Friday, 24 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.१०)

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित: ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह: ॥१० ॥

भोगबुद्धि से संग्रह न करने वाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीर को वश में रखने वाला योगी अकेला एकान्त में स्थित होकर मन को निरन्तर (परमात्मा में) लगाये।

व्याख्या- ध्यान योग का अधिकारी वह है, जो अपने सुखभोग के लिये विभिन्न वस्तुओं का संग्रह नहीं करता, जिसके मन में भोगों की कामना नहीं है और जिसका अन्तःकरण तथा शरीर उसके वश में है। तात्पर्य है कि ध्यानयोग के साधक का उद्देश्य केवल परमात्मा को प्राप्त करने का हो, लौकिक सिद्धियों को प्राप्त करने का नहीं।

पूर्वपक्ष- युद्ध के समय में अर्जुन को ध्यानयोग का उपदेश देने का क्या औचित्य है?

उत्तरपक्ष- अर्जुन पाप से डरते थे, युद्ध से नहीं। उन्हें युद्ध से अधिक अपने कल्याण (श्रेय) की चिन्ता थी[1]। इसलिये कल्याण के जितने मुख्य साधन हैं, उन सबका भगवान गीता में वर्णन करते हैं। इसी कारण गीता मानव मात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०९ )

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद् वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥

सुहृद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियों में तथा साधु-आचरण करनेवालों में और पाप-आचरण करने वालों में भी समबुद्धि वाला मनुष्य श्रेष्ठ है।

व्याख्या- 
 
जिन से व्यवहार में एकता नहीं करनी चाहिये और एकता कर भी नहीं सकते, उन मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण में और सुहृद, मि, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बन्धु, साधु तथा पापी व्यक्तियों में भी कर्मयोगी महापुरूष की समबुद्धि रहती है। तात्पर्य है कि उसकी दृष्टि सब प्राणी-पदार्थों में समरूप से परिपूर्ण परमात्मतत्त्व पर ही रहती है। जैसे सोने से बने गहनों को देखें तो उन में बहुत अन्तर दीखता है, पर सोने को देखें तो कोई अन्तर नहीं, एक सोना-ही-सोना है। इसी प्रकार सांसारिक प्राणी पदार्थों को देखें तो उनमें बहुत बड़ा अन्तर है, पर तत्त्व से देखें तो एक परमात्मा-ही-परमात्मा हैं।
 
ॐ तत्सत् ! 

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०८)


ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय:।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन:॥ ८॥

जिसका अन्त:करण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जो कूट की तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टी, ढेले, पत्थर तथा स्वर्ण में समबुद्धिवाला है—ऐसा योगी युक्त (योगारूढ़) कहा जाता है।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०७)


जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।
शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो:॥ ७॥

जिसने अपनेपर विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता),सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में निर्विकार मनुष्य को परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०६)


बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥ ६॥

जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है।

व्याख्या—

शरीरको मैं, मेरा और मेरे लिये न मानना अपने साथ मित्रता करना है । शरीरको मैं, मेरा और मेरे लिये मानना अपने साथ शत्रुता करना है । आप ही अपना मित्र बनकर मनुष्य अपना जितना भला कर सकता है, उतना दूसरा कोई मित्र नहीं कर सकता । इसी प्रकार आपही अपना शत्रु बनकर मनुष्य अपना जितना नुकासान कर सकता है, उतान दूसरा कोई शत्रु नहीं कर सकता ।

ॐ तत्सत् !