण-साकार की उपासनाका विस्तार से वर्णन किया । अब भगवान्‌ यहाँ से निर्गुण-निराकार की उपासना का विस्तार से वर्णन करना आरम्भ करते हैं ।

जैसे खेत में तरह-तरह के बीज डालकर खेती की जाती है, ऐसे ही इस मनुष्य शरीरमें अहंता-ममता करके जीव तरह-तरहके कर्म करता है और फिर उन कर्मोंके फलरूपमें उसे दूसरा शरीर मिलता है । भगवान्‌ शरीरके साथ माने हुए अहंता-ममतारूप सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये शरीरको इदंता (पृथकता)-से देखनेके लिये कह रहे हैं, जो प्रत्येक मार्गके साधकके लिये अत्यन्त आवश्यक है ।
अनन्त ब्रह्माण्डों में जितने भी शरीर हैं, उनमें जीव स्वयं ‘क्षेत्रज्ञ’ है और अनन्त ब्रह्माण्ड ‘क्षेत्र’ हैं । क्षेत्रज्ञ के एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं-‘येन सर्वमिदं ततम्‌’ (गीता २ । १७) । साधक को जानना चाहिये कि मैं क्षेत्र नहीं हूँ, प्रत्युत क्षेत्र को जानने वाला ‘क्षेत्रज्ञ’ हूँ ।

एक ही चिन्मय तत्त्व (सत्ता) क्षेत्रके सम्बन्ध से ‘क्षेत्रज्ञ’, क्षरके सम्बन्धसे ‘अक्षर’, शरीर के सम्बन्ध से ‘शरीरी’, दृश्यके सम्बन्धसे ‘द्र्ष्टा’, साक्ष्य के सम्बन्ध से ‘साक्षी’ और करण के सम्बन्ध से ‘कर्त्ता’ कहा जाता है । वास्तव में उस तत्त्व का कोई नाम नहीं है । वह केवल अनुभवरूप है ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 9 May 2017

गीता प्रबोधनी - बारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।१।।

श्री भगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।२।।

जो भक्त इस प्रकार ( ग्यारहवें अध्याय के पचपनवें श्लोक के अनुसार) निरन्तर आप में लगे रहकर आप (सगुण-साकार)-- की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निर्गुण-निराकार की ही उपासना करते हैं; उन दोनों में से उत्तम योगवेत्ता कौन हैं ?

श्रीभगवान् बोले—

मुझमें मनको लगाकर नित्यनिरन्तर मुझमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी (सगुण-साकार) की उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

व्याख्या—

यद्यपि ज्ञान और भक्ति—दोनों ही मनुष्य का दुःख दूर करने में समान हैं, तथापि ज्ञान की अपेक्षा भक्ति की अधिक महिमा है । ज्ञान से तो अखण्डरस की प्राप्ति होती है, पर भक्तिसे अनन्तरस (प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम)-की प्राप्ति होती है । जैसे संसार में किसी वस्तु का ज्ञान होता है कि ‘ये रुपये हैं’ आदि,तो इस ज्ञान से केवल अज्ञान (अनजानपना) मिट जाता है, ऐसे ही तत्त्वज्ञान से केवल अज्ञान मिटता है । अज्ञान मिटने से दुःख, भय, जन्म-मरण- ये सब मिट जाते हैं । परन्तु भक्ति, ज्ञान से भी विलक्षण है । जैसे ‘ये रुपये हैं’ यह ज्ञान हो जानेपर अनजानपना मिट जाता है, पर उनको पाने का लोभ हो जाय कि ‘और मिले, और मिले’ तो उसमें एक विशेष रस मिलता है । वस्तुके आकर्षण में जो रस है वह रस वस्तु के ज्ञान में नहीं है । ऐसे ही भक्ति में एक विशेष रस है । ज्ञान का रस तो स्वयं लेता है, पर प्रेम का रस भगवान्‌ लेते हैं । भगवान्‌ ज्ञान के भूखे नहीं हैं, प्रत्युत प्रेम के भूखे हैं । अतः ‘प्रेम’ मुक्ति, तत्त्वज्ञान, स्वरूप-बोध, आत्मसाक्षात्कार, कैवल्यसे भी आगेकी वस्तु है !

ज्ञानमार्ग में सत्‌ और असत्‌ दोनों की मान्यता (विवेक) साथ-साथ रहनेसे असत्‌ की अति सूक्ष्म सत्ता अर्थात्‌ सूक्ष्म अहम्‌ दूर तक साथ रहता है । यह सूक्ष्म अहम्‌ मुक्त होने पर भी रहता है । इस सूक्ष्म अहम्‌ के रहने से पुनर्जन्म तो नहीं होता, पर भगवान्‌ से अभिन्नता नहीं होती और दार्शनिकों में तथा उनके दर्शनों में परस्पर मतभेद रहता है । परन्तु प्रेम का उदय होने पर भगवान्‌ से अभिन्नता हो जाती है तथा सम्पूर्ण दार्शनिक मतभेद मिट जाते हैं ॥

ॐ तत्सत् !

Sunday, 7 May 2017

गीता प्रबोधनी - ग्यारहवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ।।१।।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।।२।।

अर्जुन बोले –
केवल मुझपर कृपा करने के लिये ही आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म-विषयक वचन कहे, उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है।
हे कमलनयन ! सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय मैंने विस्तारपूर्वक आप से ही सुने हैं और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 6 May 2017

गीता प्रबोधनी - दसवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

श्री भगवानुवाच

भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।।१।।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।।२।।

श्रीभगवान् बोले –

हे महाबाहो अर्जुन ! मेरे परम वचन को तुम फिर सुनो? जिसे मैं तुम्हारे हितकी कामना से कहूँगा क्योंकि तुम मुझ में अत्यन्त प्रेम रखते हो।
मेरे प्रकट होने को न देवता जानते हैं और न महर्षि क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ।

व्याख्या—

अर्जुन भगवान्‌में अत्यन्त प्रेम रखनेवाले (भक्त) हैं; अतः भगवान्‌ उनके लिये भक्ति-सम्बन्धी परम वचन पुनः कहते हैं ।

परमात्मा जानने का विषय नहीं हैं, प्रत्युत मानने और अनुभव करनेका विषय हैं । उन्हें माना ही जा सकता है, जाना नहीं जा सकता । जैसे, अपने माता-पिता को हम मान ही सकते हैं, जान नहीं सकते; क्योंकि जन्म लेते समय हमने उन्हें देखा ही नहीं, देखना सम्भव ही नहीं, माता की अपेक्षा भी पिताको जानना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि माता से जन्म लेते समय तो हमारा शरीर बन चुका था, पर पितासे जन्म लेते समय हमारे शरीरकी सत्ता ही नहीं थी । भगवान्‌ सम्पूर्ण संसारके पिता हैं- ‘पिताहमस्य जगतो मात धाता पितामहः’ (गीता ९ । १७), ‘पितासि लोकस्य चराचरस्य’ (गीता १ । ४३), ‘अहं बीजप्रदः पिता’ (गीता १४ । ४) इसलिये परमात्माको जानना अर्वथा असम्भव है । उन्हें माना ही जा सकता है ।
परमात्मा को हम जान सकते ही नहीं और माने बिना रह सकते ही नहीं । जैसे, माता-पिताको माने बिना हम रह सकते ही नहीं । अगर हम अपनी (शरीरकी) सत्ता मनते हैं तो माता-पिताकी सत्ता माननी ही पड़ेगी । कार्य है तो उसका कारण भी है । ऐसे ही परमात्माको माने बिना हम रह सकते ही नहीं । अगर हम अपनी सत्ता (होनापन) मानते हैं तो परमात्माकी सत्ता माननी ही पड़ेगी । कारण के बिना कार्य कहाँ से आया ? परमात्मा के बिना हम स्वयं कहाँसे आये ? हमारी सत्ता परमात्मा के होने में प्रत्यक्ष प्रमाण है । जैसे ‘हम नहीं हैं’-इस तरह अपने होनेपन का कोई निरोध या खण्डन नहीं कर सकता, ऐसे ही ‘परमात्मा नहीं हैं’-इस तरह परमात्मा के होनेपन का भी कोई निषेध या खण्डन नहीं कर सकता ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 4 May 2017

गीता प्रबोधनी - नवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥

श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ १॥

श्रीभगवान् बोले—

यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान दोषदृष्टिरहित तेरे लिये तो मैं फिर अच्छी तरहसे कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभसे अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जायगा।

व्याख्या—

कर्मयोग (निष्काम भाव) ‘गुह्य’ है, ज्ञानयोग (आत्मज्ञान) ‘गुह्यतर’ है, और भक्तियोग (परमात्मज्ञान) ‘गुह्यतम’ है ।

अपने स्वरूप को जानना ‘ज्ञान’ है और समग्र भगवान्‌को जानना ‘विज्ञान’ है । समग्र सगुण ही हो सकता है; क्योंकि निर्गुण के अन्तर्गत तो सगुण नहीं आ सकता है; क्योंकि निर्गुण के अन्तर्गत तो सगुण नहीं आ सकता, पर सगुणके अन्तर्गत निर्गुण भी आ जाता है ।

सातवें अध्याय से भगवान्‌ विज्ञानसहित ज्ञान का वर्णन कर रहे थे, पर बीचमें अर्जुन के द्वारा सात प्रश्न कर दिये जाने से भगवान्‌ ने आठवें अध्याय में उनका विस्तार से उत्तर दिया । अब भगवान्‌ अपनी ओर से पुनः उस विज्ञानसहित ज्ञान का वर्णन आरम्भ करते हैं ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - आठवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम:॥


अर्जुन उवाच

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ १॥
अधियज्ञ: कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभि:॥ २॥

श्रीभगवानुवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसञ्ज्ञित:॥ ३॥

अर्जुन बोले—
हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अधिभूत किसको कहा गया है ? और अधिदैव किसको कहा जाता है ? यहाँ अधियज्ञ कौन है ? और वह इस देहमें कैसे है ? हे मधुसूदन ! वशीभूत अन्त:करणवाले मनुष्योंके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं ?

श्रीभगवान् बोले—

परम अक्षर ब्रह्म है और परा प्रकृति (जीव)-को अध्यात्म कहते हैं। प्राणियोंकी सत्ताको प्रकट करनेवाला त्याग कर्म कहा जाता है।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 25 April 2017

गीता प्रबोधनी - सातवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)


श्रीभगवानुवाच

मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ १॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ २॥

श्रीभगवान् बोले—हे पृथानन्दन! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे जिस समग्ररूपको नि:सन्देह जिस प्रकारसे जानेगा, उसको (उसी प्रकारसे) सुन।

तेरे लिये मैं यह विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर इस विषयमें जाननेयोग्य अन्य (कुछ भी) शेष नहीं रहेगा।

व्याख्या—

आत्मीयताके कारण जिसका मन भगवान्‌की ओर आकर्षित हो गया है, जो सब प्रकारसे भगवान्‌के आश्रित हो गया है और जिसने भगवान्‌के साथ अपने नित्य-सम्बन्धको पहचान लिया है, ऐसा भक्त भगवान्‌के समग्ररूपको जान लेता है । सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि सब कुछ एक भगवान्‌ ही हैं-यह भगवान्‌का समग्ररूप है । भगवान्‌ कहते हैं कि पार्थ ! अपने समग्ररूपका वर्णन मैं इस ढंगसे करूँगा, जिससे तू मेरे समग्ररूपको सुगमतापूर्वक यथार्थरूपसे जान लेगा और तेरे सब संशय मिट जायँगे ।
परा और अपरा प्रकृतिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है-- यह ‘ज्ञान’ है और परा-अपरा सब कुछ एक भगवान्‌ ही हैं- यह ‘विज्ञान’ है । अहम्‌सहित सब कुछ भगवान्‌ ही हैं-यह भगवान्‌का समग्ररूप ही ‘विज्ञानसहित ज्ञान’ है । इस विज्ञानसहित ज्ञानको जाननेके बाद और कुछ भी जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि ‘सब कुछ भगवान्‌ ही हैं’-इसे जाननेके बाद यदि कुछ शेष रहेगा तो वह भी भगवान्‌ ही होंगे !

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 21 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०१)


श्रीभगवानुवाच

अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:॥ १॥

श्रीभगवान् बोले—कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।

व्याख्या—

संन्यासी अथवा योगी मनुष्य न तो अग्निसे बँधता है, न क्रियाओंसे ही बँधता है, प्रत्युत कर्मफलकी इच्छासे बँधता है-‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५ । १२) । अतः जिसने कर्मफल की इच्छाका त्याग कर दिया है, वही सच्चा संन्यासी अथवा योगी है । कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है-‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌’ (गीता १२ । १२) । अतः सच्चा त्यागी भी वही है, जिसने कर्मफलकी आसक्तिका त्याग कर दिया है-‘यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते’ (गीता १८ । ११) ।

ॐ तत्सत् !

Friday, 24 February 2017

गीता प्रबोधनी - पाँचवाँ अध्याय (पोस्ट.०१)

अर्जुन उवाच

सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥ १॥

अर्जुन बोले—हे कृष्ण ! आप कर्मों का स्वरूप से त्याग करने की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं । अत: इन दोनों साधनों में जो एक निश्चितरूप से कल्याणकारक हो, उसको मेरे लिये कहिये ।

व्याख्या—

चौथे अध्याय के अन्त में भगवान्‌ ने अर्जुन को युद्ध के किये खड़ा होने की आज्ञा दी थी । परन्तु यहाँ अर्जुन के प्रश्न से पता लगता है कि उनके भीतर युद्ध करने अथवा न करने की और विजय प्राप्त करने अथवा न करने की अपेक्षा भी ‘मेरा कल्याण कैसे हो’-इसकी विशेष चिन्ता है । उनके अन्तःकरणमें युद्ध की तथा विजय प्राप्त करने की अपेक्षा भी कल्याण का अधिक महत्त्व है । अतः प्रस्तुत श्लोक से पहले भी अर्जुन दो बार अपने कल्याण की बात पूछ चुके हैं (गीता २ । ७, ३ । २) ।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 17 January 2017

गीता प्रबोधनी - चौथा अध्याय (पोस्ट.०१)

श्रीभगवानुवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ १॥
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु:।
स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप॥ २॥
स एवायं मया तेऽद्य योग: प्रोक्त: पुरातन:।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ ३॥

श्रीभगवान् बोले —
मैंने इस अविनाशी योग (कर्मयोग)-को सूर्य से कहा था। फिर सूर्य ने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकु से कहा।
हे परन्तप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्म-योगको राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जाने के कारण वह योग इस मनुष्यलोक में लुप्तप्राय हो गया।
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है।

व्याख्या—

पूर्वपक्ष- अव्यय (नित्य) तो साध्य होता है, साधन कैसे अव्यय होगा ?

उत्तरपक्ष- साधक ही साधन होकर साध्यमें लीन होत है । अतः साधक, साधन और साध्य-तीनों ही एक होनेसे अव्यय हैं; परन्तु मोहके कारण तीनों अलग-अलग दीखते हैं ।

ॐ तत्सत् !

Monday, 12 December 2016

गीता प्रबोधनी - तीसरा अध्याय (पोस्ट.०१)

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ १॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥ २॥

श्रीभगवानुवाच

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥ ३॥

अर्जुन बोले—हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि (ज्ञान)-को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव ! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अत: आप निश्चय करके उस एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ।

श्रीभगवान् बोले—हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोक में दो प्रकार से होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें ज्ञानियों की निष्ठा ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है।

व्याख्या—

कर्मयोग और ज्ञानयोग-दोनों लौकिक निष्ठाएं होनेसे समकक्ष हैं और दोनोंका एक ही फल है (गीता ५ । ४-५) । यद्यपि कर्मायोगमें क्रियाकी और सांख्ययोगमें विवेककी मुख्यता है, तथापि फलमें दोनों एक हैं ।
पूर्वपक्ष- यहाँ भक्तियोग-निष्ठाकी बात नहीं कहीगयी है, इससे सिद्ध हुआ कि कर्मयोग और ज्ञानयोग-ये दोनों ही साधन मान्य हैं ?
उत्तरपक्ष- ऐसा नहीं है । कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनोंकी अपनी निष्टाएँ हैं, पर भक्तियोग साधककी अपनी निष्टा न होकर भगवन्निष्टा है । भक्तियोगमें साधक भगवान्‌पर निर्भर रहता है ।
कर्मयोग और भक्तियोग-दोनों लौकिक निष्टाएँ हैं । कर्मयोगमें जगत्‌की और ज्ञानयोगमें जीवकी मुख्यता है । जगत्‌ और जीव दोनों लौकिक हैं-‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५ । १६); क्योंकि जगत्‌ (जड़) और जीव (चेतन)- ये दोनों विभाग हमारे जाननेमें आते हैं, पर भगवान जाननेमें नहीं आते । भगवान्‌ माननेके विषय हैं, जाननेके नहीं । परन्तु भक्तियोग अलौकिक निष्टा है ; क्योंकि इसमें भगवान्‌की मुख्यता है, जो जगत्‌ और जीव दोनोंसे उत्तम हैं- ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’ (गीता १५ । १७) ।

ॐ तत्सत् !

Saturday, 15 October 2016

गीता प्रबोधनी - दूसरा अध्याय (पोस्ट.०१)


सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन:॥ १॥
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्ति करमर्जुन ॥ २॥
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥ ३॥
संजय बोले—
वैसी कायरतासे व्याप्त हुए उन अर्जुनके प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखनेकी शक्ति अवरुद्ध हो रही है,भगवान् मधुसूदन यह (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।
श्रीभगवान् बोले—
हे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है। हे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकता को मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारे में यह उचित नहीं है। हे परन्तप ! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता का त्याग करके (युद्धके लिये) खड़े हो जाओ।
ॐ तत्सत् !

Monday, 3 October 2016

गीता प्रबोधनी -पहला अध्याय (पोस्ट.०१)

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:।
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ १॥

धृतराष्ट्र बोले—हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में इकट्ठे हुए युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने भी क्या किया ?

व्याख्या—

यह हिन्दू संस्कृति की विलक्षणता है कि इसमें प्रत्येक कार्य अपने कल्याण का उद्देश्य सामने रखकर ही करने की प्रेरणा की गयी है। इसलिए युद्ध-जैसा घोर कर्म भी 'धर्मक्षेत्र' ( धर्मभूमि ) एवं 'कुरुक्षेत्र' ( तीर्थभूमि ) - में किया गया है, जिसमें युद्ध में मरने वालों का भी कल्याण हो जाय। भगवान् की ओर से सृष्टि में कोई भी (मेरे और तेरे का) विभाग नहीं किया गया है | सम्पूर्ण सृष्टि पाँचभौतिक है | सभी मनुष्य समान हैं और उन्हें आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी भी समान रूप से मिले हुए हैं | परन्तु मनुष्य मोह के वशीभूत होकर उनमें विभाग कर लेता है कि ये मनुष्य,घर, गाँव,प्रांत, देश, आकाश,जल आदि मेरे हैं और ये तेरे हैं | इस ‘मेरे’ और ‘तेरे’ भेद से ही सम्पूर्ण संघर्ष उत्पन्न होते हैं | महाभारत का युद्ध भी ‘मामका:’ (मेरे पुत्र) और ‘पांडवा:’ (पांडु के पुत्र)—इस भेद के कारण आरम्भ हुआ है |

ॐ तत्सत् !