Friday, 24 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०५)


उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥ ५॥

अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

व्याख्या—

गुरु बनना या बनाना गीताका सिद्धान्त नहीं है । वास्तवमें मनुष्य आप ही अपना गुरु है । इसलिये अपनेको ही उपदेश दे अर्थात्‌ दूसरे में कमी न देखकर अपनेमें ही कमी देखे और उसे मिटानेकी चेष्टा करे । भगवान्‌ भी विद्यमान हैं, तत्त्वज्ञान भी विद्यमान है और हम भी विद्यमान हैं, फित उद्धारमें देरी क्यों ? नाशवान्‌ व्यक्ति, पदार्थ और क्रियामें आसक्तिके कारण ही उद्धारमें देरी हो रही है । इसे मिटनेकी जिम्मेवारी हमपर ही है; क्योंकि हमने ही आसक्ति की है ।
पूर्वपक्ष-- गुरु, सन्त और भगवान्‌ भी तो मनुष्यका उद्धार करते हैं, ऐसा लोकमें देखा जाता है ?

उत्तरपक्ष-- गुरु, सन्त और भगवान्‌ भी मनुष्यका तभी उद्धार करते हैं, जब स्वयं उन्हें स्वीकार करता है अर्थात्‌ उनओअर श्रद्धा-विश्वास करता है, उनके सम्मुख होता है, उनकी शरण लेता है, उनकी आज्ञाका पालन करता है । गुरु, सन्त और भगवान्‌का कभी अभाव नहीं होता, पर अभीतक हमारा उद्धार नहीं हुआ तो इससे सिद्ध होता है कि हमने ही उन्हें स्वीका नहीं किया । जिन्होंने उन्हें स्वीकार किया, उन्हींका उद्धार हुआ । अतः अपने उद्धार और पतनमें हम ही हेतु हुए ।

ॐ तत्सत् !

Thursday, 23 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०४)

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥

कारण कि जिस समय न इन्द्रियों के भोगों में तथा न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पों का त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है।

व्याख्या-

संसार का स्वरूप है- पदार्थ और क्रिया। मनुष्य योगारूढ़ (योग में स्थित) तभी होता है, जब उसकी पदार्थ और क्रिया में आसक्ति नहीं रहती। जबतक पदार्थ और क्रिया की आसक्ति है, तब तक वह संसार (विषमता) में ही स्थित है।

प्रत्येक पदार्थ का संयोग और वियोग होता है। प्रत्येक क्रिया का आरम्भ और अन्त होता है। प्रत्येक संकल्प उत्पन्न और नष्ट होता है। परन्तु स्वयं नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है। इसलिये जब साधक पदार्थ और क्रिया की आसक्ति मिटा देता है तथा सम्पूर्ण संकल्पों का त्याग कर देता है, तब वह योगारू़ढ़ हो जाता है।

ॐ तत्सत् !

Tuesday, 21 March 2017

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०३)

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते॥ ३॥

जो योग (समता)-में आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये कर्तव्य-कर्म करना कारण कहा गया है और उसी योगारूढ़ मनुष्यका शम (शान्ति) परमात्मप्राप्तिमें कारण कहा गया है।

व्याख्या—

निष्कामभाव से केवल दूसरे के लिये कर्म करने से करने का वेग मिट जाता है । कर्म करने का वेग मिटने से साधक योगारूढ़ अर्थात्‌ समता में स्थित हो जाता है । योगारूढ़ होने पर एक शान्ति प्राप्त होती है । उस शान्तिका उपभोग न करनेसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है ।
शम (शान्ति)- का अर्थ है-शान्त होना, चुप होना, कुछ न करना । जबतक हमारा सम्बन्ध ‘करने’ (क्रिया)-के साथ है, तबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है । जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, तबतक अशान्ति है, दुःख है, जन्म-मरणरूप बन्धन है । प्रकृतिके साथ सम्बन्ध ‘न करने’ से मिटेगा । कारण कि क्रिया और पदार्थ-दोनों प्रकृतिमें हैं । चेतन-तत्त्वमें न क्रिया है, न पदार्थ । इसलिये परमात्मप्राप्तिके लिये ‘शम’ अर्थात्‌ कुछ न करना ही कारण है । हाँ, अगर हम इस शान्तिका उप्भोग करेंगे तो परमात्मा की प्राप्ति नहीं होगी । ‘मैं शान्त हूँ’- इस प्रकार शान्तिमें अहंकार लगानेसे और ‘बड़ी शान्ति है’- इस प्रकार शान्तिमें संतुष्ट होनेसे शान्तिका उपभोग हो जाता है । इसलिये शान्तिमें व्यक्तित्व न मिलाये, प्रत्युत ऐसा समझॆ कि शान्ति स्वतः है । शान्तिका उपभोग करनेसे शान्ति नहीं रहेगी, प्रत्युत चंचलता अथवा निद्रा आ जायगी । उपभोग न करनेसे शान्ति स्वतः रहेगी । क्रिया और अभिमानके बिना जो स्वतः शान्ति होती है, वह ‘योग’ है । कारण कि उस शान्तिका कोई कर्ता अथवा भोक्ता नहीं है । जहाँ कर्ता अथवा भोक्ता होता है, वहाँ भोग होता है । भोग होनेपर संसारमें स्थिति होती है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०२)

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥ २॥

हे अर्जुन! लोग जिसको संन्यास—ऐसा कहते हैं, उसीको तुम योग समझो;क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं हो सकता।

व्याख्या—

सांख्ययोग और कर्मयोग-दोनों साधन अलग-अलग होने पर भी संकल्पों के त्याग में एक हैं । जब तक मनुष्य के अन्तःकरण में संसार की सत्ता, महत्ता और अपनापन है, तब तक वह संकल्पों का त्याग नहीं कर सकता । संकल्पों का त्याग किये बिना मनुष्य ज्ञानयोगी, हठयोगी, कर्मयोगी, भक्तियोगी आदि कोई-सा भी योगी नहीं होता, प्रत्युत भोगी होता है ।

ॐ तत्सत् !

गीता प्रबोधनी - छठा अध्याय (पोस्ट.०१)


श्रीभगवानुवाच

अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:॥ १॥

श्रीभगवान् बोले—कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।

व्याख्या—

संन्यासी अथवा योगी मनुष्य न तो अग्निसे बँधता है, न क्रियाओंसे ही बँधता है, प्रत्युत कर्मफलकी इच्छासे बँधता है-‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५ । १२) । अतः जिसने कर्मफल की इच्छाका त्याग कर दिया है, वही सच्चा संन्यासी अथवा योगी है । कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है-‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌’ (गीता १२ । १२) । अतः सच्चा त्यागी भी वही है, जिसने कर्मफलकी आसक्तिका त्याग कर दिया है-‘यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते’ (गीता १८ । ११) ।

ॐ तत्सत् !